नेमिचंद्र जैन हिंदी के प्रख्यात कवि, नाट्यालोचक एवं अनुवादक थे. उनका ये जन्मशती वर्ष है. वे अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक के सात कवियों में एक थे. अपना सर्जना का प्रारंभ उन्होंने कविता से किया किन्तु संकोचवश उनका पहला कविता संग्रह एकांत लगभग 54वें वर्ष में प्रकाशित हुआ. उसके 26 सालों बाद पुन: मित्रों के आग्रह पर अचानक हम फिर संग्रह आया जिसमें एकांत सहित नई कविताएं संग्रहीत हुईं. किन्तु मूलत: कवि होने के बावजूद वे धीरे-धीरे आलोचना एवं रंग आलोचना विधा में चले गए. जहां उन्होंने अपने समय के रंग परिदृश्य का बखूबी अवलोकन आकलन किया तथा अधूरे साक्षात्कार, बदलते परिप्रेक्ष्य एवं जनांतिक नामक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हुईं.
नाटक एवं रंगमंच पर नेमिचंद्र जैन की दशाधिक पुस्तकें हैं. तो वहीं उन्होंने मुक्तिबोध रचनावली सहित अनेक कृतियों का संपादकीय दायित्वों का निर्वहन भी किया. इसके अलावा नाटक, कथा एवं वैचारिक विधाओं में लगभग चालीस कृतियों का अनुवाद किया. उन्होंने नटरंग पत्रिका भी निकाली जिससे रंग गतिविधियों व समीक्षा को एक मंच मिल सके. वे नटरंग के अलावा प्रतीक के संपादन से भी संबद्ध रहे. उन्हें 2003 में पद्मश्री से नवाजा जा चुका है व शलाका सम्मान, साहित्यभूषण सम्मान सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं व कलाओं में समग्र योगदान के लिए संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है.
तारसप्तक के कवियों मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजा कुमार माथुर, रामविलास शर्मा व अज्ञेय के कवि व्यक्तित्व के विकास पर दृष्टिपात करें तो मुक्तिबोध, अज्ञेय, भारतभूषण अग्रवाल व गिरिजाकुमार माथुर के अलावा अन्य कवियों का वैसा स्वाभाविक विकास नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था. रामविलास शर्मा ने कविता की ओर अग्रसर होने के बजाय आलोचना व अनुशीलन की राह पकड़ ली तो प्रभाकर माचवे व नेमिचंद्र जैन की उपस्थिति कवि के रुप में तनिक क्षीण रही तथा सृजन की दूसरी विधाओं में उनका बोलबाला बढ़ता रहा.
जिस दौर में तारसप्तक का प्रकाशन हुआ वो दौर हिंदी कविता में उथल-पुथल का रहा है. छायावाद के बाद प्रयोगवाद और नई कविता का जो माहौल बनता गया उसने सप्तक परंपरा के कवियों को इस मायने में यश अवश्य दिलाया कि कविता पर कोई बात करते हुए सप्तक के अवदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता. लेकिन हमारी परंपरा विस्मृत करने वाली परंपरा है. हम छायावाद के तमाम कवियों को कहां याद करते हैं. पंत हमारी प्राथमिकताओं में कहां हैं. हम नई कविता के जगदीश गुप्त को कितना याद करते हैं. हम दूसरा सप्तक के नरेश मेहता को कितना याद करते हैं. शकुंत माथुर और हरिनारायण व्यास का क्या हुआ, इसकी चिंता आलोचना को क्यों नही होती. इसी तरह तीसरा सप्तक की कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, प्रयाग नारायण त्रिपाठी के कवित्व का ठीक ठाक जायजा भी आलोचना के पास नहीं है. सप्तक के कवियों के साथ ऐसा हुआ है.
गिरिजाकुमार माथुर की जन्मशती अभी अभी समाप्त हुई है किन्तु उन्हें छिटपुट ही याद किया गया. फिर वे कुछ दिनों में ठंडे बस्ते में चले जाएंगे. जन्मशती न आती तो शायद नेमि जी भी याद न किए जाते. उनका योगदान हिंदी कविता के लिए कितना विपुल व महत्वपूर्ण है कि वे न होते तो मुक्तिबोध के रचनात्मक अवदान से कौन परिचित कराता. उनकी रचनाएं कैसे प्रकाश में आ पातीं. रंगकर्म, रंगदृष्टि, नाट्यालोचन के क्षेत्र में उनके काम को, नटरंग के उनके संजीदा संपादन कर्म को कैसे भूला जा सकता है. ये अवश्य है कि वे कविता से धीरे धीरे विरत हो गए. यहां तक कि कविता छपाने में भी संकोची रहे. मित्रों के सबल आग्रह पर ही उनका संग्रह आया. तथापि नेमि जी आलोचक-नाट्यालोचक-नाट्य विशेषज्ञ-अनुवादक इत्यादि होने के पहले एक कवि हैं. ये उनकी कविताओं से गुजरते हुए प्रमाणित होता है.
