आजाद भारत में राजनीति के दूसरे दशक के दस्तक की प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के पदचाप से सुनाई पड़ी. 1957 में देश ने दूसरा आम चुनाव देखा और उसमें नेहरु के कद एक हाथ और ऊंचा होता देखा. संसद में विरोधी पक्ष कमजोर था लेकिन विरोधी आवाज कमजोर नहीं नेहरु और नेहरु सरकार के खिलाफ संसद में विरोधी पक्ष या किसी सांसद ने इतनी आवाज नहीं उठाई जितनी आवाज एक सांसद ने उठाई. नेहरु सरकार इस तीखे आरोपों से आहत हुई और यह आरोप उसे बाण की तरह चुबने लगे. नेहरु सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाला उनकी अपनी ही पार्टी का सांसद था.