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कथेतर विधा की जिन पुस्तकों से होते हुए हम आए 2021 में

हाल के कुछ वर्षों में कविता कहानी और उपन्यास लेखन की पारंपरिक विधाओं से अलग नया बहुत कुछ रचा जा रहा है, जिसने न केवल विधाओं के नए क्षितिजों का उदघाटन किया है बल्‍कि एक नया पाठक संसार पैदा किया है. कथेतर गद्य की विविध विधाओं पर एक नजर

साहित्य 2020: कथेतर पुस्तकें, जिन्हें याद रखा जाएगा साहित्य 2020: कथेतर पुस्तकें, जिन्हें याद रखा जाएगा

एक दौर था परिदृश्य में केवल कविताएं, कहानियां व उपन्यास दिखते थे. न आत्मकथाएं थीं, न जीवनियां, न डायरी, न संस्मरण, न रेखाचित्र, न ढंग के यात्रावृत्त. किन्तु पिछले तीन-चार दशकों से हिंदी के रचनात्मक लेखन का स्वरूप बदला है. अब कहानी, उपन्यास व कविता जैसी पारंपरिक विधाओं की अपेक्षा कथेतर गद्य की बहुत ज्यादा मांग है. लोग जीवनी पढ़ना चाहते हैं, संस्मरण पढ़ना चाहते हैं, डायरी पढ़ना चाहते हैं- इन सब विधाओं में इधर ज्यादा लिखा भी जा रहा है. पर आज भी रेखाचित्र व ललित निबंध में लोगों का हाथ तंग है. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ राय, पं विद्यानिवास मिश्र के बाद से इस विधा में वैसी रौनक नहीं रही. हैं कुछ लोग जो लिखने को ललित निबंध लिख रहे हैं, पर न वैसा भाव है, न प्रभाव है, न वैसी ललक कि इन्हें पढ़ते हुए मन रमे. देखते-देखते रेखाचित्र की विधा लुप्त हो गयी. नाटक लिखे जाने बंद होते गए. ललित निबंध लिखे जाने कम होते गए. वैसे बहुअधीत संस्कृतिविद भी हमारे बीच नहीं रहे जो यह काम अंजाम दे सकें. यह महीन क्राफ्ट का काम है, सबके लिए साध्य नहीं. व्यंग्य भी हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल व ज्ञान चतुर्वेदी के बाद जैसे किसी अंधी गली में गुम हो गया है. व्यंग्यकारों में वह रेंज उत्तरोत्तर लुप्त हो रही है जिसे इन लेखकों ने अपने वक्त में कायम रखा और विकसित किया. सुशील सिद्धार्थ का अवधी बॉंकपन उनके व्यंग्य में नजर आता था, जिससे उम्मीद की जा सकती थी पर वे रहे नहीं. सम्पत सरल जैसे व्यंग्यकार मंच को समर्पित हो चुके. यों आज के व्यंग्य में भीड़ काफी है- प्रेम जनमेजय, सुरेश कांत, लालित्‍य ललित, रमेश सोनी आदि हैं, पर व्यंग्य का कोई खास प्रतिबिम्ब बनता नजर नहीं आता. सब फुटकर हैं, बँधा नोट कोई नहीं. आलोक पुराणिक जैसे कुछ विरल लोग मैदान में हैं पर यह मैदान ज्‍यादातर औसत प्रतिभाओं से अँटा पड़ा है. कथेतर विधाओं में अन्य विधाएं भी आ जुड़ी हैं. इंटरव्यू भी उनमें एक है. खोजी विश्लेषण भी है. तथापि, कथेतर विधाओं में बहुत सा नया लिखा जा रहा है जिसकी मांग भी इन दिनों सर्वाधिक है.

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गांधी चिंतन और पुस्तकें

हमारे यहां श्रद्धा का दौर उमड़ता है तो उमड़ता ही चला जाता है. ऐसी ही श्रद्धा गए साल देश में राष्ट्रपिता के रूप में समादृत मोहनदास करमचंद गांधी पर उमड़ी. जहां तक साहित्य-2020 का  कथेतर परिदृश्य रहा है, गांधी 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में लगातार चिंतन और विमर्श में बने रहे और तमाम पत्रिकाओं के अंक उन पर आए. कई पुस्तकें उन पर लिखी गयीं. यह सिलसिला साल 2019 में ही शुरू हो गया था. उस साल भी गांधी पर अनेक पुस्तकें आई थीं, जिनमें - बसंत कुमार मल्लिक की 'गांधी एक भविष्य वाणी' और जोसेफ जे. डोक की पुस्तक 'गॉंधी-दक्षिण अफ्रीका में भारतीय देशभक्त' के अनुवाद से लेकर मुरियल लेस्टिर की पुस्तक 'गांधी की मेजबानी' तक. यह सिलसिला 2020 में भी बना रहा.