उनकी कविताएं सप्तक में पहली बार सामने आईं. फिर बाद में उनका कविता संग्रह एकांत भारतीय ज्ञानपीठ से 1973 में आया. यानी लगभग 54 वर्ष की अवस्था में तथा अंतिम संग्रह अचानक हम फिर 1999 में यानी पहले संग्रह के 26 वर्षों बाद. जबकि वे 1944 में तारसप्तक में संकलित हो चुके थे. एक कवि कथ्य, रूप,शिल्प और रचना की सामाजिक उपयोगिता से ही जाना और समझा जाता है. वे मुक्तिबोध के संसर्ग में रहे तो निश्चय ही उनकी विचारणा में मार्क्सवाद एक अहम जगह रखता रहा है. पर प्रयोगवादी कविता का एक वैशिष्ट्य उसकी वैयक्तिकता और निजता रहा है तो इसके प्रमाण भी नेमि जी कविताओ में पर्याप्त रूप में पाए जाते हैं. ये कविताएं प्राय: 1937 से लेकर 1967 तक की हैं. 'हम अचानक फिर में' एकांत के अलावा कुछ नई कविताएं थीं. यही दो संग्रह उनके कवित्व के नियामक हैं. ध्यान से देखें तो इन कविताओं की विषयवस्तु जो छन कर सामने आती है. वो उनकी कवि दृष्टि का अहसास कराती है.
व्यक्तित्व, वैयक्तिकता और एकांतिकता
वैयक्तिकता प्रयोगवादी कविता का एक अंगीभूत वैशिष्ट्य है. अत: एकांत के कथ्य में ये वैयक्तिकता और एकांतिकता ज्यादा हावी दिखती है. पर वैयक्तिकता में सामाजिकता भी अनुस्यूत है. अकेला और एकांत दो कविताएं तो यहां हैं ही. जिनमें अकेलेपन और एकांतिकता का बोध प्रबल है. पर अनमनी उदासियों के बिम्ब तो यत्र-तत्र बिखरे मिलेंगे. अकेलेपन का अहसास धूल भरी दोपहरी भी कराती है. अनमनी उदासी का भी. अनजाने चुपचाप कविता में भी वे लिखते हैं.
"मैं एकाकी
मेरे आगे टेढ़ा मेढ़ा बिखरा फैला है
अनंत पथ अब भी बाकी. पृष्ठ 8
क्या भाया कविता में ऐसे और शब्द आते हैं. जो अकेलेपन व निर्जनता के भाव को सघन करते हैं जैसे परिमल उन्मन, संध्याएं निर्जन. आगे गहन अँधेरा है मन रुक रुक जाता है एकाकी. अब भी है टूटे प्राणों में किस छवि का आकर्षण बाकी. अपने अंतर का खालीपन तेरे सुधि सौरभ से भर लूँ- एक कविता में ऐसा वे कहते हैं."
इसी में आगे वे कहते हैं: "ये एकांत अभेद अंधेरे सा मन पर घिरता आता है/ जी का सब विश्वास अचानक ही मानो गिरता जाता है. पृष्ठ 19. इसी तरह तीन बजे शाम कविता में यह कहना कि इतने दिनों बाद आज प्राप्त हुआ इच्छित एकांत स्वर्ण अवसर. कवि के दुर्निवार एकांत का ही परिचायक है.
