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कवि और कविताओं के नाम रहा साहित्य अकादमी का 'साहित्योत्सव 2021'

साहित्य की दुनिया में कोरोना काल की महामारी के बाद यह पहला बड़ा जमीनी आयोजन था. साहित्य अकादमी के त्रिदिवसीय आयोजन 'साहित्योत्सव 2021' में तीनों दिन देश भर से आए साहित्यकारों, समीक्षकों, लेखकों, अनुवादकों और पत्रकारों गहमागहमी बनी रही.

साहित्योत्सव 2021: चंद्रशेखर कंबार, के श्रीनिवासराव और माधव कौशिक साहित्योत्सव 2021: चंद्रशेखर कंबार, के श्रीनिवासराव और माधव कौशिक

नई दिल्ली: साहित्य की दुनिया में कोरोना काल की महामारी के बाद यह पहला बड़ा जमीनी आयोजन था. साहित्य अकादमी के त्रिदिवसीय आयोजन 'साहित्योत्सव 2021' में तीनों दिन देश भर से आए साहित्यकारों, समीक्षकों, लेखकों, अनुवादकों और पत्रकारों गहमागहमी बनी रही. इस दौरान अकादमी के प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कारों के साथ ही, बाल, युवा और अनुवाद पुरस्कारों की भी घोषणा भी हुई.

'साहित्योत्सव 2021' की शुरुआत अकादमी की वर्षभर की गतिविधियों को प्रदर्शित करने वाली 'अकादमी प्रदर्शनी 2020' से हुआ. इस प्रदर्शनी का उद्घाटन साहित्य अकादमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने किया. इस अवसर पर साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक, साहित्य अकादमी की सामान्य परिषद् के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य लेखक एवं विद्वान भी उपस्थित थे.

प्रदर्शनी के उद्घाटन से पहले साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने साहित्य अकादमी द्वारा पिछले वर्ष किए गए महत्त्वपूर्ण कार्यों के बारे में विस्तृत जानकारी दी. राव ने बताया कि कोरोना महामारी के कारण आई रुकावटों के बावजूद अकादमी के कार्यक्रम जारी रहे. हालांकि इसका स्वरूप बदल गया और इन्हें वर्चुअल आयोजित किया गया. पिछले वर्ष 540 वर्चुअल कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिन्हें यूट्यूब पर लगभग दो लाख, फेसबुक पर सात लाख दस हजार एवं ट्वीटर पर सत्रह लाख साहित्य प्रेमियों ने देखा.

अकादमी ने इस वर्ष 235 पुस्तकों का प्रकाशन भी किया. प्रदर्शनी में साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित भारत की दस कालजयी कृतियों के रूसी एवं चीनी अनुवाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पत्रों का अंग्रेज़ी, हिंदी एवं बाङ्ला में प्रकाशन तथा 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' योजना के अंतर्गत प्रकाशित पुस्तकों और आयोजित कार्यक्रमों की सूचनाओं को भी प्रदर्शित किया गया.

इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय कविता दिवस, अंतर्राष्ट्रीय स्वदेशी भाषा दिवस, महात्मा गाँधी के 150वें जयंती वर्ष पर अकादमी द्वारा आयोजित विशेष कार्यक्रमों की जानकारी भी प्रदर्शित की गई.

इसी दिन शाम को हिंदी के प्रख्यात कवि, आलोचक और साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान में महत्तर सदस्य विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने प्रतिष्ठित संवत्सर व्याख्यान प्रस्तुत किया. इस साल व्याख्यान का विषय था, 'कविता और सर्जनात्मक साहित्य का स्व भाव'. तिवारी ने अपने उद्बोधन में कहा कि भाषा अपने आप में मनुष्य की सर्जनात्मक चेतना का सबसे बड़ा चमत्कार है, इसीलिए कवि रचनाकार के साथ तो भाषा का संबंध जल और वीचि जैसा है. अर्थवान शब्द देने की क्षमता के अतिरिक्त लेखक के पास दूसरी कोई पूँजी नहीं होती.

तिवारी का कहना था कि 'देखने' और 'कहने' के अनोखे अंदाज़ में ही कवि और रचनाकार की सर्जनात्मकता सिद्ध होती है. कवि जब देखता है तो सामान्य को भी विशिष्ट बना देता है. फ़िराक़ गोरखपुरी कहते थे कि लोग बड़ी-बड़ी चीज़ें देख लेते हैं पर यह नहीं देख पाते कि उनके पैरों के नीचे की घास कैसे सिर उठाती है. कबीर अपने एक पद में कहते हैं, 'चींटी के पग रुनझुन बाजे, सो भी साईं सुनता है.' कवि भी ईश्वर की ही तरह सब कुछ सुनता और देखता है.

