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'सागर यारा' की कहानियों में खोते चले जाएंगे आप...

'सागर' कई सदियां याद रहेगा लोगों को. मुझे और थोड़े से सालों तक, जब तक हूं. - गुलज़ार ने यह कहा था सागर सरहदी के बारे में. सागर सरहदी का नाम बहुत से लोगों ने शायद न सुना हो, लेकिन उनकी कलम से निकली कहानियों पर बनी फिल्में जरुर देखी होगी.

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सागर याराः कहानियों का अनूठा संकलन सागर याराः कहानियों का अनूठा संकलन

'सागर' कई सदियां याद रहेगा लोगों को. मुझे और थोड़े से सालों तक, जब तक हूं. -गुलज़ार 
सागर सरहदी का नाम बहुत से लोगों ने शायद न सुना हो, लेकिन उनकी कलम से निकली कहानियों पर बनी फिल्में जरुर देखी होगी. उन्होंने कई छोटी कहानियां और प्ले लिखे थे. सागर सरहदी ने कई हिट हिंदी फिल्मों की शानदार पटकथा लिखी. 'नूरी', 'बाजार', 'कभी-कभी', 'सिलसिला', 'चांदनी', 'दीवाना' और 'कहो ना प्यार है' उन शानदार फिल्मों के कुछ नाम हैं, जिन्हें सागर सरहदी ने लिखा था. उन्होंने वर्ष 1982 में आई स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह की फिल्म 'बाजार' को निर्देशित भी किया था, साथ ही 1984 में फारुख शेख, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी के अभिनय वाली फिल्म 'लोरी' को प्रोड्यूस भी किया. 
फिल्मी दुनिया में अपने योगदान के साथ ही उम्दा किस्म के कहानीकार हैं सागर साहब. विभाजन, शरणार्थी जीवन और फिल्मी दुनिया की धूपछांही से भरी कहानियों का एक संग्रह 'सागर यारा' मुझे पिछले दिनों पढ़ने को मिला. इस पुस्तक के पन्ने जब पलटने शुरू किए तो मैं उनकी कहानियों में खोता चला गया. सागर सरहदी ने 1947 में भारत-विभाजन का दौर देखा था. वे शरणार्थी जीवन के गवाह रहे. इस कहानी संग्रह में विभाजन का दर्द भी महसूस होगा.  
सागर की कहानियां पाठक को मदहोश करती हैं. सभी कहानियों की कथावस्तु आरंभ से अंत तक प्रभावशाली है. उनकी कहानियों के पात्र वास्तविक हैं. जब उनके पात्रों से परिचय होता है तो लगता है जैसे आप उस पात्र को जानते हैं. कहानी के पात्र पाठक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं.      
संग्रह 'सागर यारा' को पढ़ते हुए लगा कि सागर सरहदी जैसे पाठक को कहानी खुद सुना रहे हैं. पुस्तक की पहली कहानी का शीर्षक 'आखिरी कहानी' है. इस कहानी को पढ़कर महसूस होता है कि सागर, अपने पाठक से जिदंगी के दुख साझा कर रहे हैं. वे लिखते हैं, "पता नहीं कितनी देर तक रोता रहा. तय हो गया कि मैं लिखना भूल गया हूं. कहानियां लिखनी कम हो गयी हैं और अब नाटक लिखना भूल गया हूं." 
आज भी आख़िरी कहानी के सफ़दर की तरह वे हर देशी भाषा के लेखक के हालात पर तीखा कटाक्ष करते हुए पूछते से हैं कि "इस मुल्क में हर आदमी, हर पेशेवाला अपना काम कर सकता है, सिर्फ़ लेखक, लेखक नहीं रह सकता. उसे या तो टीचर बनना पड़ता है या क्लर्क या मैकेनिक.' 