इसका एक ही अर्थ है कि गांधी आज भी प्रासंगिक हैं. सत्ता पक्ष के लिए गांधी को लेकर असमंजस भी है और पुजौती का भाव भी. बहरहाल गांधी पर अकबर इलाहाबादी की 'गांधीनामा' वाणी से प्रकाशित हुई है जिसकी खूबसूरत प्रस्तुति रक्षंदा जलील ने की है तथा लिप्यंतरण किया है प्रदीप साहिल ने. व्यंग्यात्मक लहजे में अकबर इलाहाबादी ने गांधी की भारतीय राजनीति में उपस्थिति को लेकर सामान्य मुस्लि‍म समाज की ज़हनी कश्मकश को चुटीले तेवर में व्यक्त किया है. समाज के हर तबके के लिए गांधी कुतूहल का विषय रहे हैं. गांधी तत्कालीन भारतीय राजनीति की धुरी थे और अकबर एक चुटीले शायर. गांधी के लिए उनका एक शेर यों है: ' सुन लो ये भेद, मुल्क जो गांधी के साथ है/ तुम क्या  हो, सिर्फ पेट हो, वो क्या है, हाथ है.'

'गांधी की सुंदरता' शीर्षक एक भव्य पुस्तक युवा कवि सुशोभित की आई है. गांधी को लेकर एक युवा लेखक क्या सोचता है यह सुशोभित ने गांधी की वे खूबियां बयान की हैं जो अक्सर गांधीवादी छवि से परे जाती है. गांधी को लेकर अपार दुष्प्रचार या अपार श्रद्धा के बीच सुशोभित ने एक नया समकालीन और सुसंगत नेरेटिव बुनने का यत्न किया है. वे कहते हैं जिस तरह अनुपम मिश्र साफ माथे का समाज की बात करते थे, यह पुस्तक साफ माथे की पोथी है जो गांधी को लेकर कई पीढ़ियों की आंखों में फैले जाले को साफ करने का काम करती है. इसी संदर्भ में उदयन वाजपेयी के अनुवाद में जेम्सी डब्लू डगलस की पुस्तक 'गांधी और अकथनीय'  प्रकाशित हुई है. गांधी को लेकर अतीत की तमाम घटनाओं के साथ 'गांधी को किसने मारा' पुस्तक अशोक कुमार पांडेय के शोध और विश्लेष्णाधारित तार्किक निष्कर्षों का निचोड़ है, जिसकी इस साल काफी चर्चा रही है. गांधी पर सुपरिचित गांधीवादी लेखक श्रीभगवान सिंह ने गांधी के आश्रमों को लेकर एक रोचक पुस्तक लिखी है 'गांधी के आश्रम संदेश हैं' जिसे उन्होंने गांधी के देश विदेश में फैले आश्रमों की यात्राओं एवं शोध  के उपरांत अद्यतन रूप से प्रस्तुत किया है. इसके अलावा श्रीभगवान सिंह ने ही 'गांधी और हिंदी साहित्यं' विषयक पुस्तक में हिंदी साहित्य  में गांधी की व्याप्ति का संतोषजनक अध्ययन प्रस्तुदत किया है. कवि हेमंत कुकरेती ने भी 'गांधी दर्शन: आलोचनात्मक अध्ययन'  में गांधी को एक कवि की अंतरात्मा से देखा और साक्षात्कार किया है. सुजाता की पुस्तक 'नोआखालीः एक व्यक्ति की विजयी सेना' भी महात्मा से जुड़े तमाम ऐतिहासिक सच को लेकर सामने आती है.

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संस्मरण एवं जीवन-आख्यान

आज जब खुद के बारे में ही आत्मालाप करने का चलन हो, पुरखों को व अपने संगी साथियों को भला कौन याद करता है. याद भी करता है तो अपनी महानता के उद्घोष के साथ कि देखों मेरा कद क्या था. बहुतों के संस्मरण पढ़े हैं- पढ़ कर बहुतों के गद्य के प्रति आसक्ति और आकर्षण बढ़ा है. अशोक वाजपेयी हमेशा यह कहते रहे हैं कि हिंदी की दुनिया अकृतज्ञों की दुनिया है- यह शब्दावली कुछ भिन्न हो सकती है पर आशय यही है. हम अपने पूर्वजों और समकालीनों के प्रति बहुत ही उपेक्षित रवैया अपनाए रहते हैं और बहुधा उसके न होने पर श्रद्धा की गागर उड़ेलते रहे हैं. हिंदी की दुनिया में यह व्याधि चौतरफा दीखती है. अशोक वाजपेयी की हाल ही में सेतु प्रकाशन से आई पुस्तक 'अगले वक्तों के हैं ये लोग' --हमारे समय के कुछ तेजस्वी शख्सियतों पर लिखे संस्मरण हैं जिन्हें अशोक जी ने बहुत आत्मीयता से याद किया है. अज्ञेय, शमशेर, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, इन्तेज़ार हुसैन, हरिशंकर परसाई, कृष्णा सोबती, कृष्णी बलदेव वैद, बदरी विशाल पित्ती , निर्मल वर्मा, श्रीकांत वर्मा, मल्लिकार्जुन मंसूर, कुमार गंधर्व, सैयद हैदर रज़ा, जगदीश स्वामीनाथन, ब. व. कारंत, व अर्जुन सिंह इन अठारह विभूतियों के बारे में तमाम यादों को ऐसे संजोया है जैसे वह कोई धरोहर हो. अशोक वाजपेयी के ये संस्मरण आज के स्मृ्तिहीन समय में यादगार संस्मरण हैं.

