कवि केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और नागार्जुन के साथ प्रगतिशील कवियों की त्रयी के महत्त्वपू्र्ण स्तंभ हैं. उनकी कविताओं में एक लयात्मकता है. जीवन की सच्चाई के साथ ही उनके शब्द प्रकृति के सौंदर्य से खेलते से लगते हैं. केदारनाथ अग्रवाल बुंदेलखंड की धरती से जुड़े ऐसे कवि हैं, जिनकी रचनाओं में अपनी माटी की महक और उसके निवासियों का जीवन अपनी समूची विशेषताओं के साथ उपलब्ध है.
केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में संगीत का एक प्रवाह है. कविताएं चाहे उदासी की हों, उल्लास की, संघर्ष की या सियासत की. केदार जी की कविताओं पर काम करने वाले अशोक त्रिपाठी का कहना है कि केदार धरती के कवि हैं- खेत, खलिहान, कारखाने, और कचहरी के कवि हैं. इन सबके दुःख-दर्द, संघर्ष और हर्ष के कवि हैं. वे पीड़ित और शोषित मनुष्य के पक्षधर हैं. वे मनुष्य के कवि हैं. मनुष्य बनना और बनाना ही उनके जीवन की तथा कवि-कर्म की सबसे बड़ी साध और साधना थी....
अपनी कविताओं को लेकर खुद केदारनाथ अग्रवाल ने कहा था कि मैं नई कविता का विरोधी नहीं, उसके उन सब तत्वों का विरोधी हूं जो उसे कविता नहीं, 'मस्तिष्क की विकृति' और 'युग विशेष की एकांगी आकृति' बना देते हैं. नई उपमाओं, नए स्पर्शों के धरातल, नए आकार, नई ग्रहणशीलता आदि सबका स्वागत है. आज उनकी जयंती पर 'साहित्य आजतक' के पाठकों के लिए उनकी दो सर्वश्रेष्ठ कविताएं.
1.
बसंती हवा
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ.
सुनो बात मेरी -
अनोखी हवा हूँ.
बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्तमौला.
नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ.
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ.
न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ.
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!
जहाँ से चली मैं
जहाँ को गई मैं -
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत, निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं।
झुमाती चली मैं!
हवा हूँ, हवा मै
बसंती हवा हूँ।
चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची -
वहाँ, गेंहुँओं में
लहर खूब मारी।
पहर दो पहर क्या,
अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!
खड़ी देख अलसी
लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी -
हिलाया-झुलाया
गिरी पर न कलसी!
इसी हार को पा,
हिलाई न सरसों,
झुलाई न सरसों,
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!
मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा -
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!
2.
हमारी जिंदगी
हमारी जिंदगी के दिन,
बड़े संघर्ष के दिन हैं!
हमेशा काम करते हैं,
मगर कम दाम मिलते हैं.
प्रतिक्षण हम बुरे शासन-
बुरे शोषण से पिसते हैं!!
अपढ़, अज्ञान, अधिकारों से
वंचित हम कलपते हैं.
सड़क पर खूब चलते
पैर के जूते-से घिसते हैं.
हमारी जिंदगी के दिन,
हमारी ग्लानि के दिन हैं!!
हमारी जिंदगी के दिन,
बड़े संघर्ष के दिन हैं!
न दाना एक मिलता है,
खलाये पेट फिरते हैं.
मुनाफाखोर की गोदाम
के ताले न खुलते हैं.
विकल, बेहाल, भूखे हम
तड़पते औ' तरसते हैं.
हमारे पेट का दाना
हमें इनकार करते हैं.
हमारी जिंदगी के दिन,
हमारी भूख के दिन हैं!!
हमारी जिंदगी के दिन,
बड़े संघर्ष के दिन हैं!
नहीं मिलता कहीं कपड़ा,
लँगोटी हम पहनते हैं.
हमारी औरतों के तन
उघारे ही झलकते हैं.
हजारों आदमी के शव
कफन तक को तरसते हैं.
बिना ओढ़े हुए चदरा,
खुले मरघट को चलते हैं.
हमारी जिंदगी के दिन,
हमारी लाज के दिन हैं!!
हमारी जिंदगी के दिन,
बड़े संघर्ष के दिन हैं!
हमारे देश में अब भी,
विदेशी घात करते हैं.
बड़े राजे, महाराजे,
हमें मोहताज करते हैं.
हमें इंसान के बदले,
अधम सूकर समझते हैं.
गले में डालकर रस्सी
कुटिल कानून कसते हैं.
हमारी जिंदगी के दिन,
हमारी कैद के दिन हैं!!
हमारी जिंदगी के दिन,
बड़े संघर्ष के दिन हैं!
इरादा कर चुके हैं हम,
प्रतिज्ञा आज करते हैं.
हिमालय और सागर में,
नया तूफान रचते हैं.
गुलामी को मसल देंगे
न हत्यारों से डरते हैं.
हमें आजाद जीना है
इसी से आज मरते हैं.
हमारी जिंदगी के दिन,
हमारे होश के दिन हैं!!