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साहित्य 2020: जिनके संग्रहों से तृप्त होती रही कविता की प्यास

कोरोना की विश्वव्यापी व्याधि के बावजूद कवियों की कलम रुकी नहीं. वह चलती रही. कविता, गीत, ग़ज़ल दोहे आदि सभी शैलियों में कविता का संसार उर्वर रहा. बीते साल कविता के परिदृश्य एक नजर

जिनकी पुस्तकों से साल 2020 में कविता का परिदृश्य गमक उठा जिनकी पुस्तकों से साल 2020 में कविता का परिदृश्य गमक उठा

मानवता के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहे बीते साल में कोरोना महामारी ने जैसे सारी सर्जनात्मकता पर विराम लगा दिया. विकसित हों या विकासशील दुनिया के तमाम देशों की अर्थ व्यवस्था पटरी से उतरने लगी. अचानक आए इस संकट से मजदूरों में अफरातफरी का आलम रहा. कंपनियों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में तालाबंदी के बाद विस्थापन का सिलसिला चला. अनेक शहरों से मजदूर अपने घरों की ओर भागे. न बस न ट्रेन न कोई और सवारी- वे दिन भुलाए नहीं जा सकते. कवियों ने इस पूरे दृश्य को देखा और इस पर अपनी कलम चलाई. फेसबुक व वेबसाइट्स साक्षी हैं कि दिन ब दिन की समस्या को कवियों ने अपने कार्यभार से अलग नहीं किया.

एक तरफ कोरोना योद्धा ड्यूटी पर मुस्तैद रहे तो दूसरी तरफ कवियों की कलम किसानों, मजदूरों, विस्थापितों के पक्ष में चलती रही. साल 2020 की शुरुआत में विश्व पुस्तक मेले तक काफी पुस्तकें आ गयी थीं. बाद में कुछ महीनों छिटपुट ही पुस्तकें आ सकीं. पुन: मई के बाद से प्रकाशन कुछ पटरी पर आने लगा. लिहाजा कविता परिदृश्य प्रभावित तो हुआ पर उतना नहीं. बेशक बड़े कवियों के संग्रह युवाओं की अपेक्षा कम आए.

हर साल प्राय: कुछ ऐसे वरिष्ठ कवियों के संग्रह आते हैं जिससे पूरा कविता परिदृश्य गमक उठता है. लोग वरिष्ठ कवियों के संग्रहों की राह देखते हैं. किन्तु इस बार केवल लीलाधर जगूड़ी व ज्ञानेन्द्रपति के नए संग्रह आए.  रामदरश मिश्र जैसे वरिष्ठ कवि इस साल 'मेरी गीत यात्रा' के गीतों के चयन के साथ सामने आए तो अशोक वाजपेयी कविता समग्र भी सेतु प्रकाशन से दो खंडों में आया. क्या विडंबना है कि अभी हाल के कुछ वर्ष पहले तक वरिष्ठ कवियों का जो परिदृश्य बनता था वह उनके न होने से जैसे अधूरा सा लगता है. अब न केदार जी रहे, न कुंवर जी, न चंद्रकांत देवताले, न विष्णु खरे, न कैलाश वाजपेयी. अब रामदरश मिश्र, मलय को छोड़ कर इनके बाद की पीढ़ी ही कविता में है.

सच कहें तो वरिष्‍ठ कवियों में इस बार कविता की प्यास को तृप्त किया लीलाधर जगूड़ी के संग्रह ने. अश्रुतपूर्व अनुभवों की अद्वितीयता का सुख देता हुआ लीलाधर जगूड़ी का संग्रह कविता में एक नई उपलब्धि की तरह है. वहां कविता के नाम निष्प्रयोजनीय कुछ भी नहीं है. 'कविता का अमर फल' लीलाधर जगूड़ी के अप्रतिहत कवि-कर्म की पुन: एक मिसाल है. ऐसे कवि हिंदी की परंपरा में कम रह गए हैं, जो वागर्थ की नई और मौलिक अभिव्यंजनाएं संभव कर रहे हों. उनका एक कविता चयन व एक अन्य लघु कविता संग्रह संवाद प्रकाशन ने भी छापा है. पहाड़ों के दुख बांचते हुए वे कहते हैं- हम तो बसंत की तरह यहीं पैदा होते हैं/ और पत्‍तों की तरह यहीं झर जाते हैं/ कौवे हमसे अच्‍छा गाते हैं/ हमारे जीवन का कर्कश गद्य (कर्कश गद्य) जीवन के पक्ष में जगूड़ी के काव्‍यप्रयत्‍नों को इन पंक्‍तियों में देखिए--
चाहता हूँ मृत्‍यु को एक अच्‍छी तरह बरता हुआ
कपड़ा मिले
जो सचमुच पहनने रहने लायक न रह गया हो
चाहता हूँ कि मृत्‍यु को वह आंख मिले
जो अपने सारे सपने देख चुकी हो
और उससे मृत्‍यु कोई सपना न देखा पाए (कविता का अमरफल, पृष्‍ठ- 87)
आज कोरोना से हो रही अकाल मौतों के संदर्भ में इस कविता को पढ़िए तो कितनी सहज कवि की शुभाशा है. ऐसी कविता लिखने वाले अब कितने कम कवि भी बचे हैं हिंदी में!  