हिंदी में रवीन्द्र कालिया एक कल्ट की तरह युवाओं के प्रेरणास्रोत रहे हैं. जालंधर में पले बढे और अरसे तक इलाहाबाद में रहने के बाद वे कोलकाता और दिल्ली रहे. कोलकाता और दिल्ली के कथाकार संपादक रवींद्र कालिया का तेवर इलाहाबाद से जुदा था. वे छिनाल प्रकरण इत्यादि कारणों से विवादों में भी रहे, दिलचस्पियों का केंद्र भी. ममता कालिया ने उनके व्यक्तित्व के अनेक रंगों को अपनी यादगार पुस्तक 'रवि-कथा' में बहुत ही आत्मीय और भावुक अंदाज में प्रस्तुत किया है. कहना न होगा कि ममता जी का गद्य किन्हीं मामलों में कालिया से भी बेहतर कोटि का था, जिसका प्रतिबिम्ब 'कितने शहरों में कितनी बार' सहित इस कृति में भी झलकता है. ममता कालिया की ही एक और पुस्तक 'यादें और किताबें' सूर्य प्रकाशन मंदिर से आई है. इसी तरह कथाकार संपादक अवधनारायण मुद्गल के जीवन और व्‍यक्‍तित्‍व पर आधारित कथाकार चित्रा मुदगल का जीवन आख्यान 'तिल भर जग नहीं' अवध नारायण मुद्गल के लेखकीय जीवन के साथ न्याय करता है. चित्रा जी ने अपनी निस्संगता व वस्तुनिष्ठता का परिचय देते हुए अवध जी के जीवन, लेखन और पत्रकारिता के हर पहलू को बहुत ही सलीके से स्मरण किया है. कभी चित्रा जी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि मेरे सांवले सलोनेपन की तारीफ अवध जी खुल कर करते थे. इसमें साथ जिये गए जीवन की अनेक दुर्लभ छवियां भी हैं.

'हाशिमपुरा 22 मई' कथाकार एवं पुलिस अधिकारी रहे विभूति नारायण राय की संस्मरणात्मक कृति है. मेरठ के  हाशिमपुरा में हुए क्रूर नरसंहार कांड के सच और भयावह यथार्थ को विभूति नारायण राय ने अपने संस्मरण में विश्वसनीयता के साथ दर्ज किया है. 'रचना का अंतरंग' शीर्षक से आई कथाकार देवेंद्र की संस्मरणात्मक पुस्तक भी किस्सागोई के ताने बाने से भरी है. वाणी प्रकाशन से आई कुसुम अंसल की संस्मराणात्मक कृति 'कहने को बहुत कुछ था'- उनकी यादों का एक जीवंत दस्तावेज है. मुशायरों को लेकर आई इक़बाल रिज़वी की किताब 'क्या हो रहा है मुशायरों में अब'- मुशायरों के इतिहास को लेकर यादगार पुस्तक बन गयी है. न्यूज रिपोर्टिंग की दास्तान भी कथा रिपोर्ताज की तरह रोमांचित कर सकती है, अपने पत्रकारीय जीवन के अनुभवों को लक्ष्मी प्रसाद पंत ने बहुत ही रोचक अंदाज में 'न्‍यूजमैन@ वर्क' में प्रस्तुत किया है.

संस्मरण विधा में ही किताबघर प्रकाशन से आई 'समय की स्मृति' में समकालीन लेखकों के संस्मरण हैं. इसमें विद्यानिवास मिश्र, विष्णुकांत शास्त्री, मनोहर श्याम जोशी, शिवप्रसाद सिंह, नागार्जुन और अशोक वाजपेयी व लीलाधर जगूड़ी जैसे 21 लेखकों के संस्मरण विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने लिखे हैं. उन्होंने साहित्य अकादेमी के अपने कार्यकाल के दौरान हुए साहित्यिक विवादों को भी संस्मंरणों में उठाया है. अस्ति और भवति के बाद ये छोटे-छोटे लेखकीय संस्मरण इन लेखकों के व्यक्तित्‍व को समझने में सहायता करते हैं तथा रम्य रचना की तरह पठनीय हैं.