तिवारी ने अपने विस्तृत व्याख्यान में पश्चिम और भारत के कई स्थापित लेखकों एवं आलोचकों के सूत्र वाक्यों का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी. व्याख्यान की समाप्ति के बाद इसकी एक पुस्तकाकार प्रति का लोकार्पण अकादमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार द्वारा किया गया. इस अवसर पर साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक भी उपस्थित थे.

संवत्सर व्याख्यान देते प्रसिद्ध कवि, आलोचक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

व्याख्यान के आरंभ में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने उनका स्वागत शॉल और पुस्तकें भेंट करके किया. उन्होंने कहा कि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी केवल हिंदी ही नहीं बल्कि आधुनिक भारतीय भाषाओं के बड़े कवि हैं. मैंने उनके अध्यक्षीय कार्यकाल में पाँच वर्ष उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए उनकी बहुमुखी प्रतिभा को बहुत अच्छे से जाना समझा है.

इससे पहले साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने सवंत्सर व्याख्यान के बारे में बताया कि यह अकादमी की प्रतिष्ठित व्याख्यान शृंखला की पैंतीसवीं कड़ी है. इस व्याख्यान को देश के प्रमुख विद्वान प्रस्तुत करते रहे हैं, जिनमें- अज्ञेय, निर्मल वर्मा, विजय तेंदुलकर, गिरीश कर्नाड, विंदा करंदिकर, गोपीचंद नारंग, रामचंद्र गुहा एवं प्रणव मुखर्जी जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं.

'साहित्योत्सव 2021' के दूसरे दिन का मुख्य आकर्षण साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार 2019 अर्पण समारोह था, जो कमानी सभागार में संपन्न हुआ. समारोह के आरंभ में, साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने सभी का स्वागत करते हुए अनुवाद की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनुवाद ही ज्ञान की कुंजी है.

समारोह की मुख्य अतिथि प्रख्यात हिंदी कथा लेखिका चित्रा मुद्गल थीं. उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि अनुवादक एक सीमा तक स्वयं लेखक होता है. अच्छे अनुवादक के लिए परकाया प्रवेश का हुनर होना बहुत ज़रूरी है.

साहित्य का अनुवाद अतिरिक्त सतर्कता की माँग करता है और इसके लिए मनोवैज्ञानिक विवेक की भी आवश्यकता है, क्योंकि इसके होने पर ही कोई अनुवादक रचना के मर्म तक पहुँच सकता है. सभी पुरस्कृत अनुवादकों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले समय में अनुवादकों की विशेष भूमिका रहेगी.

इससे पहले साहित्य अकादमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने कहा कि हमारी बहुआयामी संस्कृति की एकता का आधार अनुवाद ही है. पूरे भारतीय महाद्वीप में जो सांस्कृतिक एकता हम देखते हैं वह विभिन्न भाषाओं और उनसे हुए अनुवादों के चलते ही है. हमारी कई प्राचीन पौराणिक कथाओं ने अनुवाद के ज़रिए ही एक पहचान पाई है.

साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार 2019 से सम्मानित होने वाले अनुवादक थे- नव कुमार सन्दिकै (असमिया), तपन बंद्योपाध्याय (बाङ्ला), रत्न लाल बसोत्रा (डोगरी), सुसन डैनियल (अंग्रेज़ी), आलोक गुप्त (हिंदी), विट्ठलराव टी. गायकवाड (कन्नड), रत्न लाल जौहर (कश्मीरी), जयंती नायक (कोंकणी), केदार कानन (मैथिली), सई परांजपे (मराठी), सचेन राई ‘दुमी’ (नेपाली), अजय कुमार पटनायक (ओड़िआ), देव कोठारी (राजस्थानी), प्रेमशङ्कर शर्मा (संस्कृत), खेरवाल सोरेन (संताली), ढोलन राही (सिंधी), के.वी. जयश्री (तमिळ), पी. सत्यवती (तेलुगु) एवं असलम मिर्ज़ा (उर्दू).