आज कविता में आवेगधर्मिता का बोलबाला है या राजनीतिक प्रत्ययों को तत्काल कविता में अंतरित करने की हड़बड़ी. इसलिए शुद्ध कविता का सूचकांक जरूर एक हद तक प्रभावित हुआ है पर वह जगूड़ी, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी एवं ज्ञानेंद्रपति जैसे कवियों में आज भी मौजूद है. ज्ञानेंद्रपति पर पिछले दो दशकों से काशी का प्रभामंडल कुछ इस कदर हावी रहा है कि वे अब तक इससे मुक्त नहीं हुए हैं. 'गंगातट' के लगभग 12 वर्षों बाद 2019 के पूर्वार्ध में आया 'गंगाबीती' संग्रह इस बात का परिचायक रहा कि काशी ने उनके कवि चित्त को अपने आकर्षणों से मुक्त नहीं किया है. इस साल आया संग्रह 'कविता-भविता' कविता कसौटियों पर उनकी कवि-दृष्टि का विस्तार है. कविता को समझने में उनकी कविताएं - 'कविता की प्रतीक्षा', 'कविता धूपछॉंही', 'दुनिया को धुनिया चाहिए एक', 'शीर्षक कविता का शीश है', 'शब्दों में जो रोशनी है', 'मैं शब्द को पुकारता हूँ', 'एक कविता उठाता हूँ' जैसे किसी काव्यशास्त्र को कविता में साधने की कोशिश लगती हैं. व्यंजना का सुख जगूड़ी में है तो अभिधा का सुख ज्ञानेंद्रपति में. प्रतिरोध और नैराश्‍य के कवि मंगलेश डबराल का सेतु प्रकाशन से आया संग्रह 'स्मृति एक दूसरा समय है' जैसे कविता का स्थायी प्रतिपक्ष हो, पर सीमा यही कि मंगलेश डबराल ने अंत तक अपनी कविता का पैटर्न और मिजाज नहीं बदला. शायद उन्हें दस वर्ष और मिल जाते तो वे कविता में कुछ अलग मोड़ और शैली आविष्कृत कर पाते .

सेतु से ही गए साल शैलेय के 'बीच दिसंबर', अनिल मिश्र के 'भूखे पेट की रात लंबी होगी' व अनिल करमेले के 'बाकी बचे कुछ लोग' तथा भावना से राजकुमार कुंभज जैसे वरिष्‍ठ कवि के संग्रह 'था थोड़ा लोहा भी था' भी आए हैं पर वे कविता का बहुत अनूठा प्रतिबिम्ब नहीं रच पाते. प्रेम कविताओं के आगार में अब तक हिंदी की दुनिया में लगभग सर्वाधिक कविता संग्रहों के कवि लालित्‍य ललित की प्रेम कविताओं का चयन सं. सुनीता शानू भी समाविष्‍ट हो गया है.  