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आत्मकथा और जीवनी

आत्मकथा भी अब एक बहुत ही आकर्षक विधा बन चुकी है. यह अलग बात है कि आत्मकथाओं में कितनी ईमानदारी से लेखक पेश आते हैं. हिंदी के बेस्टसेलर उपन्यास लिखने वाले सुरेंद्र मोहन पाठक की आत्मकथा 'निंदक नियरे राखिए' इस अर्थ में भरपूर रोचकता लिए हुए है. एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय लेखक बनने की सुरेंद्र मोहन पाठक की यात्रा कितनी उतार चढाव भरी रही है, इस पुस्तक में वे लेखक प्रकाशक पाठक सबसे अपने रिश्ते पर बेबाक बातें करते हुए नजर आते हैं. लोकवार्ताओं के सुधी अध्येता और सुंदर गीतों की रचना करने वाले श्याम सुंदर दुबे की आत्मकथा 'अटकते भटकते' यश पब्‍लिकेशन्‍स से आई है जो उनके सुदीर्घ जीवन के निजी व साहित्यिक प्रसंगों को उद्घाटित करती है. हिंदयुग्म से आई 'कालो थियु सै, पागल हुए हो?' - कथाकार किशोर चौधरी के संस्मरणों की कृति है जहां वे किस्सागोई के तानेबाने में ही अपनी यादों को पन्नों पर दर्ज करते हैं.

जीवनी लेखन की दिशा में गए साल कुछ प्रयत्न बेहतरीन कहे जा सकते हैं. सुधी कवयित्री प्रतिभा कटियार ने बहुत मेहनत से रूस की महान कवयित्री मारीना त्‍स्वेतायेवा के युग और जीवन पर 'मारीना' शीर्षक कृति लिखी है, जिसमें उनके तमाम बिखरे फैले संदर्भों को खँगाल कर उसके बचपन, युवावस्था, निर्वासन और मास्को वापसी के वृत्तांत को जीवनी के शिल्प में ढाला गया है. इस कार्य में उनका सुयोग्य मार्गदर्शन रूसी साहित्य के अध्येता अनुवादक वरयाम सिंह ने किया है सो 'मारीना' में भाषा, आख्यान और शोधपरक तथ्यों के सुनियोजन में प्रतिभा कटियार का रचनात्मक श्रम और संवेदनशील स्त्री मन भी पग-पग पर झलकता है. मारीना के जीवन के तथ्‍य इस तरह रुसी पत्र पत्रिकाओं में बिखरे थे कि बिना पर्याप्‍त अध्‍ययन व सहायता के यह काम पूरा नहीं किया जा सकता था, पर प्रतिभा ने बेहतरीन तरीके से इस पुस्‍तक को साधा है. इसी तरह गए साल संवाद प्रकाशन से आलोक श्रीवास्‍तव की लिखी 'गांधी की जीवन कहानी'  भी आई है. 'गांधीगिरी बनाम गुलामगिरी और दादागिरी' यानी गांधी की प्रासंगिकता पर इतिहासज्ञ लालबहादुर वर्मा की पुस्‍तक सुचिंतित तर्कों से भरी है.

इसी क्रम में बालीवुड के महान खलनायक प्रेम चोपड़ा पर उनकी बेटी रंकिता नंदा की लिखी किताब ' प्रेम नाम है--प्रेम चोपड़ा' एक खलनायक के भीतर के बेहतरीन मनुष्य  का साक्षात्कार कराती है. 2019 जहां रघुवीर सहाय व नागार्जुन पर आई बेहतरीन जीवनियों का गवाह रहा है, तो प्रो पुष्पेश पंत की गए साल आई पूर्व सांसद एवं राजनेता डीपी त्रिपाठी पर प्रकाशित 'देवी के डीपीटी बनने की कहानी' एक राजनीतिज्ञ एवं बहुज्ञ व्यक्ति का रोचक वृत्तांत है. डी.पी. जिस महफिल में मंच पर होते थे, उनके बोलने से उस विषय का पूरा अवगाहन हो जाता था. रफी शब्‍बीर की लिखी एक बेहतरीन जीवनी आईसेक्‍ट प्रकाशन से शकीलाबानो भोपाली की आई है - बानो का बाबू' जो अपने जमाने की जानी मानी कव्‍वाल थीं.

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रम्य रचना: उल्लेखनीय उपस्थिति

एक जमाना था, अमृत राय की एक रम्य रचना 'रम्या' नाम से आई थी. छोटे-छोटे निबंधों में जीवन के अनुभवों को सहेजने वाले उन निबंधों की तरह ही युवा कवि सुशोभित की दो बेहतरीन रम्य' कृतियां गए साल आईं-- बायस्कोप, यश पब्लिकेशंस से  एवं सुनो बकुल, प्रतिश्रुति प्रकाशन से. सुशोभित का लेकीय विस्फोट सच कहें तो इधर दो तीन साल के भीतर हुआ है और जबर्दस्त हुआ है. बायस्कोप और सुनो बकुल को फुर्सत के क्षणों में पढ़ा और उनमें रमा जा सकता है. बायस्कोप में सुशोभित ने अपने शहर उज्जैन के अनेक ठीहों को जीवन के विश्वविद्यालय की संज्ञा दी है. लौकिक जिज्ञासाओं के सारे बिन्दु इस पुस्तक के निबंधों में मिलेंगे, यानी एक युवा के जीवन की वे छवियां जो इतने रचनात्मक ढंग से शायद ही कहीं अन्यत्र मिलें. निजी वृत्तांत पढ़ते हुए हम सबके भीतर का युवा जीवन जैसे जाग उठता है. सुशोभित की वृत्तांत-वृत्ति में एक तरह का ठहराव है, आत्मचिंतन और सुचिंतित विश्लेषण है जो उनकी हाल की पुस्तकों की अपनी विशेषता है. 'सुनो बकुल' में वे विभिन्न तरीके के विषय उठाते हैं---कवि मन जिसमें भी रम जाए. इसमें लोक, शास्त्र, पुराण, मिथक प्रकृति के उपादान इतिहास और संस्कृत के रोचक प्रसंग- क्‍या कुछ नहीं है, जिसे रोचक वृत्तांत के रूप में सहेजा गया है.