एकांत के साथ उदासी का भी जोड़ है. सहकार है. तभी तो आज उचटा सा हृदय कह कर वे उस स्नेह आलोक की अभ्यर्थना करते हैं. जो अनमने संतप्त प्राणों को सदा भरता रहे. इस क्षण में एकांत कविता उनके मिजाज का परिचायक लगती है. ये अंतर्मुखता ही कवि का वैशिष्ट्य है. भीड़ में अकस्मात मुलाकात की ऐसे सलज्ज अभिव्यक्ति दुर्लभ है. अरसे बाद मिलन की जो अचकचाहट मन में होती है वो तो है ही. वो जैसे एकांत से मिल कर उस अनुभूति तक पहुंच पाता है कि बहुत कुछ कष्टदायक के बावजूद जीवन में बहुत कुछ अच्छा भी है. जिसकी अनन्य अनुभूति तोष देती है. वह किसी की अम्लान मैत्री के संदेश से परितृप्त हो उठा है. तमाम झंझावातों के बीच ये अम्लान मैत्री, ये अनन्य अनुभूति, प्यार के उलझे हुए धागों को धीरज और ममता से संवारने का ये जो अहसास है जो कि कवि को अपूर्व शांति से भरता है और इस सब की औचक अनुभूति तब होती है. जब वो भीड़ में भी उस एकांत से मिलता है जो पहले भी और आज भी दुर्लभ है. कभी कभी लगता है ये एकांतिकता जो छायावादी कवियों के मिजाज की भी एक बानगी रही है वो नेमि जी के मिजाज में भी है. वे छायावादोत्तर काव्य वैशिष्ट्य का बहुत कुछ अपने काव्य में, कविता काया में धारण करते हैं.
ये एकांतिकता, ये निस्संगता यानी बिल्कुल 'निस्संग ममेतर' वाली निस्संगता नेमि के कवि स्वभाव में भी विराजती है. कवि चाहे प्रकृति के बखान में तल्लीन हो, वो यात्रा में हो, वो जीवन के किसी क्रिया व्यापार में संलग्न हो. वो एक एकांत को इस भावबोध को विसर्जित नहीं कर पाता. इसीलिए प्रकृति के उपादान भी कवि के एकांत का भी स्वागत करते हैं. स्वागत के लिए प्रस्तुत रहते हैं. उनके भीतर एक अव्यक्त उदासी है जिसे वे कभी चीड़ के पेड़ से साझा करते हैं. उसे अपने मरुथल मन की कहानी कहते हैं. तो कभी जिन्दगी की बेसुरी बांसुरी से उमगते सुरों में पहली सी तड़प का तापमान न पाकर विकल हो उठते हैं.
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जिन्दगी की बांसुरी में
अब नही है
वो उमड़ती तड़प पहली.
अजब है मन जो बुझा है और रीता है मगर बेचैन है. बेसुरा, पृष्ठ 97.
वे यत्र-तत्र अपने एकांत को तलाशते हैं. शायद वहीं उनकी विश्रांति का एक दुनिर्वार ठीहा हो. वे ये महसूस करते हैं: ''आज शायद मैं अलभ एकांत अपना पा गया हूं. राजपथ से भटक फिर परिचित डगर पर आ गया हूं.''
बहरहाल, ये एकांतिकता, ये अकेलापन, ये अंतर का खालीपन नेमि जी के काव्य की एक कुंजी है जिससे होकर इस अंतर्मुख कवि के मिजाज को समझा जा सकता है. वे स्वयं अपने कवि-रहस्य से इस तरह पर्दा उठाते हैं.
ये एकांत अभेद अंधेरे सा मन पर घिरता आता है.
जी का सब विश्वास अचानक ही मानो गिरता जाता है.
घोर विवशता के मरु में ये भटक पड़े हैं प्राण अकेले.
आज नहीं कोई जो मेरे मन की ये दुर्बलता झेले. अपने अंतर का खालीपन,पृष्ठ 19
पर इसके बावजूद, नेमिचंद्र जैन की वैयक्तिकता सामाजिकता की हामी है. उनकी वैयक्तिकता सामाजिकता से असंपृक्त नहीं है. ये व्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वाधीनता के बोध की हिमायती है. तो सामाजिक उत्तरदायित्वों से अपने व्यक्तित्व को जोड़ने की भी.
प्रतिरोध का स्वर
हम न सुनेंगे आज तुम्हारे गीत
घृणा के नए पुराने ठेकेदारो
गीत तुम्हारे हम न सुनेंगे.
एकांतिकता वैयक्तिकता के कोमल पलों के साथ उनकी कविता युगीन सत्य को पहचानती है. उसके अंत:करण में स्वार्थपरताओं, क्षुद्रताओं, पाखंड, नरमेध और युद्ध चाहने वाली युयुत्सा और आजादी को कुचलने वाली ताकतों के विरुद्ध प्रतिरोध का ऐलान करती है.
