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जन्मदिन विशेषः 90 साल के चिरयुवा साहित्यकार डॉ शरद पगारे की साहित्य यात्रा

इंदौर निवासी वरिष्ठ साहित्यकार शरद पगारे आज पांच जुलाई को अपने जीवन के 90 वे वसंत में कदम रख रहे हैं, पर उनकी सृजनात्मकता और उल्लास अब भी कायम है.

हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ शरद पगारेः सृजन की मिसाल हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ शरद पगारेः सृजन की मिसाल

नौ दहाई का आंकड़ा छूते बुजुर्ग मोहमाया से दूर होना चाहते हैं लेकिन यह दास्तां है एक चिरयुवा कथाकार की जो अब भी अपने ऐतिहासिक किरदारों के मोह में फंसा है. अपने सृजन कहें, अध्ययन कहें या अतीत के चुने हुए पात्रों के मोह से मोहित, यह ऐतिहासिक कथाकार अपने पाठकों को अब भी अपनी नई अनछुई कहानियों से रुबरू कराने में जी जान से जुटे हुए हैं. हम यहां बात कर रहे हैं इंदौर के वरिष्ठ साहित्यकार शरद पगारे की, जिन्हें हाल ही में बेहद प्रतिष्ठित साहित्य पुरस्कार व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया है.

पगारे जी आज पांच जुलाई को अपने जीवन के 90 वे वसंत में कदम रख रहे हैं, पर उनकी सृजनात्मकता और उल्लास अब भी कायम है. अपने मिलने वालों को वह अभी भी उत्साह से भरपूर चिरयुवा ही नजर आते हैं. ऐसा युवा जो अपने ऐतिहासिक पात्रों की दुनिया में गुम है. जो अपने पात्रों से संवाद करता है. इतिहास के गर्त में गुम हो चुकी कहानियों को नवजीवन देता है. यूं देखा जाए तो पगारे ने अपना जीवन ही इतिहास की रूमानी कथाओं के नाम कर दिया है.

डॉ शरद पगारे ने अब तक का जीवन अध्ययन-अध्यापन, लेखन में व्यतीत किया है. वे इतिहास के जानेमाने विद्वान, जिज्ञासु शोधकर्ता और उम्दा प्राध्यापक रहे और शासकीय महाविद्यालय से सेवानिवृत्त होकर स्वतंत्र लेखन में संलग्न हैं. इतिहास विषय में एम.ए. और पी-एच.डी. की उपाधि हासिल करने वाले डॉ. पगारे को अपने सृजन कर्म के लिए मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल का विश्वनाथ सिंह पुरस्कार तथा वागीश्वरी पुरस्कार, अखिल भारतीय अंबिका प्रसाद 'दिव्य' पुरस्कार, सागर, मध्य प्रदेश लेखक संघ का भोपाल का अक्षर आदित्य अलंकरण जैसे कई पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं. कुछ समय के लिए उन्होंने बैंकॉक के शिल्पकर्ण विश्वविद्यालय में भी विजिटिंग प्रोफेसर के रुप में अपनी सेवाएं दीं.

पगारे कहते हैं चूंकि मैं जीवन भर इतिहास का ही छात्र रहा हूं, आज भी खुद को इतिहास का ही छात्र मानता हूं तो इस तरह के कथानक ढूंढता हूं जिनका इतिहास से कुछ ना कुछ सबंध रहा हो. मैं इतिहास की किताब पढ़ते हुए अपने उपन्यासों के पात्रों को खोजता हूं, उनके साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश करता हूं. पात्र-काया प्रवेश करके ऐतिहासिक पात्रों के साथ जो अन्याय हुआ है उसे लिपिबद्ध करने की कोशिश करता हूं. वे कहते हैं मेरा काम इतिहास का सत्य और साहित्य के यथार्थवादी काल्पनिक सौंदर्य का समन्वय अपने पाठकों के सामने लाना है. इन्हीं के मिलाप से ऐतिहासिक उपन्यासों का सजृन होता है।

डॉ पगारे को 2020 के व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया है. वे मध्यप्रदेश के पहले ऐसे साहित्यकार हैं जिन्हें देश के इस प्रतिष्ठित व्यास सम्मान से विभूषित किया गया. वे कहते हैं, साहित्य में उनका कोई पितामह नहीं है ना ही वे कभी पुरस्कारों की राजनीति में शामिल हुए हैं. मेरे लिए पाठकों का प्रेम हर पुरस्कार से ऊपर है. मुझे पाठकों का अभूतपूर्व प्यार मिला है वही मेरी रचनात्मकता की कुंजी है.