पुरस्कृत अनुवादकों को पुरस्कार के रूप में 50000/- रुपये की राशि और उत्कीर्ण ताम्र फलक साहित्य अकादमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार द्वारा प्रदान किए गए. गोपीनाथ ब्रह्म (बोडो), बकुला घासवाला (गुजराती), सी.जी. राजगोपाल (मलयाळम्), खुमांथेम प्रकाश सिंह (मणिपुरी) एवं प्रेम प्रकाश (पंजाबी) अपरिहार्य कारणों से पुरस्कार ग्रहण करने नहीं आ सके. इस कार्यक्रम के अंत में, समापन वक्तव्य देते हुए साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि अनुवादक साहित्य के सबसे बड़े मिशनरी हैं. वे लेखकों द्वारा रचे मौन को भी पढ़कर उसको सार्थक अभिव्यक्ति देते हैं.

अनुवाद पुरस्कार विजेताओं के साथ प्रख्यात लेखिका चित्रा मुद्गल व साहित्य अकादमी के पदाधिकारी
अनुवाद पुरस्कार विजेताओं के साथ चर्चित लेखिका चित्रा मुद्गल और साहित्य अकादमी के पदाधिकारी

'साहित्योत्सव 2021' के तीसरे और अंतिम दिन अनुवादक सम्मिलन का आयोजन साहित्य अकादमी के सभागार रवीन्द्र भवन में हुआ. इस दौरान साहित्य अकादमी द्वारा अनुवाद पुरस्कार 2019 से पुरस्कृत अनुवादकों ने अपने रचनात्मक अनुभव साझा किए. इस अनुवाद सम्मिलन की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने की.

इस सम्मिलन में असमिया में पुरस्कृत नव कुमार सन्दिकै ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि संस्कृत कृति 'राजतरंगिणी' के कालजयी विषय ने उन्हें इसका अनुवाद असमिया लोगों के बीच लाने के लिए प्रेरित किया. तपन बंद्योपाध्याय, जो कि स्वयं प्रख्यात बाङ्ला कथाकार है ने कहा कि अच्छा समय व्यतीत करने के लिए वे अनुवाद कार्य करते हैं, लेकिन बड़ी गंभीरता के साथ.

हिंदी में पुरस्कृत आलोक गुप्त ने कहा कि भारत की बहुभाषिकता और बहुसांस्कृतिकता एक वरदान है और इस विरासत का सही परिचय कराना हम अनुवादकों का सबसे बड़ा दायित्व है. उन्होंने बताया कि जिस रचना के अनुवाद के लिए मुझे अकादमी ने पुरस्कृत किया है, वह गुजराती का वृहद उपन्यास 'सरस्वतीचंद्र' (चार खंडों में) 2000 पृष्ठों का उपन्यास है. यह उस समय की रचना है जब भारतीय भाषाओं में इतने व्यापक फलक पर कोई उपन्यास नहीं लिखा गया था.

कन्नड़ के लिए पुरस्कृत विट्ठलराव टी. गायकवाड ने कन्नड और मराठी में अनुवाद की पूरी परंपरा का विस्तार से उल्लेख किया. कश्मीरी के लिए पुरस्कृत रत्न लाल जौहर ने अपने अनुवादक होने का श्रेय साहित्य अकादमी द्वारा समय-समय पर आयोजित की जाने वाली अनुवाद कार्यशालाओं को दिया.

कोंकणी के लिए पुरस्कत जयंती नायक ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘जिंदगीनामा’ उपन्यास, प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार कृष्णा सोबती की एक महत्त्वपूर्ण तथा विलक्षण कृति है. उसमें जीवन का हर पहलू है. कहने को तो यह पंजाब के जीवन, इतिहास एवं संस्कृति की पृष्ठभूमि में रचित उपन्यास है, लेकिन सही मायने में यह पूरे भारतवर्ष का मौखिक इतिहास है.

मैथिली के लिए पुरस्कृत केदार कानन ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैथिली में अन्य भारतीय भाषाओं की तरह ही साहित्य सृजन की लंबी परंपरा रही है. अनुवाद कार्य कठिन है. कठिन इस अर्थ में कि जब तक आप रचना और रचनाकार के मानस और प्रकृति में डूब नहीं जाते, रम नहीं जाते, आप अच्छा सृजनात्मक अनुवाद नहीं कर पाएँगे. यह चुनौती भरा काम है, लेकिन इससे मुठभेड़ करना ही पड़ता है, तभी तो अनुवाद को रचनाओं का पुनर्सृजन माना जाता है.

