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पुस्तक समीक्षाः जस का फूल; नफरत की कब्र पर मुहब्बत का एक फूल

भालचंद्र जोशी का उपन्यास 'जस का फूल' एक हिंदू लड़के और मुस्लिम लड़की की प्रेम कहानी है, जो हमें यह बताता है कि हमारा समाज वह नहीं है जो हमें दिखता है. यह वैसा भी नहीं है जिसे हमारे रहनुमा दिखाते हैं. बल्कि जैसा दिखता है, उसके नीचे प्याज की कई परतों की तरह कई समाज खुलते जाते हैं.

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भालचंद्र जोशी के उपन्यास 'जस का फूल' का कवर [ फोटो सौजन्य - राजलमल प्रकाशन ]
भालचंद्र जोशी के उपन्यास 'जस का फूल' का कवर [ फोटो सौजन्य - राजलमल प्रकाशन ]

हमारा समाज वह नहीं है जो हमें दिखता है. यह वैसा भी नहीं है जिसे हमारे रहनुमा दिखाते हैं. बल्कि जैसा दिखता है, उसके नीचे प्याज की कई परतों की तरह कई समाज खुलते जाते हैं. उस खुलते समाज पर हमारी बंद होती आंखों को खोला है मशहूर साहित्यकार भालचंद्र जोशी ने. उनका उपन्यास 'जस का फूल' समसामयिक मुद्दे को उठाकर लिखी गई एक बेहतरीन कृति है.

जिस दौर में राष्ट्रवाद बहुसंख्यकों का उन्माद बन चुका हो, जिस कालखंड में इतिहास धर्म की जनसंख्या से राष्ट्रीयता और देशभक्ति को मापता है, जिस दौर में अल्पसंख्यक होना और उनमें भी मुस्लिम होना संदिग्ध निष्ठा का दूसरा नाम बन जाता है, उस दौर में उपन्यास जस का फूल हमें अपने समाज को पढ़ने के लिए दो आंखें देता है.

यह उपन्यास किसी नायक या नायिका की कहानी नहीं बल्कि हमारे आपके मोहल्ले में रहने वाले नौजवानों की मनोव्यथा, उनकी आवारगी, उनकी कुंठा, उनके संत्रास, उनकी बेचैनी और बेरोजगारी के आलम में समय की धारा में खुद को निढाल छोड़ देने की कहानी है. उपन्यासकार ने अपने उपन्यास को एक अबोध प्रेम कथा का नाम दिया है, लेकिन ये उपन्यास हमारे समाज की अबोधावस्था पर चुटकी ज्यादा लेता है.

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इस उपन्यास में जोशी ने कहीं भी किसी को नायक या खलनायक नहीं दिखाया है. वो दिखाते हैं कि कैसे परिस्थितियां एक ही इनसान को कभी खलनायक, कभी विदूषक तो कभी नायक बना देता है. उपन्यास का मुख्य पात्र शाहरूख और काजोल हैं. ये फिल्मी नाम नेपथ्य से चलकर कब सेंटर स्टेज पर खड़ा हो जाते हैं, आपको पता ही नहीं चलता. असल नाम और असल पहचान तो समाज के ठेकेदारों के पास गिरवी पड़ी हैं. शाहरूख और काजोल अपने असली पहचान के आगे सरेंडर कर जाते हैं और नकली पहचान उनको जिंदगी भर एक टीस, एक अंतहीन पीड़ा में भरकर रखती है.

6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिरी थी, उस विध्वंस के साए में कैसे हमारे समाज में धार्मिक भाईचारे का तानाबाना बिखर गया था, इसको चंद आवारा लड़कों की दास्तां से लेखक ने बखूबी उकेर दिया है. और यह भी बता दिया है कि कैसे पढ़े-लिखे, संभ्रांत और समाज को दिशा देने का दावा करने वाले मसीहा अपनी दकियानूसी सोच से एक इंच आगे नहीं बढ़ पाते. मार्क्स ने कभी धर्म को अफीम कहा था. उस अफीम को सूंघने वाला समाज कैसे अफवाहों पर अपने सदियों के रिश्तों को कड़वाहटों के जहर में डुबो देता है, इसको बहुत आहिस्ता- आहिस्ता ढंग से इस उपन्यास में बताया गया है.

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'जस का फूल' नाम एक निश्छल और ईमानदार प्यार को मिला सबसे बड़ा इनाम है. निश्चित रूप से यह उपन्यास पढ़ने लायक है, ताकि हम अपने अंदर घटित होने वाले कई समाजों, उसके रूपकों, उसकी विद्रुपताओं, उसकी अच्छाइयां, इन सबको समझ सकें. लेखक पेशे से इंजीनियर हैं, लेकिन ये उपन्यास बताता है कि वो जड़ता के कम, चेतनता के इंजीनियर ज्यादा हैं.

पुस्तकः जस का फूल

विधाः उपन्यास

लेखकः भालचंद्र जोशी

प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन

मूल्यः रुपए 199 पेपरबैक संस्करण, रुपए 599 हार्ड बाउंड

पृष्ठ संख्याः 224

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