आज के समय में गर्मी से बचने के लिए लोग सबसे पहले पंखा, कूलर और एसी का इस्तेमाल करते हैं. बिना इनके गर्मियों में रहना काफी मुश्किल लगता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब बिजली ही नहीं थी, तब लोग भीषण गर्मी से कैसे रहते थे? खासकर राजा-महाराजा, जो बड़े-बड़े महलों में रहते थे, वे अपने महलों को ठंडा कैसे रखते होंगे? असल में पुराने समय के लोगों के पास आधुनिक मशीनें तो नहीं थीं, लेकिन उनके पास प्रकृति और मौसम को समझने की बेहतरीन तकनीकें थीं. इसी वजह से बिना एसी और कूलर के भी उनके घर और महल ठंडे रहते थे.
तालाब और बगीचों से ठंडा रहता था माहौल
राजा-महाराजा अक्सर अपने महल ऐसी जगहों पर बनवाते थे, जहां आसपास तालाब, झील, बगीचे और फव्वारे हों. पानी और हरियाली की वजह से वातावरण प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता था. महलों के बीच बड़े-बड़े फव्वारे लगाए जाते थे. जब हवा पानी से होकर गुजरती थी तो ठंडी होकर कमरों तक पहुंचती थी. मुगल बादशाहों के महलों में बड़े जलपात्र भी रखे जाते थे. इनसे न सिर्फ सजावट होती थी, बल्कि हवा भी ठंडी रहती थी.
पुराने समय के घरों और महलों की दीवारें बहुत मोटी बनाई जाती थीं. इन्हें मिट्टी, चूना और पत्थर से तैयार किया जाता था. मोटी दीवारें बाहर की गर्मी को अंदर आने से रोकती थीं. इसके अलावा घरों में ऊंची छतें, बड़े आंगन और हवादार बरामदे बनाए जाते थे. इससे हवा आसानी से अंदर-बाहर होती रहती थी और घर ठंडा बना रहता था.
महलों और हवेलियों में बड़ी-बड़ी जालीदार खिड़कियां और झरोखे बनाए जाते थे. इनसे धूप कम आती थी लेकिन हवा लगातार चलती रहती थी. यही प्राकृतिक वेंटिलेशन घर को ठंडा रखने में मदद करता था. आज भी राजस्थान की कई पुरानी हवेलियां और किले गर्मी में अंदर से काफी ठंडे महसूस होते हैं.
खस और हाथ से चलने वाले पंखे
पुराने समय में 'खस' का खूब इस्तेमाल होता था. खस एक खास तरह की घास होती है. इसे खिड़कियों और दरवाजों पर लगाया जाता था और उस पर पानी डाला जाता था. जब हवा खस से होकर गुजरती थी, तो ठंडी हो जाती थी. यह बिल्कुल प्राकृतिक कूलर की तरह काम करता था. इसके अलावा महलों में बड़े-बड़े हाथ से चलने वाले पंखे लगाए जाते थे. कई सेवक इन्हें लगातार चलाते रहते थे ताकि राजा और रानियों को ठंडी हवा मिलती रहे.
मिट्टी के घड़े रखते थे पानी ठंडा
पहले के समय में मिट्टी के घड़ों का खूब इस्तेमाल होता था. घड़े का पानी हमेशा ठंडा रहता था. लोग कमरों में बड़े मिट्टी के बर्तन रखते थे, जिससे कमरे में नमी बनी रहती थी और गर्मी कम महसूस होती थी.
क्या होता है ‘विंड कैचर’?
ईरान, अरब और मिस्र जैसे रेगिस्तानी इलाकों में एक खास तकनीक इस्तेमाल होती थी, जिसे 'विंड कैचर' या 'पवन यंत्र' कहा जाता था. फारसी भाषा में इसे 'बादगीर' कहते थे. यह ऊंची मीनार जैसी संरचना होती थी, जो ऊपर चलने वाली हवा को पकड़कर घर के अंदर भेजती थी. गर्म हवा ऊपर निकल जाती थी और ठंडी हवा कमरों में फैल जाती थी. इसे उस समय का प्राकृतिक एसी माना जाता था.
राजस्थान में भी अपनाई गई ये तकनीक
राजस्थान के जयपुर, जैसलमेर और उदयपुर जैसे शहरों के महलों में भी हवा आने-जाने के खास रास्ते बनाए जाते थे. वहां बड़ी-बड़ी बावड़ियां और तालाब बनाए जाते थे, जिससे आसपास का वातावरण ठंडा रहता था. गर्मी के दिनों में लोग अक्सर रात में छतों पर सोते थे. खुले आसमान और ठंडी हवा की वजह से उन्हें राहत मिलती थी.
आज भी इस्तेमाल हो रही हैं पुरानी तकनीक
आज भी कई आधुनिक इमारतों में पुराने समय की इन तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है. दुबई जैसे गर्म शहरों में विंड कैचर तकनीक दोबारा लोकप्रिय हो रही है. असल में पुराने लोगों के पास एसी नहीं था, लेकिन वे प्रकृति के हिसाब से घर बनाना जानते थे.यही वजह है कि बिना बिजली के भी वे भीषण गर्मी में आराम से रह लेते थे.