नसीरुद्दीन शाह की अंग्रेज़ी आत्मकथा के मराठी अनुवाद के लिए पुरस्कृत सई परांजपे ने कहा कि नसीर के लेखन में जो ताज़गी और सच्चाई थी उसने मुझे बेहद प्रभावित किया. जहाँ कठिनाई हुई मैंने उनके साथ विचार-विमर्श कर उसे समझा और सुधारा. संस्कृत के लिए पुरस्कृत प्रेमशङ्कर शर्मा ने बताया कि विज्ञान का विद्यार्थी होते हुए भी उनकी रुचि धर्म, साहित्य और दर्शन में थी, जो कालांतर में संस्कृत प्रेम में परिवर्तित हुई.

ओड़िआ में पुरस्कृत अजय कुमार पटनायक ने अपने वक्तव्य में कहा कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर देश-विदेश के बीच संपर्क सेतु स्थापन में अनुवाद की गुरुत्वपूर्ण भूमिका रही है. न केवल साहित्य और संस्कृति, बल्कि विभिन्न आविष्कार, धर्म, विज्ञान, चिकित्सा, राजनीति, व्यापार, शिक्षा, प्रौद्योगिकी आदि प्रत्येक क्षेत्र में भाव विनिमय हेतु समग्र विश्व का कल्याण हो सका है. अनूदित ग्रंथ जहाँ मौलिक ग्रंथ का अनुभव ला देता है, उसे सफल अनुवाद माना जाता है. उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि नई पीढ़ी के लिए निरंतर उच्चस्तरीय अनुवाद प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए जिसमें अनुवाद की बारीकियों, भाषिक संवेदनाओं एवं स्वरूपों पर गहन चर्चा हो.

राजस्थानी में पुरस्कृत देव कोठारी ने कहा कि 'चारु वसंता' कन्नड़ भाषा के ख्यातनाम लेखक नाडोज प्रो. हम्पा नागराजय्या का जनमुखी और समाजमुखी लोक महाकाव्य है. मैंने इसे पढ़ तथा यह पाया कि इसके रोचक कथानक, भाषायी वैभव तथा सांस्कृतिक एवं सामाजिक सम्प्रेषण की इसमें तथ्यात्मक एवं प्रवाहमयी अभिव्यक्ति हुई है. इस तरह के कथानक से मैं काफ़ी प्रभावित हुआ और इसका अनुवाद कर मुझे काफ़ी आत्मीय संतोष हुआ है. संताली, नेपाली एवं तमिळ अनुवादकों ने भी अपने विचार साझा किए.

सिंधी में पुरस्कृत ढोलन राही ने अपने वक्तव्य में कहा कि अनुवाद कर्म अत्यंत ज़िम्मेदारी भरा दुष्कर कार्य है. एक तरह से परकाया प्रवेश कर एक नई कायाकृति के सृजन जैसा या किसी इमारत को तोड़कर उसके मलबे से किसी नई इमारत के पुनर्निर्माण सरीखा यह कार्य होता है.

तेलुगु में पुरस्कृत पी. सत्यवती ने कहा कि मुझे अंग्रेज़ी से अनुवाद करते समय लेखक द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली संबंध सूचक शब्दावली से कई मुश्किलें हुईं, ख़ासतौर पर अंकल और कज़िन के भारतीय रिश्तों को समझाने के लिए. उर्दू में पुरस्कृत असलम मिर्ज़ा ने कहा अनुवाद पाठकों के लिए ही नहीं बल्कि सृजनात्मक लेखकों के लिए भी नए द्वार खोलते हैं.

साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि अनुवादक विभिन्न देशी-विदेशी संस्कृतियों को मिलाने का काम कर रहे हैं और आने वाला दशक अनुवादकों का ही होगा. संचार माध्यमों और तकनीक के व्यापक प्रसार के कारण अनुवाद आने वाले समय में सबसे महत्त्वपूर्ण तो रहेगा ही बल्कि उसे अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी प्राप्त होगी. अंत में, साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया.