कविता का सूचकांक

दार्शनिक कविताएं लिखने वाली अमृता भारती की 'भूमिका', दुर्गाप्रसाद गुप्त की 'अँधेरेपन में भी इश्क सूफी है', तेजी ग्रोवर की 'मैत्री', निर्मला तोदी की 'रिश्तों का शहर', अनिल पुरोहित की 'विभीषण की अनुचिंता' जैसी नई काव्यकृतियों के अलावा वाणी प्रकाशन ने प्रभा खेतान, उदय प्रकाश व कात्यायनी के कई पुराने संग्रहों के नए संस्करण छापे हैं. विशाखा तिवारी ने जीवन की उत्तरशती में 'हथेलियों में चॉंदनी' लिख कर तो मीना सिंह ने 'दूसरी हथेरी पर' संग्रह से नई कविता में अपना प्रवेश दर्ज किया है. संजय अलंग का संग्रह 'नदी उसी तरह सुंदर थी जैसे बाघ' नरेश सक्सेना के शब्दों में सूक्ष्मता सौंदर्य और संवेदना का एक सुघर उदाहरण है. कविता के अनन्य साधक नरेश अग्रवाल ने पांच खंडों में 'सुबह की प्रार्थना' लिख कर परम  सत्ता के प्रति अपना विनय प्रदर्शित किया है तो युगल कवियों में सच्चिदानंद जोशी व मालविका जोशी का साझा संग्रह 'यॅूं ही साथ-साथ चलते' दाम्पपत्य की सुखद संवेदना से हमें जोड़ता है. इसके अतिरिक्त--सूरज को अँगूठा 'जितेंद्र श्रीवास्तव', सुनील वाजपेयी 'पथिक धर्म', अनिल कुमार पाठक 'अप्रतिम', हिमांशु मांगलिक 'एक बरगद की छांव में' व आलोक मिश्र 'लखनपुर और अन्य कविताएं' के संग्रह जीवन के अनुभवों को सहजता से उकेरते हैं. पर इस बार संग्रहों की संख्या से यह लगता है कि कविता का सूचकांक भले उन्‍न्‍त हुआ हो, पर कविता में अंत:करण का आयतन संक्षिप्त ही है.

कविता का उर्वर प्रदेश

कभी अरुण कमल की कविता 'उर्वर प्रदेश' युवा कवियों की अग्रगामी रचनात्मतकता का प्रतीक बन गयी थी. युवा कवियों के खाते में इस बार भी ज्यादा संग्रह हैं. साल 2020 के दौरान आए अनेक युवा कवियों के संग्रहों में प्रियदर्शन का संग्रह 'यह जो काया की माया' अपने अंदाजेबयां में अनूठा है. इसी क्रम में राजस्थान के युवा कवि प्रभात का संग्रह 'जीवन के दिन' काफी ध्यानाकर्षी रहा है. प्रभात की कविताएं जिस तरह राजस्थान की आंचलिकता में गहरे धंसी हैं, वे सचमुच के जनसरोकारों के कवि के रूप में उभरे हैं जिनमें भारतीय ग्रामगंध समाई हुई है. उनकी कविताएं यथार्थ और मनोविज्ञान की गहरी उथल पुथल का परिणाम हैं. कविता की समकालीनता से अलग दशरथ माझी की तरह दुर्गम राह गढ़ने वाले 'वह गाता है अनघ सनातनजयी' की राह पर चलने वाले प्रेमशंकर शुक्ल पिछले दो दशक से कविता की एक नई भारतीय प्रजाति ही विकसित कर रहे हैं. कुदरत से जुड़ कर उन्होंने कविताओं की अनेक श्रृंखलाएं लिखी हैं. साल 2020 में आए उनके दोनों संग्रह 'अयस्क वर्णमाला' और 'शहद लिपि' अनूठे हैं. 'शहद लिपि' प्रेम कविताओं का संग्रह है तो 'अयस्क वर्णमाला' सामान्य कविताओं का. कविता की पायदान पर उत्तरोत्तर अग्रसर प्रेमशंकर शुक्ल हर बार कविताओं में मौलिक उद्घाटन के साथ सामने आते हैं.

इस साल के अन्य संग्रहों में अरुण देव का संग्रह 'उत्तर पैगम्बर' उनके जीवंत कवि-सामर्थ्य का प्रमाण है. परिपक्व संवेदना के धनी अरुण देव का यह संग्रह बेमिसाल है जहां 'धरती' गेहूँ का उचित मूल्‍य और 'उत्तर पैगंबर' जैसी अनेक बेहतरीन कविताएं हैं. कहना न होगा कि तीसरे संग्रह तक आकर कविता की एक मुकम्मल शैली अरुण देव ने निर्मित कर ली है जहां उसकी यह पुकार कितनी मानवीय और भारतीय लगती है:
बचाओं हवा को जल को
पहाड़ और रेगिस्‍तान को
बचाओं मछलियों को इस बड़े जाल से
पक्षियों को धुऍं से भरे आकाश से
वृक्षों को आरी और कुल्‍हाड़ी से
खेत को उर्वरक और कीटनाशक से
अपने पेट को मारे गए जानवरों की कब्रगाह होने से बचाओ
बचने के लिए बचाओ (उत्‍तर पैगंबर, पृष्‍ठ 60)

