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Maternity Leave For Indian Women: क्या भारतीय महिलाओं की नौकरियों के लिए खतरा है एक्सटेंडेड मैटरनिटी लीव? जानिए क्या कहती है रिसर्च

Maternity Leave For Indian Women: ऑफिस में महिलाओं को मिलने वाले अधिकारों में मैटरनिटी लीव भी हैं, जिनके लिए उन्हें पूरी सैलरी दी जाती है. यूं तो एक्सटेंडेड मैटरनिटी लीव को सही इरादों के साथ पेश किया जा रहा है, लेकिन एक नई रिसर्च से पता चलता है कि इसके परिणाम अनपेक्षित हो सकते हैं.

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प्रेग्नेंट महिला की प्रतिकात्मक तस्वीर
प्रेग्नेंट महिला की प्रतिकात्मक तस्वीर

भारत में महिलाओं के अधिकारों में दिन-ब-दिन इजाफा हो रहा है. महिलाओं के बढ़ते अधिकारों के बीच ऑफिस में मिलने वाले लाभों में भी बढ़ोतरी हो रही है. ऑफिस में महिलाओं को मिलने वाले अधिकारों में मैटरनिटी लीव भी हैं, जिनके लिए उन्हें पूरी सैलरी दी जाती है. यूं तो एक्सटेंडेड मैटरनिटी लीव को सही इरादों के साथ पेश किया जा रहा है, लेकिन एक नई रिसर्च से पता चलता है कि इसके परिणाम अनपेक्षित हो सकते हैं.

महिलाओं को कम ऑफर हुईं नौकरियां
अमेरिकी सरकारी एजेंसी द्वारा फंड की गई एक स्टडी के रिजल्ट से पता चलता है कि अगर भारत में एक्सटेंडेड मैटरनिटी लीव का कानून लागू होने के बाद से ही महिलाओं को छोटी कंपनियों (जिनको प्रॉफिट कम होता है) से आने वाले इंटरव्यू कॉल करीब 22 फीसदी कम आने लगे. दरअसल, छोटी या कम मुनाफे वाली कंपनियों को लंबी मैटरनिटी लीव की आर्थिक लागत या कीमत चुकाने में जद्दोजहद करनी पड़ सकती है या कई छोटी कंपनियां इससे बचना चाहती हैं.

इस स्टडी ने मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट में भारत के 2017 के संशोधन के प्रभाव का आकलन किया, जिसने एम्प्लॉयर-पेड मैटरनिटी लीव को 12 हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते कर दिया गया था. इस स्टडी में 7,103 कंपनियों में 11,408 फुल-टाइम जॉब करने वाले और उनमें अप्लाई करने वाले 676,797 लोगों किए गए 4.1 मिलियन आवेदनों के डाटा का इस्तेमाल किया गया है. स्टडी में इस बात का पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या मैटरनिटी लीव के एक्सटेंशन ने आईटी रोल्स में महिला को काम पर रखने की संभावना को प्रभावित किया है या नहीं. रिसर्चर्स ने मैटरनिटी लीव (अमेंडमेंट) एक्ट, 2017 के पारित होने से 17 महीने पहले और इसके लागू होने के 19 महीने बाद के आंकड़ों पर स्टडी की.

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क्या कहता है अधिनियम?
अधिनियम के तहत, भारत में जॉब प्रोटेक्टेड मैटरनिटी लीव अनिवार्य है, जिसका मतलब होता है कि महिला कर्मचारियों को उनकी डिलीवरी होने के बाद ऑफिस लौटने का पूरा अधिकार है. ब्लू-कॉलर-जॉब्स प्लेटफॉर्म टीमलीज की रिसर्च  में पाया गया कि मैटरनिटी के बाद कर्मचारियों को बनाए रखने पर कंपनियों को वाइट-कॉलर वर्कर की सालाना सैलरी का 80-90 प्रतिशत और ब्लू-कॉलर वर्कर के लिए 135 प्रतिशत तक का खर्च उठाना पड़ सकता है. दिलचस्प बात यह है कि एक्सटेंडेड मैटरनिटी लीव अप्लाई होने के बाद महिलाओं द्वारा सबमिट की गई जॉब एप्लिकेशन पर फर्क नहीं पड़ा है.  

भारत में प्रभाव क्यों अलग?
कार्लसन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट, मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में इनफार्मेशन सिस्टम्स और डिसीजन साइंसेज की एसोसिएट प्रोफेसर और अमेरिकी स्टडी की को-ऑथर सोफिया बापना बताती हैं कि इससे पहले की गई स्टडी में कंपनी में काम करने वाली महिलाओं के ऊपर मैटरनिटी लीव के पॉजिटिव इम्पैक्ट पाए गए थे क्योंकि बाहरी देशों में कंपनी महिलाओं की मैटरनिटी लीव का भुगतान टैक्स, सरकारी प्रोग्राम्स और इंश्योरेंस से करती हैं.  

हालांकि, भारत में स्थिति अलग है क्योंकि कंपनी महिला कर्मचारियों का पूरा खर्च उठाती है. बापना कहती हैं, 'मैनडेटरी इम्प्लॉयर-पेड मैटरनिटी लीव के प्रभाव को स्टडी करना महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि वर्कप्लेस में महिलाओं का समर्थन करने के लिए डिजाइन की गई नीतियां अनजाने में उनकी हाइरिंग को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती हैं, खासकर छोटे या कम प्रॉफिट वाली कंपनियों में.'

सोफिया सुझाव देती हैं कि वर्कप्लेस में जैंडर इक्वैलिटी लाने के लिए मैटरनिटी लीव नियमों में कुछ बदलाव करने की जरूरत है. माताओं के साथ ही पिता को भी लीव मिलनी चाहिए या फिर दोनों के लिए पैरेंटल लीव का नियम लागू करना चाहिए. ऐसे में नौकरी खोने का उनका डर खत्म होगा. 

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