कहानी 'किताबों के दोस्त' की बात करूं तो इसका अंत पाठक को विचलित कर देगा. कहानी की आखिरी तीन-चार पंक्तियां पढ़ने के बाद मैं खुद भी कुछ देर के लिए सोच में पड़ गया था. मुझे कहानी के पात्र विष्णु से क्षणभर के लिए सहानुभूति होने लगी थी. काश मैं विष्णु के लिए कुछ कर पाता. ये कहानी समाज की एक सच्चाई को भी उजागर करती है. 
'सागर यारा' संग्रह की कहानियां पाठक को बीसवीं सदी के दौर में ले जाती हैं. लेकिन ऐसा नहीं कि उनकी कहानियों के हालात आज नहीं हैं. वैसी परिस्थितियां आज भी मौजूद हैं. इन कहानियों को पढ़ते हुए ज़िन्दगी की वास्तविकताओं से सामना होता है. कई बार लगता है कि सागर ही अपनी कहानियों के किरदार हैं. उनका किताबें पढ़ना, सपने देखना और जिंदगी के लिए संघर्ष करना, सब कुछ वैसे आता है जैसे सागर अपना परिचय दे रहे हैं.  
सागर यारा की कहानियां हमें बीसवीं सदी के उस दौर में ले जाती हैं जब रूमान की हैसियत एक समाजी ताक़त की होती थी. ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से वह बराबर की टक्कर लेता था. किताबें पढ़ना, सपने देखना, ख़ुद के दायरे से निकलकर पूरी दुनिया के भविष्य के बारे में सोचना, पैसे की क़ुदरत को चुनौती देना और ज़िन्दगी के इस तरीक़े पर सवाल उठानेवाली रुकावटों से जान पर खेलकर लड़ना उस दौर के रौशन दिमाग़ों की अपनी जीवन-शैली थी, जो आज के संचार-सम्पन्न इकहरे माहौल में दूर की चीज़ लगती है.  सागर सरहदी मूलत: नाटककार थे, उन्होंने अनेक सफल फ़िल्मों के संवाद भी लिखे, इसलिए इन कहानियों की दृश्य और संवाद योजना हमें कहानीपन के एक अलग ही आस्वाद तक ले जाती है. ऊपर से उर्दू अफ़सानानिगारी की रवानी और अपने किरदारों से लेखक की मुहब्बत इन कहानियों को एक खास पाठ बना देता है.  
शुरुआती दिनों में थिएटर और इप्टा से जुड़े रहने वाले सागर सरहदी मूलत: नाटककार थे, बाद में उन्होंने अनेक सफल फ़िल्मों के संवाद लिखे. इसलिए उनकी कहानियों में फिल्मी प्रभाव साफ दिखता है. उनकी कलम से निकले दृश्य और संवाद कहानी को ऊंचे स्तर पर ले जाते हैं. इस लिहाज 'डायलॉग लिखवा लो', 'ब्रह्मचारी', 'बाबूजी की बस निकल गई', 'रामलीला का राम', 'सहयोग', 'खूशबू का सफर', 'हर्षद मेहता का सूटकेस' जैसी कहानियां पाठक पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं.  
सरहदी की कहानियों की भाषा सरल और स्पष्ट है. वे प्रभावशाली भाषा का प्रयोग बखूबी करते हैं. साथ ही कथा के परिवेश और पात्रों के अनुसार भाषा का सफल इस्तेमाल करते हैं. उनकी भाषा में हिंदी-उर्दू के शब्दों का बेहतरीन उपयोग पढ़ने मिलता है.  
सागर सरहदी का जन्म 11 मई, 1933 को संयुक्त भारत के ऐबटाबाद के पास बफ्फा शहर (अब पाकिस्तान) में हुआ था. फिल्म निर्देशक और लेखक सागर सरहदी का असली नाम गंगा सागर तलवार था.  
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पुस्तकः सागर यारा 
लेखक: सागर सरहदी 
सम्पादक: रमेश तलवार 
भाषाः हिंदी  
विधा: कहानी 
प्रकाशक: राजकमल 
पृष्ठ संख्याः 200 
मूल्यः ₹299  

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