शिरीष कुमार मौर्य की कविताएं भी प्रगाढ़ परिपक्वता का परिचायक हैं. 'रितुरैण' पढ़ते हुए जैसे हम कालिदास के ऋतुसंहार का सा आस्वाद पाते हैं. आंतरिक रागात्मक विन्यास में पगी ये कविताएं शिरीष के सुचिंतित कवि दृष्टि का परिचय देती हैं. कलाकार होने के नाते अमित कल्ला में अमूर्तन के गुण है. चित्रकारिता से इनकी कविताई में एक खास निखार आया है जिसका सबूत इनका संग्रह 'शब्द कहे से अधिक' देता है. 'काजल लगाना भूलना' संग्रह के कवि व्योमेश शुक्ल युवा पीढ़ी के 'केशव' हैं. बनारस में ज्ञानेंद्रपति के बाद निश्चय ही कविता में व्योमेश शुक्ल ही नज़र आते हैं किन्तु वे 'मास' के नहीं, 'क्लास' के कवि हैं जो पाठकों ही नहीं आलोचकों और कवि-मति-धीर अध्यापकों का भी इम्त्हान लेते नजर आते हैं. पर यह भी सच है कि 'अनुभव से जानना कि वसंत है', 'सड़क' और 'कुछ का कुछ' जैसी कविताएं केवल व्योमेश ही लिख सकते हैं. सुधांशु फिरदौस का संग्रह 'अधूरे स्वांगों के दरमियान' प्यास तो जगाता है पर तृप्त  नहीं करता.  प्रतिमा सिन्हा का पहला संग्रह 'दिल दरबेश' प्रेम और अनुराग से भीगा है तथा लगता है कि यह कवयित्री एक अलग भाषा संवेदना पाने के लिए विकल है. बिल्कुल हाल ही में कविता मे आगत जयपुर की कवयित्री उषा दशोरा का संग्रह 'भाषा के सरनेम नहीं होते' अपने अनूठे अंदाजेबयां से लुभाता है. उषा के यहां बात कहने का काव्यात्मक सलीका है, व्यर्थ का नैरेटिव और शोर नहीं. इसी तरह रश्मि रमानी के संग्रह 'सत्तावन कविता स्वप्न‍' में अनुराग की एक नरम छॉव है तो चित्रा देसाई का दूसरा संग्रह 'दरारों में उगी दूब' उनकी कविताई का एक और संतोषजनक प्रमाण है. 'कै़द में नागफनी' राकेश कुमार, 'चीनी कम' अनीता कुमार तथा 'रथ के धूल भरे पॉंव' अजित कुमार राय भी इस साल के ध्यानाकर्षी संग्रहों में हैं.

लेकिन इन सबमें जो एक संग्रह अपनी विदग्ध और मार्मिक कविताओं से भिगोता है, समाज की पूर्वग्रहधर्मी दृष्टियों पर सवाल उठाता है, इस दी हुई दुनिया को मनुष्यता के लिए अधूरी और अपर्याप्त मानता है वह है वीरू सोनकर का संग्रह 'मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है'. एक तल्ख प्रतिरोध का स्वर उनके यहां पग पग पर व्यंजित है. गौरव गुप्ता के संग्रह 'तुम्हारे लिए' बाहर से प्रेम कविताओं का आभास अवश्य देता है किन्तु भीतर से जीवन के बृहत्तर आयामों वाला संग्रह है. गौरव की कविताएं अपनी मितभाषिता में मूल्यवान जीवन-सारांश सहेजे हुए हैं.

