कर्नाटक हाई कोर्ट ने शुक्रवार को सूबे में बाइक-टैक्सी सेवाओं पर लगा बैन हटा दिया और एक सिंगल-जज के पहले के आदेश को रद्द कर दिया है. पिछले आदेश ने सिद्धारमैया सरकार के बैन को सही ठहराया था. चीफ जस्टिस विभु बखरू और जस्टिस सीएम जोशी की बेंच ने सिंगल जज के आदेश के खिलाफ उबर, ओला और रैपिडो की अपीलों को मंज़ूरी दी है. बेंच फैसला सुनाया कि कानूनी अनुमतियों के अधीन बाइक का इस्तेमाल ट्रांसपोर्ट वाहनों के रूप में किया जा सकता है.
कोर्ट ने अप्रैल 2025 के बैन के आदेश को खारिज कर दिया और बाइक मालिकों और एग्रीगेटर्स को लाइसेंस के लिए आवेदन करने का निर्देश दिया है. सरकार को मौजूदा कानूनों के मुताबिक परमिट जारी करने का निर्देश दिया गया है.
कोर्ट ने कहा बाइक टैक्सी सेवाएं मोटर वाहन अधिनियम के तहत ट्रांसपोर्ट वाहनों की परिभाषा में आती हैं. राज्य सरकार इस आधार पर बाइक टैक्सियों को परमिट देने से मना नहीं कर सकती कि मोटरसाइकिलें ट्रांसपोर्ट वाहन नहीं हैं.
'जरूरी शर्तें लगाई जा सकती हैं...'
बाइक टैक्सी ऑपरेटर परमिट के लिए आवेदन कर सकते हैं. सरकार तय कर सकती है कि परमिट देना है या नहीं. क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण कानून के तहत ज़रूरी समझे जाने वाली शर्तें लगाई जा सकती हैं.
ऑर्डर में कहा गया है, "टैक्सी मालिकों को मोटरसाइकिलों को ट्रांसपोर्ट व्हीकल या कॉन्ट्रैक्ट कैरिज के तौर पर रजिस्टर करने के लिए अप्लाई करने की इजाज़त है. राज्य को इन आवेदनों पर कानून के मुताबिक सोचना होगा. एग्रीगेटर भी नए आवेदन जमा करने के लिए आज़ाद हैं, जिन पर कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक कार्रवाई की जानी चाहिए."
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कब लगा बैन और फिर क्या हुआ?
बाइक टैक्सी सेवाओं पर राज्य में पूरी तरह से बैन पिछले साल जून में लागू हुआ था.
कर्नाटक सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के बाद यह बैन लगाया था, जिसने एक साफ रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की कमी का हवाला देते हुए रैपिडो, ओला और उबर मोटो जैसे प्लेटफॉर्म को अवैध घोषित करने वाले पिछले सरकारी आदेश को सही ठहराया था.
उस वक्त, एग्रीगेटर्स ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी से अपील की थी और बैन को रोकने के लिए तुरंत दखल देने का आग्रह किया था. इसके साथ ही चेतावनी दी गई थी कि बैन से लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी और लाखों लोगों के लिए रोज़ाना की सस्ती यात्रा बाधित होगी.
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हालांकि, दो महीने बाद, बाइक टैक्सी ऑपरेटर रैपिडो ने अगस्त 2025 में कोर्ट की मंज़ूरी के बिना सेवाएं फिर से शुरू कर दीं, जिसके बाद कर्नाटक राज्य प्राइवेट ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने एक औपचारिक शिकायत दर्ज की, जिसमें आरोप लगाया गया कि कंपनी की कार्रवाई कोर्ट की अवमानना के बराबर है.