गौरतलब है कि डॉ पगारे ने अपने उपन्यासों में इतिहास की कई गुमनाम स्त्रियों को पहचान दी है. 'पाटलीपुत्र की सम्राज्ञी' में चक्रवर्ती सम्राट अशोक की माता धर्मा के जीवन के अनछुए पहलुओं को दर्शाया, तो गुमनामी के अंधेरे में ही डूबे एक और पात्र 'गुलारा बेगम' पर भी लिखा. शाहजहां की प्रेमिका 'गुलारा बेगम' पर आधारित इस उपन्यास के 11 संस्करण छप चुके हैं. इस उपन्यास का मराठी, गुजराती, मलयालम, उर्दू, पंजाबी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. गुलारा बेगम की ही तरह आलमगीर कहलाने वाले सख्त मिजाज औरंगजेब की प्रेमकथा को भी उन्होंने उपन्यास का रूप दिया है. बेगम जैनाबादी, जो औरंगजेब की प्रेमिका थी, का नाम और उनकी रुमानी दास्तां भी इतिहास के पन्नों में कहीं खो चुकी थी. डॉ पगारे ने अपनी कलम से इस खो चुकी सच्ची रूमानी कहानी को भी अमर करने का प्रयास किया है.

इतिहास विषय से इतर डॉ पगारे के नक्सली समस्या पर लिखे गए उपन्यास 'उजाले की तलाश' भी खूब चर्चित रहा, इसका अनुवाद अंग्रेजी में भी किया गया है. इसके अंग्रेजी उपन्यास की चर्चा, हिंदी उपन्यास से कहीं ज्यादा रही है. डॉ पगारे के अब तक 8 उपन्यास और 10 कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. डॉ पगारे ने भारत के ऐतिहासिक महत्त्व की 16 कहानियों पर एक किताब लिखी है, जिन्हें वह भारत की श्रेष्ठ प्रेम कहानियां कहते हैं. उनका दावा है कि विश्व साहित्य या किसी अन्य देश में ऐसी कोई किताब नहीं है, जिसमें प्रेम पर आधारित 16 कहानियों का संकलन हो और इन कहानियों का ऐतिहासिक प्रमाण भी मिलता हो.

डॉ पगारे ने अपने 90वें जन्मदिन पर आजतक से बातचीत में अपने सृजनकर्म और लेखन की खुल कर चर्चा की. उन्होंने कहा, "अभी मेरा जितना भी जीवन शेष है, उसमें मुझे सिर्फ सजृन ही करना है. अभी मैंने वैशाली की जनपद कल्याणी को पन्नों पर उकेरना पूर्ण किया है. इस उपन्यास में मैंने वैशाली की नगरवधू कही जाने वाली आम्रपाली को बुद्ध की दृष्टि से देखने-समझने-लिखने की कोशिश की है. मेरे उपन्यास में आप नृत्यांगना आम्रपाली से मुलाकात करेंगे. वह जो नायिका है. जिन्हें भगवान बुद्ध ने जनपद कल्याणी कहा था, वह जिसके कारण पूरे जनपद का कल्याण हो. इस उपन्यास में मैंने अन्य राजनर्तकियों की जीवनगाथा का भी उल्लेख किया है. चाणक्य ने भी राजनर्तकी को राष्ट्र का गौरव कहा है. इस किताब के अलावा में मुगल काल की ही कुछ अन्य रूमानी कहानियों को कलमबद्ध करने की कोशिश कर रहा हूं. इतिहास की किताबों में हम तलवार-तोपों की गरज सुनते हैं. मैं इसी गरज के बीच में से पायल की मधुर झंकार को सुनने फिर पाठकों को सुनाने की कोशिश करता हूं. जब तक जीवन का अंतिम क्षण नहीं आ जाता है, मैं कलम से कुछ ना कुछ लिखना ही चाहता हूं. यही मेरी अपने जीवन से सुनहरी उम्मीद है." हमारे दौर के एक शानदार रचनाकार को हार्दिक बधाई!

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