युवा कवियों में अनेक की कविताएं भीड़ में पहचान लेने वाली ताकत रखती हैं. अन्य‍ युवतर कवियों में अनेक ऐसे भी संग्रह प्रकाशित हुए हैं जिन्हें  देखकर लगता है युवाओं में कविता लेखन का 'पैशन' तो है, पर वह बींधती हुई कवि-दृष्टि नहीं. 'मन के मनके' अनिता मोहन, 'बस यूँ ही' हर्षिता व्यास, 'छोटे शहर की लड़की' प्राची त्रेहन, 'वो एक स्कालर' राधा टंडन, 'पटना टू पोर्टलैंड- एक बटोही' संदीप सोनी ऐसे ही संग्रह हैं जो इन कवियों को कविता की कक्षा में प्रवेश तो दिलाते हैं पर उनके कवित्व-कौशल को आश्वस्ति के लिए अभी अनुभव के एक लंबे दायरे से गुजरना है. प्रशासनिक अधिकारी रविन्द्र कुमार के कैशोर्य की कवि-संवेदना का उदाहरण प्रस्तुत करता 'आंतरिक अंतरिक्ष और स्वप्न‍ यात्रा' ब्लूम्सबरी की भेंट है तो विजया बुक्स से आगत डॉ. जितेंद्र सोनी का संग्रह 'रेगमाल' उनकी कहानियों की तरह ही संवेदनात्मक मार्मिकता का एक अनन्य उदाहरण बन गया है जो लिखते हैं:
''जिंदगी जब रेगमाल हो जाती है
तो खयाल खुरदुरे,
सवाल कुंद और इरादे बुलंद हो जाते हैं.''
इधर आगरा के एक कवितानुरागी परिवार ऐसा भी है, जहां अनिल शर्मा का 'कहीं कुछ कम है' के साथ उनके पुत्र जयंत शर्मा 'खामोशी का शोर' और उनकी नातिन गार्गी 'समर म्‍यूजिंग' तीनों के संग्रह 2020 में एक साथ आए हैं.

साल 2020  जिन कुछ अन्य अच्‍छे कविता संग्रहों के लिए याद किया जाएगा उनमें बोधि द्वारा प्रकाशित मणि मोहन का संग्रह 'भेड़ियों ने कहा शुभरात्रि', विजय गौड़ का संग्रह 'मरम्मत से काम बनता नहीं', अतुलवीर अरोड़ा का संग्रह 'धुऍं के गहन में', मृगतृष्णा का संग्रह 'यार पिता'- ऐसे ही संवेदनासिद्ध संग्रह हैं. अपने प्रयासों में निवेदिता का 'जंगल और मैं', धीरज श्रीवास्तव का 'कुछ देखते हुए कुछ बुनते हुए', भारती पंडित का 'सी बीच और अकेली लड़की', बलवीर सिंह करुण का 'कल कहीं ऐसा न हो' व किशोर अग्रवाल का 'ज़रा सी धूप' संग्रह कविता की अनवरत विकलता का पर्याय हैं. साल के उत्तरार्ध में रश्मि प्रकाशन के कई संग्रहों में नताशा के संग्रह 'बचा रहे सब' में परिपक्वता की ओर बढ़ती कवयित्री के लक्षण दीखते हैं. हिंदी कविता का बोलबाला प्रवासियों के यहां भी कम नहीं है. हिंदयुग्म से प्रकाशित 'सिंगापुर-नवरस' शीर्षक काव्यकृति में सिंगापुर के कवियों- चित्रा गुप्ता, संजय कुमार, शीतल जैन, आलोक मिश्रा, आराधना श्रीवास्तव, अमितेष, श्रद्धा जैन, गौरव उपाध्याय एवं वंदना सिंह की रचनाएं शामिल की गयी हैं. यह चयन स्तरीय भले न हो पर प्रवासी दुनिया में कविता के पर्यावरण के निर्माण में इसका योगदान अवश्य है.

कोरोना दौर में कविता

यह दौर कोरोना जैसी महामारी से ग्रस्त रहा है जिसे कवियों ने अपनी रचनात्मकता के आईने में देखा और सिरजा है. कोरोना कविताओं के कुछ चयन भी सामने आए हैं. यश मालवीय ने इस दौरान बहुत मार्मिक गीत लिखे हैं. कोरोना व्याधि के विभिन्न  पहलुओं पर अशोक चक्रधर का एक कविता चयन 'गई दुनिया नई दुनिया' सामने आया तो संजय कुंदन ने कोरोना पर लिखी मुक्त छंद के कवियों की कुछ रचनाएं 'कोरोना में कवि' नाम से संकलित की हैं जिसमें फ़रीद ख़ान, हरि मृदुल, बोधिसत्व, सुभाष राय, निरंजन श्रोत्रिय, शिवदयाल, श्रीप्रकाश शुक्ल, संजय कुंदन, मदन कश्यप, विष्णु नागर, विजय कुमार, लीलाधर मंडलोई, नवल शुक्ल, सृष्टि श्रीवास्तव और देवीप्रसाद मिश्र की कविताएं संकलित की गयी हैं, पर यह अपने परिवृत्त के भीतर के उपलब्ध कवियों के ही चयन हैं (जो आसानी से मिल गया).  हालांकि इनमें विजय कुमार, देवीप्रसाद मिश्र, विष्णु नागर, बोधिसत्व  व खुद संजय कुंदन की कविताओं को छोड़ कर विचार, संवेदना व कथ्य  को लेकर कोई बड़ी उद्भावना नहीं की गयी है. विजय कुमार ने वायरस की व्याप्ति से छटपटाते पूरे विश्व की रुँधती हुई सांसों और अंत के निकट आ पहुँची मानव सभ्यता के भयाक्रांत समय को गहरे संवेदन और व्यथा से पकड़ा है.