यात्रा वृत्तांतों में असगर वजाहत का 'उम्र भर सफर में रहा' नई किताब से आई उल्लेखनीय कृति है. इससे पहले भी असगर वजाहत के यात्रावृत्त आ चुके हैं. 'स्‍वर्ग में पॉंच दिन' भी बेहतरीन यात्रा वृत्तांत बन पड़ा है. राजपाल एंड संस से आई मनीषा कुलश्रेष्ठ की पुस्तक 'होना अतिथि कैलाश का' सुखद विवरणों से भरी है, तो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उमेश पंत की पुस्त‍क 'दूर दुर्गम दूरस्थ' भी रोचक वृत्तांतों से बुनी गयी है. 'युद्ध यात्रा' शीर्षक से धर्मवीर भारती का यात्रा वृत्तांत भी वाणी से आया है.  'ल्हासा नहीं... लवासा' - सचिन देव शर्मा का रोचक यात्रा वृत्तांत है. सेतु प्रकाशन से आई मंगलेश डबराल की देश-विदेश की यात्राओं पर आधारित यात्रा वृत्तांत उनकी पुस्तक एक सड़क एक जगह में उनके बेहतरीन गद्य के साथ संजोया गया है. यहीं से यात्राओं के कुछ टुकड़ों और स्मृ‍ति चित्रों के साथ कविता पर विचार की एक गद्यकृति राजेश जोशी की आई है: 'वह हँसी बहुत कुछ कहती थी'. जो लोग जोशी के साहित्यिक नोट्स पढ़ चुके हैं उन्हें यह पुस्तक भी भली लगेगी.

हिंदी के वयोवृद्ध लेखक प्रो रामदरश मिश्र कोरोना एकांत में भी साहित्य साधना में सतत सक्रिय रहे हैं. उनकी एक डायरी 'मेरा कमरा' गए साल के मध्य में ही आई है जिसमें उन्होंने अपने बीते हुए दिनों के साहित्यिक संस्मरणों को खूबसूरती से संजोया है. सूर्य प्रकाशन मंदिर से आई कवयित्री पारुल पुखराज की डायरी 'आवाज को आवाज़ न थी'  इस बार उनके गद्य की बानगी के साथ उपस्थित हैं तो बोधि प्रकाशन से पद्मजा शर्मा की डायरी 'विश्वास का घर' और प्रदीप सिंह की डायरी 'वरक दर वरक' भी पठनीय डायरियों में शुमार की जाएगी. राजा राम भादू की 'स्वयं के विरुद्ध' पुस्तक कविता डायरी के रूप में आई है. समय, समाज और साहित्य के सवालों पर नंद भारद्वाज पर आधारित पुस्तक 'नंद जी से हथाई' का संपादन नीरज दइया ने किया है जो नंद भारद्वाज के लेखक व्यक्‍तित्‍व को समझने में मदद करती है.  

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हिंदी आलोचना का वर्तमान

हिंदी में आलोचक की स्थिति ऐसी है कि यदि वह रचना के सकारात्मक पक्षों का विवेचन करे तो उसकी उदारता का मखौल उड़ाया जाता है और आलोचना की कसौटियों पर कसते हुए सख्ती से आलोचना करें तो लेखक या कवि मुँह फुलाकर बैठ जाते हैं. आलोचना इस तरह एक सांसत का काम है जिसमें कभी शाबाशी नहीं मिलती, आलोचकों को. फिर भी हिंदी परिदृश्य में उनकी धमक आज भी बरकरार है. गए साल वाणी प्रकाशन से आई युवा आलोचक वैभव सिंह की पुस्तक 'हिंदी कहानी विचारधारा और यथार्थ' उनके कथानुशीलन का परिचायक है, तो हिंदी नवजागरण पर अपने चिंतन के लिए पहचाने जाने वाले शंभूनाथ की पुस्तक 'भारत की अवधारणा' को एक बेहतरीन आलोचनात्मक विमर्श के रूप में चिह्नित किया गया है. कविता की नई संवेदना पर व्यास मणि त्रिपाठी की पुस्तक पठनीय है. हाल में गुजरे कुंवर नारायण पर इन पंक्तियों के लेखक की आलोचनात्मक कृति 'कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई' तथा संपादित कृति 'कूँवर नारायण: कवि का उत्‍तर जीवन' हमारे दौर के उम्दा कवि को समझने की दिशा में एक प्रयास है, तो अज्ञेय पर हितेश कुमार सिंह की कृति 'अज्ञेय होने का अर्थ' अज्ञेय के प्रति उनके समर्पित लेखकीय-संपादकीय कौशल का परिणाम है. गिरिजा कुमार माथुर की जन्मशती के अवसर पर पवन माथुर ने 'काल पर छूटी निशानी' शीर्षक से उन पर एक आलोचनात्मक पुस्तक संपादित की है, जो माथुर के कवि व्यक्तित्व को समझने का एक साझा प्रयास है. जाने माने आलोचक रहे प्रभाकर श्रोत्रिय की पुस्तक 'भारतीय गल्प' आलोचना का एक प्रांजल उदाहरण है. 'वाचिकता आदिवासी साहित्य और सौंदर्यबोध' के बहाने वंदना टेटे ने आदिवासी साहित्य को आलोचनात्मक कसौटियों पर कसा है. डॉ अलिफ़ नाज़िम के शोध व संपाद्न में मुंशी दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी समग्र का जिक्र भी जरूरी है. यह पुस्तक वेद प्रचारमंडल भटिंडा से छपी है.