क्षुद्र स्वार्थ के लालच में तुमने
अपने को बेच दिया है
क्रूर आततायी
तुम तिल तिल तोड़ रहे हो
मानव मन की युग युग से संचित
पूजित प्रतिमाएं सारी
कला सभ्यता की संस्कृति की.
तुमने मजहब डुबो दिया है
गरम रक्त की बैतरिणी में
और अभी तक
प्यास तुम्हारी बुझी नहीं है...
तुम्हें और नरमेध चाहिए. तुम्हें अभी तो युद्ध चाहिए. पृष्ठ 93.
साफ है कि नेमि जी मजहबी संकीर्णताओं, स्वार्थपरताओं, घृणा के नियामकों और युद्धोन्मादी ताकतों का विरोध करते हैं और कहते हैं ---आज तुम्हारे गीत घृणा के ठेकेदारों हम न सुनेंगे. अब हम अपनी क्षमता को पहचान गए हैं. अब हम आगे बढ़ कर खुद अपने हाथो. अपना भविष्य निर्माण करेंगे. वही,
पृष्ठ 95.
पीड़ित मानवता का पक्ष
कवि का पक्ष तो पीड़ित मानवता का पक्ष होता है. तुलसी यदि अपने समय के बड़े कवि हुए तो केवल इस नाते नहीं कि उन्होंने धीरोदात्त राम और उनके आदर्शो का बखान किया. तुलसी ने एक बड़ी प्रतिमा की छाया में समाज के आचार विचार, उसकी मर्यादाओं, लोकमानस, उसकी प्रवृत्तियों का उन्मेष
करते हैं. नेमि जी तुलसी पर कविता लिखते हुए यह पाते हैं कि कवि का दाय बहुत अधिक है समाज के लिए. पर अभी भी नर नारी दुखी हैं, अयोध्या विकल है, राम वनवासी हैं, अगणित राम---जिसे हमें राम: रामौ रामा: की बहुवचनीयता में देख सकते हैं. सीता बंदिनी है, कुटिल राक्षसों की स्वर्णलंका अभी ध्वस्त नहीं हुई- सदियों पहले तुलसी ने जो लोक का, समाज का, राजा-प्रजा का जो मानक सामने रखा उसके आलोक में नेमि जी कवि के उच्चादर्शों का आवाहन करते हैं. मानस के कवि को संबोधित करते हुए वे ये आशा जताते हैं कि ''कवि फिर तुम्हारे रथचक्र की लीकों पर चल कर ही होगा निर्माण. नये युग के नये मानस का.''
नेमि जी के हृदय में शहरी गरीबों के लिए, गंवई किसानों के लिए पीड़ा है. नींद नहीं आती है कि वजह कोई निजी नहीं, वो परदुखकातरता की ही उपज है. आज फिर नींद नहीं आती है. ये उस गरीबी का आलम है जो एक तरफ औपनिवेशिक दासता की उपज है. गोली का शिकार हुए मिल मजदूर के बच्चों की दुरवस्था की कहानी है तो दूसरी तरफ दैवी आपदा और बाढ से तबाह उजाड़ हुए एक गांव के एक बूढे किसान की कहानी है. जिसका खेत छिन गया है. अकाल में घरवाली नहीं रही. बेटा जेल में बंद हुआ क्योंकि वो हक के लिए लड़ता था.
-एक कराह और आह से गुजरता हुआ उसका जीवन
-उसे नींद नहीं आती है और इधर कवि- उसे भी नींद नहीं आती है. दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै. पर वो भी वो सुबह कभी तो आएगी. रात बीतने को है. इसी आशा में कवि है. ये परदुख कातरता नेमि जी में कूट कूट कर भरी है.