जाहिर है विपुल काव्य वसुधा में लिखी जा रही कविताओं में ये कविताएं नगण्य हैं- इससे बहुत वैविध्यपूर्ण संसार उन कविताओं का है जो अनेक वेब पोर्टल पर लिखी और सराही गयी हैं. लॉकडाउन के दौरान एस आर हरनोट की इस चेतावनी देती सी कविता को भला कौन भुला सकता है- देखो मनुष्य! देखो इस अंधकार को/ महसूस करो/ भीतर के एकाकीपन/ और सन्नाटे को/ बाहर सबकुछ यथावत है/ सूरज चांद नदियां और हवा/ फिर भी तुम्हारे पास/ न रोशनी बची है न हवा/ आज तुम न हिन्दू हो न मुसलमान/ न सिख न ईसाई/ न तुम्हारी कोई जाति/ निष्क्रिय हैं तुम्हारे सारे हथियार/ एक निरीह प्राणी/ सबकुछ होते हुए भी निहत्थे....इसी क्रम में खुद अशोक वाजपेयी की समालोचन पर आई 'कोराना एकांत में कुछ कविताऍं' सीरीज की- 'हम अपना एकांत नहीं लिख पाएंगे', 'पृथ्वी का मंगल हो' मार्मिक कविताएं हैं, जो यहां होनी चाहिए थीं. पर 'जो नहीं है उसका ग़म क्या?'

मैं लिखूँगा गीत

कविता के बाद सबसे लोकप्रिय छंद विधा ने मंच के साथ गीत की शास्त्रीयता को भी साधा है. माहेश्‍वर तिवारी, नचिकेता, अश्वघोष, राम सेंगर, दिनेश शुक्ल, अनूप अशेष, यश मालवीय, देवेंद्र आर्य, प्राची सिंह व चित्रांश बाघमारे जैसे कवि इस विधा को अपनी सक्रियता से जीवंत बनाए हुए हैं. पर गीतों में भी भेड़ियाधसान बहुत है, स्‍तरीयता कम. तुक की परिधि के चक्‍कर लगाते कवियों को गीत में नए मोड़ों की कोई परवाह नहीं है. तभी मैं कहा करता हूँ गीत का स्‍वर्णिम युग विदा हो चुका है. ऐसे हालात में रमेश रंजक का कहा याद आता है कि गीत में लय यति गति व तुक का एक तर्क होना चाहिए पर लोग ज्‍यादातर गीतों में कबड्डी खेलने लगते हैं. तथापि साल 2020 सुपरिचित नवगीतकार अश्वघोष के दो संग्रहों 'आदमी हैरान है' एवं 'मेरा सपना सबका सपना', जगदीश पंकज 'अवशेषों की विस्मृत गाथा',  देवेंद्र आर्य 'सपने कौन खरीदेगा', संज्ञा सर्वनाम-बोली संवाद, सघर्षों के शिलालेख' शिवानंद सिंह सहयोगी जैसे संग्रहों का साक्षी है. देवेंद्र आर्य के संग्रह 'सपने कौन खरीदेगा' गीत में उनकी पैठ की बानगी देता है. युवा गीतकार शुभम श्रीवास्‍तव का संग्रह 'गीत लड़ेंगे हथियारों से' भी बीते साल ही आया है पर इसमें उस जुझारूपन और तल्‍खी का अभाव है जिसे राम सेंगर व यश मालवीय जैसे कवियों ने आज भी सहेज कर रखा है.  