अन्य आलोचनात्मक कृतियों में अमन प्रकाशन से आई 'कविता के वरिष्ठ नागरिक' में रामदरश मिश्र से लेकर हेमंत शेष तक सत्रह कवियों के काव्य‍ वैशिष्ट्य का अवलोकन आकलन किया गया है, तो राजकमल प्रकाशन से आई व्योमेश शुक्ल की पुस्तक 'कठिन का अखाड़ेबाज और अन्य निबंध' व्योमेश शुक्ल के गद्यचिंतन का एक संजीदा प्रारुप है जिसमें व्योमेश का कहना है कि हम उस समाज के अधुनातन स्पन्दनों की, उसके उत्थान और पतन की, उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य की मीमांसा करने वाला गद्य लिखना चाहते हैं, जिसका हम खुद बहुत छोटा हिस्सा हैं. लोकभारती से आई कन्हैया सिंह की पुस्तक 'आलोचना के प्रत्यय' आलोचना की वैचारिकी और जरूरी तत्वों का विस्तार से विवेचन करती है तो विजया बुक्स से आई ओम निश्चल की 'समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य' 1980 से लेकर 2020 तक के कवियों व साठोत्तर कविता की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, पृष्ठभूमि का विस्तृत विवेचन है. बोधि प्रकाशन से आगत उषारानी राव की आलोचनात्मक पुस्तक 'अभी न होगा मेरा अंत: निराला' उनके लेखकीय कौशल का परिचायक है. विजया बुक्‍स से 'माधव कौशिक की काव्‍य संवेदना' नामक पुस्‍तक मंजुला राणा के संपादन में आई है.

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विविध पुस्तकें

गए कुछ सालों में स्त्रीं चिंतन का क्षितिज व्यापक हुआ है. सीमान द बोउवा और जर्मन ग्रियर जैसे स्त्रीचिंतकों को भारत की लेखिकाओं ने जैसे अपनी आत्मा से ग्रहण किया है. स्त्री विमर्श की दृष्टि से चित्रा मुद्गल की पुस्तक 'छिन्नमस्ता नहीं मैं' उनके बेहतरीन बहसतलब आलेखों का संकलन है तो गरिमा श्रीवास्तव ने 'स्त्री दर्पण' पुस्तक के जरिए हिंदी नवजागरण और स्त्री का एक सुचिंतित खाका प्रस्तुत किया है. वे अरसे से स्त्री  चिंतन और वैचारिकी पर काम कर रही हैं तथा उनकी रचनाओं को सामने लाते हुए उनके मूल्यांकन के लिए प्रतिश्रुत रही हैं. विस्मृत रचनाकार शिवरानी देवी पर क्षमाशंकर पांडेय ने सामर्थ्य के साथ कलम चलाई है तो तस्लीमा नसरीन की पुस्तक 'दूसरा पक्ष' स्त्रीविमर्श पर उनके बहसतलब तेवर का उदाहरण है. पर्यावरण चिंतन की दिशा में वाणी से कबीर संजय की 'चीता', शेखर पाठक की 'हरी भरी उम्मीद' और अंकिता जैन की 'ओह रे किसान' जैसी पुस्तकें आई हैं, जो पर्यावरण के महत्वपूर्ण पक्ष को हमारे समक्ष उद्घाटित करती हैं.