याद रहे कि साहित्य अकादमी ने 'साहित्योत्सव 2021' के दौरान ही अकादमी द्वारा दिए जाने वाले प्रतिष्ठित अकादमी पुरस्कारों की भी घोषणा की थी. इसी दौरान युवा पुरस्कार और बाल पुरस्कार भी घोषित किए गए. साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव की विज्ञप्ति के अनुसार अध्यक्ष प्रो. चंद्रशेखर कम्बार की अध्यक्षता में अकादमी के कार्यकारी मंडल की दिल्ली में संपन्न बैठक में विजेताओं अनुमोदित किया गया. इन पुस्तकों को त्रिसदस्यीय निर्णायक मंडल ने निर्धारित चयन प्रक्रिया का पालन करते हुए पुरस्कार हेतु चुना है. नियमानुसार, कार्यकारी मंडल ने निर्णायकों के बहुमत अथवा सर्वसम्मति के आधार पर चयनित पुस्तकों को पुरस्कार के लिए संस्वीकृत किया.

साहित्य अकादमी के वार्षिक पुरस्कारों के तहत 20 भाषाओं के रचनाकारों के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा की गई. इनमें सात कविता-संग्रह, चार उपन्यास, पांच कहानी-संग्रह, दो नाटक, एक-एक संस्मरण और महाकाव्य के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार घोषित किए गए. मलयालम, नेपाली, ओड़िआ और राजस्थानी भाषाओं में पुरस्कार बाद में घोषित किया जाएगा.

पुरस्कारों की अनुशंसा 20 भारतीय भाषाओं की निर्णायक समितियों ने की और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. चंद्रशेखर कंबार की अध्यक्षता में अकादमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में इन्हें चुना गया. नियमानुसार कार्यकारी मंडल ने निर्णायकों के बहुमत के आधार पर अथवा सर्वसम्मति के आधार पर चयनित पुस्तकों के लिए आज पुरस्कारों की घोषणा की है. पुरस्कार 1 जनवरी, 2014 से 31 दिसम्बर, 2018 के दौरान पहली बार प्रकाशित पुस्तकों पर दिया गया है. पुरस्कार विजेता को पुरस्कार स्वरूप एक उत्कीर्ण ताम्रफलक, शॉल और एक लाख रुपए की राशि आने वाली किसी तिथि में एक विशेष कार्यक्रम में प्रदान की जाएगी.

वार्षिक युवा पुरस्कार 2020 के तहत 18 भाषाओं में युवा पुरस्कार 2020 की घोषणा की गई. इसमें 10 कविता संकलन, तीन कहानी संग्रह,  दो निबंध संकलन, एक संस्मरण, एक आलोचना और यात्रा-वृत्तांत की एक पुस्तक शामिल है. प्रक्रिया के अनुसार, कार्यकारी मंडल ने चयन समिति द्वारा एकमत अथवा बहुमत से चुनाव के आधार पर पुरस्कारों की घोषणा की. ये पुरस्कार किसी लेखक, जिसकी उम्र पुरस्कार-वर्ष में 1 जनवरी को 35 वर्ष से कम हो, उसकी प्रकाशित पुस्तक पर दिए जाते हैं. इस पुरस्कार के तहत विजेता को पुरस्कार-स्वरूप एक उत्कीर्ण ताम्र फलक तथा रु. 50000/- की राशि का चेक आने वाली किसी तिथि में एक विशेष कार्यक्रम में प्रदान किए जाएंगे.

बाल साहित्य पुरस्कारों के तहत 21 लेखकों के नाम की घोषणा की गई. विजेताओं को पुरस्कार स्वरूप एक उत्कीर्ण ताम्रफलक और 50,000/- रु. की राशि बाद में आयोजित होने वाले एक विशेष समारोह में प्रदान किए जाएंगे. मलयालम, संस्कृत और तमिळ में पुरस्कार बाद की किसी तिथि में घोषित किया जाएगा. यह पुरस्कार उन पुस्तकों से संबंधित था, जो पुरस्कार वर्ष के तत्काल पूर्ववर्ती वर्ष के अंतिम पाँच वर्षों में (अर्थात 1 जनवरी, 2014 से 31 दिसम्बर, 2018 के मध्य) प्रथम बार प्रकाशित हुई हैं.

वैसे तो साहित्य अकादमी ने अपनी तरफ से इस बात की पूरी कोशिश की कि उसके पुरस्कार उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप हों, पर देश का साहित्यिक वर्ग इतना बड़ा है कि उसपर पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं होती ही हैं. इस साल संतोष की बात यही रही कि सोशल मीडिया पर कुछ छिटपुट टिप्पणियों के अलावा कोई खास आलोचना अकादमी के निर्णयों की नहीं हुई.

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