आज सोशल मीडिया पर लक्ष्मीशंकर वाजपेयी जैसे कवि विभिन्न काव्य विधाओं को बचाने की मुहिम चला रहे हैं ताकि गीत, प्रगीत, नवगीत, सवैये, घनाक्षरी, दोहे, चौपाई, बरवै, हाइकू, सानेट, माहिया हमारे बीच से लुप्त न हो जाएं. सुधांशु उपाध्याय व कामायनी उपाध्याय के साझा संग्रह 'ग़ज़ल हमारी गीत तुम्हारे' कविता में एक नया रंग भरते हैं. श्वे‍तवर्णा प्रकाशन से 2020 में गीत व दोहे के कई संग्रह छपे हैं. यहीं से महिला नवगीतकारों का एक चयन शीला पांडेय ने संपादित किया है- 'सूरज है रूमाल में' जो नवगीत के क्षेत्र में रचनारत कवयित्रियों को एक साथ प्रस्‍तुत तो करता है पर चयन की दृष्‍टि से इसमें सख्‍ती नहीं बरती गयी है. काश कि ऐसे संपादक के समक्ष 'पॉंच जोड़ बांसुरी' जैसे मानक संचयन की कोई छवि और कसौटी होती. प्रमोद कुमार सुमन का हाइकू संग्रह 'अदृश्य पंजों की छाप' इसी दिशा में एक प्रयास है. भावना प्रकाशन से प्रवासी कवयित्री शशि पाधा का संग्रह 'मौन की आहटें' भी आया है; पर छंद कविता, कविता की मुख्य धारा के प्रवाह के सम्मुख कितना टिक पाएगी, कहना मुश्किल है. आज द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जैसे सिद्ध कवि भी कहॉं हैं जो कितने विश्वास से कहते थे: मैं लिखूंगा गीत/ तुम गाना अमर हो जाएंगे हम.

ये ग़ज़ल का लहजा नया-नया

ग़ज़लें अब लगभग हिंदी काव्य के कुल गोत्र की पैदाइश-सी लगती हैं क्योकि इसकी रगों में गालिब ही नहीं, भारतेंदु हरिश्चंद और निराला, शमशेर, दुष्यंत कुमार, गुलाब खंडेलवाल, त्रिलोचन व अदम गोंडवी जैसे कवियों का रक्त बह रहा है. इधर हिंदी ग़ज़ल को माधव कौशिक ने नया प्रवाह दिया है. यश पब्लिकेशन्स से प्रकाशित 'नई सुबह की नई कहानी' व वाणी से प्रकाशित 'नयी उम्मीद की दुनिया' की ग़ज़लें नये अंदाजेबयां का परिचायक हैं. राजकमल प्रकाशन से आया अभिषेक शुक्ला का संग्रह 'हर्फ ए आवारा'- उर्दू की आधुनिक शायरी का एक नायाब नमूना है. राजपाल एंड संस से प्रकाशित सुरेश सलिल का 'हवाएं क्या क्यास हैं', गौतम राजर्षि 'नीला नीला', इरशाद खान सिकंदर 'आंसुओं का तर्जुमा, स्वप्निल तिवारी 'जि़न्दगी इक उदास लड़की है' की ग़ज़लें नये लबोलहजे का आग़ाज करती हैं.  डी.एम. मिश्र का संग्रह 'वो पता ढूढें हमारा'- वक्त के तल्ख यथार्थ को सामने रखता है. यश ग़ज़ल सीरीज में आए रामदरश मिश्र 'बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे', मुनव्वर राना 'ग़ज़ल में आपबीती', अदम गोंडवी 'धरती की सतह पर', सुरेंद्र चतुर्वेदी 'मत चराग़ों को हवा दो' व डॉ. हरिओम 'मैं कोई एक रास्ता जैसे' के संग्रह ग़ज़ल के प्रति नई पीढ़ी में आकर्षण जगाते हैं. अश्वघोष के दो ग़ज़ल संग्रह 'अँधेरे में शहर' और 'बैठा हूँ तनहाई में' मेधा बुक्स से आए हैं तो मंच की सुपरिचित कवयित्री ममता किरण का किताबघर प्रकाशन से आया संग्रह 'आंगन में शजर' ग़ज़ल में उनका पहला सधा हुआ कदम है. 'आखिरी इश्क सबसे पहले किया' में नोमान शौक का शायर और संजीदा तथा परिपक्व होकर प्रकट हुआ है.