प्रकृति प्रेमी कवि
नेमि जी के काव्य में प्रकृति के प्रति प्रेम की निर्झरिणी बहती है। वे निर्झर को संबोधित करते है बहते जाने के उत्साह को निरंतर बनाए रखने के लिए। वे शिखर को पर्वत को संबोधित करते हैं, उसकी महनीयता को आवाहित करते हैं। वे चांदनी रात का वैभव निहारते हैं। किसी कवि ने कहा है :
आजकल तमाम रात चॉंदनी जगाती है। कवि चांदनी रात के समर्पित एकांत में जग रहा है। जैसे वह चुपचाप अनायास कवि की गोद में सो जाती है। चांदनी गिरिजा कुमार माथुर के यहां भी गृहिणी की तरह आती है: पड़ रही आंन तिरीछी चांदनी/ गंध चौके भरे मैले वसन/ गृहिणी चांदनी चांदनी की रात. पर जहां वे चांदनी की चंचलता के बिम्ब उकेरते हैं, उन्हें शरद की रात चांदनी के मधुर सौरभ से लदी भारावनत लगती है और कवि मन भी विभा के गीत के सस्मित स्वरों के नशे में डूब जाना चाहता है, वहीं वे दशमी के पीताभ रुग्ण चांद का थका थका निस्तेज मुख निहार कर उदास भी होते हैं. उसे देख उन्हें लगता है, लगता है यक्ष्मा से पीड़ित निस्तेज मुख कोई मुझे घूरता है अपलक निस्पंद.
याद रहे कि चांद को लेकर जैसा उत्साह नेमि जी के यहां है, उतनी ही कारुणिकता भी. दशमी का चांद के पीछे की विकलता के पीछे कहीं मुक्तिबोध का चांद का मुँह टेढ़ा है कि यथार्थवादी अभिव्यंजना तो नहीं जो चांद के साथ हमारे छायावादी अवकल्पन को ध्वस्त करता हुआ यथार्थ के कठोर रुग्ण
चांद का अहसास कराता हो!
हमारी पूरी काव्यसंरचना प्रकृति के उपहार से संवलित है. कवि का मन तो वैसे ही बादलों और हवाओं सा चपल चंचल होता ही है ऊपर से आकाश में बादल घिरे हों जीवन को, धरा को अपने सरस अभिषेक से सींचने वाले तो कवि का उत्तप्त मन भी रस प्राण से भर उठता है. उनके समकालीनों में गिरिजा कुमार माथुर ने सबसे ज्यादा अपने काव्य में प्रकृति को दुलराया है। फिर उमड़े मेघ कह कर उन्होंने भी मेघों की चंचलता का चित्रण किया है। पर वे अंतत: मांसल हो उठते हैं। मेघ के साथ उनका प्यार, हरसिंगार झरने लगता है. पर नेमि जी की कविता 'फिर घिरे बादल' में उस पूरी संजीदा उमड़-घुमड़ का वृत्तांत समाहित है जिसमें कवियों के प्राण बसते हैं-
फिर घिरे सहसा गगन में आज बादल हैं
बरस पड़ने को असंयत प्राण चंचल हैं.
जैसा कि मैंने कहा है नेमि जी तमाम एकांतिक अहसासों के बावजूद आशा और विश्वास के कवि हैं. बादल हैं तो अभिलाषा है. बादल हैं तो प्यास की तृप्ति की आस है. वे खुद तो करते ही हैं, कवि जगत से भी इस उन्मेष का स्वागत करने को कहते हैं. देखिए --
धुलेगा जल एक नव उम्नेष के जल से
प्राण जागेंगे नए विश्वास के बल से.
कवि, करोगे क्या न इस उन्मेष का वंदन
नये शुभ उल्लास से अभिभूत अभिनंदन फिर घिरे बादल, पृष्ठ 62
कवियों ने जितना ऋतुराज बसंत पर लिखा है उतना रम कर अन्य ऋतुओं पर नहीं. चैत पर तो बहुत ही कम लिखा गया है. चैत की सॉंझ पर नेमि जी ने लिखा है. चैत की सांझ किसी की याद दिला रही है. मौसमों का हमारे मन से कितना गहरा रिश्ता है. ये कोई चैत की उन्मन दोपहरी ही रही होगी जब केदारनाथ सिंह सरीखे कवि का मन उदास हुआ होगा और ये गीत रच गया होगा- गिरने लगे नीम के पत्ते झरने लगी उदासी मन की. नेमि जी को भी लगता है-
चैत की यह सांझ फीके पड़ रहे हैं रंग
है तुम्हारी याद घिर आयी तिमिर के संग.
अज्ञेय लिखते है, 'वह गाता है अनघ सनातनजयी' हो न हो अज्ञेय की इस प्रतिश्रुति को नेमि जी ने मान देकर ही 'कवि गाता है' जैसी अलबेली कविता लिखी हो. ये कवि की महिमा और उसके वास्तविक कार्यभार का गान भी है. और उसकी संकीर्णता पर प्रहार भी जहां वो श्रमश्लथ मजदूरों के बलिदान से बने महलों की सुदंर राजकुमारियों के रुप और वैभव पर गलित गीत लिखता है.
