होली को रंगोत्सव यों ही नहीं कहते. इस त्योहार के दौरान केवल प्रकृति और समाज पर ही रंगों का खुमार नहीं चढ़ता बल्कि शब्द भी रंगारंग अभिव्यक्ति देते हैं. संस्कृत और हिंदी में हिंदू व मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में रंगोत्सव का बखूबी जिक्र किया है.
'साहित्य आजतक' अपने पाठकों के लिए 'रंगोत्सव' की पहली कड़ी में अमीर खुसरो, मीरा बाई, नज़ीर अकबराबादी, और भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखी गई होली कविताः
होली कविताएं
1.
दैया री मोहे भिजोया री
- अमीर खुसरो
दैया री मोहे भिजोया री
शाह निजाम के रंग में.
कपरे रंगने से कुछ न होवत है
या रंग में मैंने तन को डुबोया री
पिया रंग मैंने तन को डुबोया
जाहि के रंग से शोख रंग सनगी
खूब ही मल मल के धोया री
पीर निजाम के रंग में भिजोया री.
2.
होली पिया बिण म्हाणे णा भावाँ
- संत मीरा बाई
होली पिया बिण म्हाणे णा भावाँ घर आँगणां णा सुहावाँ।।टेक।।
दीपाँ चोक पुरावाँ हेली, पिया परदेस सजावाँ.
सूनी सेजाँ व्याल बुझायाँ जागा रेण बितावाँ.
नींद णेणा णा आवाँ.
कब री ठाढ़ी म्हा मग जोवाँ निसदिन बिरह जगावाँ.
क्यासूं मणरी बिथा बतावाँ, हिवड़ो रहा अकुलावाँ.
पिया कब दरस दखावां.
दीखा णां कोई परम सनेही, म्हारो संदेसाँ लावाँ.
वा बिरियां कब कोसी म्हारी हँस पिय कंठ लगावाँ.
मीराँ होली गावाँ..
(भावाँ= अच्छा लगना, हेली= सखी, व्याल = साँप, मणरी =मन की, बिथा =व्यथा, बिरियां =अवसर)
3.
होली की बहार
- नज़ीर अकबराबादी
हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।
एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।
जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।
तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।
और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।
नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।
4.
होली
- भारतेंदु हरिश्चंद्र
कैसी होरी खिलाई।
आग तन-मन में लगाई॥
पानी की बूँदी से पिंड प्रकट कियो सुंदर रूप बनाई।
पेट अधम के कारन मोहन घर-घर नाच नचाई॥
तबौ नहिं हबस बुझाई।
भूँजी भाँग नहीं घर भीतर, का पहिनी का खाई।
टिकस पिया मोरी लाज का रखल्यो, ऐसे बनो न कसाई॥
तुम्हें कैसर दोहाई।
कर जोरत हौं बिनती करत हूँ छाँड़ो टिकस कन्हाई।
आन लगी ऐसे फाग के ऊपर भूखन जान गँवाई॥
तुन्हें कछु लाज न आई।
5.
गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में
- भारतेंदु हरिश्चंद्र
गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में
नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे
ये आशिक की है उमड़ी आहें आतिशबार होली में
गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में
है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुछ है
बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ दिलदार होली में
रस गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी
नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में
(गुलाले-सुर्ख=लाल गुलाल, आतिश=आग)