कविता की पहचान  
                                                                          
हिंदी कविता अपने देशज गुणसूत्रों से पहचानी जाती रही है. आदि काल से कविता चाहे वह व्यास की हो, वाल्मीकि, कालिदास, भास की या भारतेंदु, तुलसी, सूरदास, कबीर, प्रेमघन, प्रसाद, महादेवी, निराला, नागार्जुन और त्रिलोचन की,  वह हमें यह बोध कराती है कि हम इस महादेश के कवि को पढ़ रहे हैं. वे रूप और अंतर्वस्तु में इतने विदेशी नहीं लगते थे, जितने आज के कवि हो गए और होते जा रहे हैं. आधुनिक कवियों में केदारनाथ सिंह भले रिल्के की तरह महीन बिम्बों के कवि रहे हों, पर वे अपने को भोजपुरी अंचल का कवि और पुरबिहा कहने में लज्जा का अनुभव नहीं करते थे. त्रिलोचन तो कहा ही करते थे, '' उस जनपद का कवि हूँ'' .  पर आज के कवियों को पढ़ते हुए मन में कभी कभी यह सवाल उठता है, कि ये भला किस जनपद या देश- प्रदेश के कवि हैं?  'गंगातट', 'गंगाबीती' या 'दिगंत' के सानेट पढ़ते हुए हमें यह नहीं महसूस होता है कि हम किसी विदेशी कविता के मुहावरे की छाया से गुजर रहे हैं, क्योंकि इन कवियों के पास एक मजबूत अंतर्देशीय सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्‍ठभूमि है. त्रिलोचन यह कहा करते थे, तुलसी बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी या नागार्जुन जिसने मादा सुअर तक में मादरेहिंद के दर्शन किए. कविता का ऐसा देशज सौंदर्यबोध अब कवियों में कहां दिखता है. आज के कवियों की हसरत यह होती है कि वह आक्तेवियो पॉज, ब्रेख्त, रोजे़विच, नेरूदा जैसे कवियों की तरह लिखें, पर वे उनके पासंग भी नहीं पहुंच पाते और इस चक्कर में उनकी अपनी जमीन दरक जाती है, जबकि यहां कम उर्वरता नहीं है. आखिर ज्ञानेन्द्रपति ने गांगेय संस्कृति के फलक पर ही केंद्रित रहते हुए वैश्विक संदर्भों के अनेक प्रश्न तो उठाए ही हैं.

कविता सदैव अपने देश-काल और समाज का आईना रही है. कविता और जीवन की लय में कोई अंतर नहीं है. भारत विविधताओं का देश है. कभी राष्ट्रकवि ने कहा था, 'जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है. वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है.' देश की संस्कृति को इस महादेश के लोगों ने सहेज कर रखा है. तीज त्योहार समारोह संस्कार सबमें हमारी भारतीयता बोलती है. पर क्या कविता में भी हमारी पहचान--हमारी भारतीयता बोलती है. निश्चय ही बोलती है. कभी मुखर रूप से कभी सांकेतिक रूप से. कभी ध्वनियों में कभी बिम्बों में कभी हमारी संवेदना में. यह स्थानीयता ही है जिसके अक्ष पर टिके रह कर हम पूरी वैश्विकता का खाका खींचते हैं. कवि की वैश्विकता स्था‍नीयता के बोध से विचलित नहीं होती. आज भी हमारे समय के अनेक कवियों में यह भारतीयता सुचित्रित दिखाई देती है- चाहे वह केदारनाथ सिंह हों, कैलाश वाजपेयी हों, त्रिलोचन व ज्ञानेन्द्रपति हों, लीलाधर जगूड़ी हों, अष्टभुजा शुक्ल, अरुण कमल हों, या युवा कवियों में आदिवासी अंचल की निर्मला पुतुल और जसिंता केरकेटटा हों, राजस्थान के प्रभात हों, भोपाल के प्रेमशंकर शुक्ल‍, कुशीनगर के अरुण देव हों, या उत्तरांचल के शिरीष मौर्य, इन्हें पढ़ते हुए इनके भीतर अपने देश के लिए चिंता, आबोहवा और कथ्य की स्थानीयता के साथ विश्‍व-चितां भी प्रतिबिम्बित होती है. साल 2020 के कवियों में कविता की दृष्टि से निश्चय ही बहुवस्तुस्पर्शिता पाने की कोशिश दिखती है तथा वे अपने देश और काल में एक हद तक अपनी निजता को बचाए हुए हैं.

# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  
संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com

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