कवि गाता है-
संक्रांतिकाल का कलाकार कवि गाता है.
.....
पीड़ित मानवता के युग का कलाकार कवि-
गाता है
वह कलाकार है
व्याकुल मानवता की संस्कृति की रक्षा का
उसके ऊपर आज भार है
भूति भविष्यत वर्तमान को
देख रहा वह आर पार है
वह ईश्वर है वह ज्ञाता है
दानवता से रौंदे जाते मनुष्यत्व का प्रतिनिधि है. कवि गाता है, पृष्ठ 10.
जीवन की वास्तविकता का बोध
कहना न होगा कि नेमिचंद्र जैन की कविताओं का संसार एक उद्विग्न कवि की कविताओं का संसार है. वो न कल्पनाओं को बरजने का हामी है न संसार के यथार्थ बोध को नकारने का. जीवन की वास्तवता का बोध उसके यहां बखूबी है. जिसे हम कवि के काव्य में उत्तर छायावादी वैशिष्ट्य के रूप में देखते हैं. वो वास्तव में उसी के शब्दों में संक्रांति के रंगों का समावेशन है. संस्कार और विवेक की कश्मकश है. उनके यहां सौंदर्य का स्वीकार है, क्योंकि वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि सौंदर्य की अनुभूति जीवन की स्वीकृति का महत्वपूर्ण चिह्न है. जिसमें सौंदर्यबोध क्षीण है. उसे जीवित नहीं कहा जा सकता यही कारण है कि वे रवींद्रनाथ टैगोर के सौंदर्यपूजक व्यक्तित्व या सौंदर्यबोध को आज के प्रगतिशीलों से कहीं अधिक जीवंत व ईमानदार मानते हैं.
प्रयोगवादी कविता में जिस वैयक्तिकता को एक काव्यमूल्य के रूप में देखा जाता है और जिसे प्रगतिवादी दृष्टि के आलोचक संशय के घेरे में रखते आए हैं. उसके लिए नेमि जी ने तारसप्तक के अपने वक्तव्य में साफ़-साफ़ कहा है कि कला की सच्ची प्रगतिशीलता कलाकार के व्यक्तित्व की सामाजिकता में है, व्यक्तिहीनता में नहीं. वे मानते हैं कि एक व्यक्ति की ही तरह कवि का भी एक नागरिक और सामाजिक दायित्व है पर उन्हें क्षोभ से कहना पड़ा कि आज के अधिकांश हिंदी काव्य में या तो उच्छवास है या पैटर्न. उनका मानना रहा है कि वास्तवदर्शी हुए बिना कवि अधिक काल तक कवि नहीं रह सकता क्योंकि स्वभाव से ही कला मानव मुक्ति का आलोक है. कविता भी तो मानवमुक्ति का पर्याय है.
कविता की मुक्ति भी अंतत: मानव मुक्ति में ही है. वे संकोच से कहते हैं, ''कविता कला पर मेरी इन सारी बातों को मेरी कविता में खोजें ये जरूरी नहीं है क्योंकि संक्रांतिकाल के कवि की कठिनाइयां बहुत हैं. तथापि अगर कवि अपने मन की बेईमानी को भी ईमानदारी से देख कर दुनिया के आगे रख सके तो वो बहुत है.''
इस तरह नेमि जी का काव्य जगत भले ही परिमाण में कम हो किन्तु उनके कवि के अंत:करण की विशालता और समावेशिता का सूचक तो है ही. उनका सर्जनात्मक जीवन नाट्यकर्म, रंग समीक्षा, नटरंग के संपादन इत्यादि में लगा रहा पर कविता उनके अंत:करण से लगी रही. वो जितना भी लिख सके सहेज सके वो कवि रूप में उनके काव्य की चरितार्थता का प्रमाण है. शती के बहाने उनके काव्य की प्रासंगिकता पर चर्चाएं हों, ये नेमि जी और उसके युगीन काव्यबोध और काव्यादर्श को समझने की दिशा में सहायक होगा.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. उनकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. वे हिंदी अकादेमी की युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं. उनसे जी-1/506 ए, उत्तम नगर नई दिल्ली- 110059, dromnishchal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.