मुगल बादशाहों की गतिविधियों पर हेरंब चतुर्वेदी का काम उल्लेखनीय रहा है. गए साल प्रो अजय तिवारी ने मुगल बादशाहों के साहित्यिक प्रेम को लेकर एक महत्त्वपूर्ण पुस्त‍क लिखी है- संगीत कविता हिंदी और मुगल बादशाह.  मुगल बादशाहों की हिन्दी कविता और हिन्दुस्तानी संगीत में गहरी रुचि रही है. कहा जाता है कि  बादशाह अकबर से लेकर भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के सेनानी बहादुरशाह ज़फर तक लगभग सभी मुगल बादशाहों ने संगीत के अनुशासन में बंध कर परम्परा से चले आ रहे 'ध्रुपद' को आधार बनाकर काव्य-सृजन किया. युवा कवि विवेक निराला की संस्तुति है कि भारतीय समाज, साहित्य और संगीत से मुगल बादशाहों के अन्तर्मिश्रण और अंतस्संम्बन्धों की पड़ताल के साथ ही हमारे सांस्कृतिक विकास की पहचान के लिए यह एक ज़रूरी पुस्तक साबित होगी, ऐसा मेरा विश्वास है. प्रियदर्शी ठाकुर 'ख़याल' की पुस्तक 'रानी रूपमती की आत्मकथा', राजू कुमार झा की पुस्तक 'एक धड़्कन दो दिल', पंकज चतुर्वेदी के संपादन में लोकमित्र प्रकाशन से छपी पुस्तक 'दिल्ली दंगों का सच' भी कोरोनाकाल के लॉकडाउन के बावजूद एक बड़ा शोध -प्रयास है. यह पुस्तक फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट का अनुवाद है.

बस्तर को लेकर हाल के वर्षों में कई पुस्तकें लिखी गयी हैं, इसी कड़ी में यश पब्लिकेशन्स से आई कमलेश कमल की पुस्तक 'आपरेशन बस्तर' कथा रिपोर्ताज का एक बेहतरीन नमूना है, जिसे पुलिस बल के ही एक लेखक ने लिखा है. बस्‍तर के बीहड़ों में एक अत्‍यंत रूमानी प्रेमकथा खोज लेना, बस्‍तर का विस्‍तृत वितान और इस सबके बीच स्‍त्री पात्रों के मनोजगत की सुगमता से पड़ताल इस कथा रिपोर्ताज के गद्य को सुगठित और पठनीय बनाता है. सेतु प्रकाशन से ज्ञानरंजन की पुस्तक 'उपस्थिति का अर्थ' उनके सुपरिचित गद्य का प्रमाण है.

साहित्य अकादेमी ने गए साल दो महत्वपूर्ण रचना संचयन निकाले- रामविलास शर्मा रचना संचयन और विष्णु प्रभाकर रचना संचयन जिसका संपादन क्रमश: हरिमोहन शर्मा व अतुल कुमार ने किया है. वाणी प्रकाशन से गोपेश्‍वर सिंह संपादित 'विजयदेव नारायण साही रचना संचयन' उनकी रचनाओं का चुनिंदा चयन है. इसके अलावा विनिबंधों की कड़ी में अब श्रीलाल शुक्ल पर प्रेम जनमेजय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पर सुशील त्रिवेदी व गोविंद बल्लभ पंत पर शेर सिंह बिष्ट के विनिबंध जुड़ गए हैं. अकादेमी से ही प्रकाशित प्रतिनिधि बाल कविता संचयन का संपादन कवि दिविक रमेश ने किया है.
अंतर्अनुशासनीय अनुशीलन के अंतर्गत गांधी और 1980 के बाद के हिंदी गुजराती साहित्य पर आलोक गुप्त ने पुस्तक संपादित की है. बिहार की राजनीति को केंद्र मे रखते हुए अनुरंजन झा की 'गांधी मैदान' जैसी पुस्तक बहसतलब हो सकती है, तो पूर्वांचल में माफिया के उदय, विस्तार और अंत पर संदीप कुमार पांडेय की पुस्तक 'वर्चस्व' भी कम रोचक न होगी. इसी तरह घूमंतु पत्रकार-लेखक पुष्यमित्र की पुस्तक 'रुकतापुर, बिहार जहां थम जाता हैं पहिया बदलाव की हर गाड़ी का' भी उल्लेख जरूरी है.

साल के जाते जाते पत्रकार, लेखक, समीक्षक और सिनेमा पर काम कर रहे अनंत विजय की पुस्तक 'अमेठी संग्राम' पुस्तक चुनावी अखाड़े में स्मृति इरानी और राहुल गांधी के चुनावी संग्राम का दिलचस्प  जायज़ा लेती है. यों तो ये दिन कांग्रेस की पराभव के ही हैं फिर भी अपने पत्रकारीय कौशल से वे ने केवल दो उम्मीनदवारों पर अपनी पुस्तक फोकस रखते हैं बल्कि दलगत राजनीति के अनेक 'लूपहोल्स ' भी उजागर करते चलते हैं.
 इसी साल कथाकार विमल चंद पांडेय का संस्मरणात्मक रिपोर्ताज आया था 'ई इलाहाब्बाद है भइया'. तब से अब इलाहाबाद भी प्रयाग हो चला. प्रयाग जैसे शहर के चरित्र को लेकर जहां गांव गिरांव के छात्र पढ़ने और प्रतियोगिताओं की तैयारी के लिए यहां आते हैं और इस शहर के चप्पे चप्पे में रम जाते हैं. प्रयाग पर आई ललित मोहन स्याल की पुस्तक 'अथश्री प्रयाग कथा' कोई सीधा साधा शहरी वृत्तांत नहीं है, इसमें प्रयाग आ पहुंचे हजारों ग्रामीण छात्रों की जीवनचर्या, अड्डेबाजी, कम्पटीशन की हारी हुई लड़ाई लड़ने वालों का हाल ए दिल है. कथा रिपोर्ताज की शैली में स्याल ने अपने छात्रजीवन के अनुभवों की स्याही भी यहां उड़ेल दी है, जिससे आप इसे 'ट्वेल्थ फेल' या नीलोत्प्ल मृणाल के 'डार्क हार्स' के क्रम में पढ़ सकते हैं, और कहना न होगा यह इन दोनों किताबों से उन्नीस नहीं है.  रामकुमार सिंह की 'सुपर स्टार की मौत' और पेंग्विन से पत्रकार प्रभाकर मिश्र की आई पुस्तक 'एक रुका हुआ फैसला' अयोध्या विवाद के आखिरी चालीस दिनों के ब्योरे को बखूबी पाठकों के सामने परोसती है.

अनुवाद के क्षेत्र में भी गए साल कुछ अच्छी पुस्तकें आई हैं. विश्व कविता का एक चयन तीन खंडों में संभावना प्रकाशन से आया है तो यहीं से गिंसवर्ग की ख्या‍त 'हाउल' का देवेंद्र मोहन कृत अनुवाद भी आया है. साठोत्तर कविता के विक्षोभ के मूल में 'हाउल' कविता का अपना ऐतिहासिक महत्व रहा है. विश्‍व कविता का एक संचयन सेतु ने भी प्रकाशित किया है. रेनाता चेकाल्‍स्का और अशोक वाजपेयी के द्वारा अनूदित कथेतर कृतियों में अरुंधती राय की किताब 'आजादी' का अनुवाद रेयाजुल हक ने किया है. सामाजिक विज्ञान में रूचि रखने वालों को ज्यां द्रेज की चंदन श्रीवास्तव द्वारा अनूदित पुस्तक 'झोला वाला अर्थशास्त्र' पसंद आएगी. तसलीमा नसरीन की स्त्री विमर्श विषयक पुस्तक 'दूसरा पक्ष' का बेहतरीन अनुवाद कवि कल्‍लोल चक्रवती ने किया है. संभावना से सुपरिचित कवि गिरधर राठी की कुछ पुस्तकें- कथा संसार: कुछ झलकियां, कविता का फिलहाल- 'सोच विचार: कल आज और कल भी' संभावना से आई हैं.

श्री एम की प्रभात रंजन द्वारा अनूदित पुस्तक 'वह लौट आया है', ऋषि नित्यप्रज्ञा की पुस्तक 'जीवन एक उत्सव' और चंद्रमौली वेंकटेसन की 'कैटलिस्ट' भी पेगुइन रैंडम हाउस से प्रकाशित ऐसी पुस्तके हैं, जिनकी चर्चा जरूरी है. इसी साल बोधि प्रकाशन का एक और अनूठा प्रयास पुस्तक की दुनिया में याद किए जाने लायक कार्य है. वह है, केवल 100 रुपए में 10 पुस्तकों का सेट. इस सेट में कथा, रपट, कविता, कला सभी शामिल हैं. इस सेट की पुस्तकों में विष्णु नागर के स्तंभ-लेख 'पच्चीस पैसे का सिक्का', राजा राम भादू का आलेख 'कविता के आयाम', अनामिका का पत्र-संवाद 'एक ठो शहर था, एक थे पापा', जितेन्द्र भाटिया का यात्राएं, संस्मरण और विचार 'म्यांमार: गलियों से शहर और शहर से देश को देखना!', पंकज चतुर्वेदी का पर्यावरण-लेख 'लहरों में ज़हर', सुरेन्द्र मनन का एक फिल्मकार के संस्मरण 'शिलाओं पर लिखे शब्द', डॉ. राजेश व्यास की संगीत, नृत्य एवं नाट्य पर एकाग्र आलोचना 'रस निरंजन' और कहानियों की पुस्तक में मधु कांकरिया की 'नंदीग्राम के चूहे', मृदुला शुक्ला की 'दातुन' और डॉ लक्ष्मी शर्मा की 'रानियाँ रोती नहीं' शामिल है. जाहिर है शब्दों की दुनिया के लिए प्रकाशक माया मृग का यह प्रयास स्तुत्य है.

अंततः सच तो यही है कि कथेतर गद्य का संसार और भी विस्‍तृत है, जिसे एक छोटे से आलेख में समेट पाना संभव नहीं है. इस तरह कथेतर गद्य का परिमाण देखें तो 2020 में आई कृतियां पिछले साल से कोई कमतर नहीं है. कह सकते हैं कि सांसारिक व्‍याधि भी लेखन की ऊर्जा को परास्‍त नहीं कर सकी. अभी संकट टला नहीं है और संकट के वक्‍त ही कलम की असली परीक्षा होती है. यह साल लेखन की दृष्‍टि से कैसा होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा.

# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com

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