यूपी के कैबिनेट मंत्री आजम खान और राज्यपाल राम नाईक के बीच तकरार बढ़ती जा रही है. राज्यपाल ने आजम के मेयरों को हटाने का हक हासिल करने के सपने पर फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है. उन्होंने उत्तर प्रदेश नगर निगम (संशोधन) विधेयक 2015 को राष्ट्रपति के पास भेज दिया है. ऐसे में अब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ये फैसला करेंगे कि यूपी में मेयरों के अधिकारों में कटौती होगी या नहीं.
क्या है विधेयक में
राष्ट्रपति को राजभवन की ओर से 'उत्तर प्रदेश नगर निगम (संशोधन) विधेयक, 2015' और 'उत्तर प्रदेश नगरपालिका विधि (संशोधन) विधेयक, 2015' भेज गए हैं. राजभवन के मुताबिक, इसकी कुछ धाराएं लोकतंत्र के खिलाफ हैं. प्रस्तावित विधेयक के तहत निगम अधिनियम, 1959 में नई धारा 16-ए जोड़ी गई है, इसके जरिये सरकार नगर निगमों के मेयर और नगर पालिका चेयरमैन के खिलाफ शिकायत पर कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती है. जवाब से संतुष्ट नहीं होने पर सरकार मेयर और चेयरमैन के सभी प्रशासनिक और आर्थिक अधिकारों को रोक सकती है.
ऐसे शुरू हुआ विवाद
दरअसल, यह पूरा विवाद विधानसभा में आजम खान के राज्यपाल पर दिए गए बयान से शुरू हुआ. विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री आजम खान की कथित टिप्पणी पर राज्यपाल राम नाईक की तल्खी ने समाजवादी पार्टी और राजभवन में तकरार बढ़ा दी. विवाद की शुरुआत 8 मार्च को तब हुई, जब नगर विकास मंत्री आजम खान ने कहा कि सदन में पारित किए जाने के बाद भी राज्यपाल नगर निगम संशोधन विधेयक को मंजूरी नहीं दे रहे हैं. राज्यपाल ने जिस तरीके से साल भर से इस विधेयक को रोक रखा है, उससे ऐसा लगता है कि वे किसी दल विशेष के प्रभाव में काम कर रहे हैं.
आजम को लेकर अखिलेश करें विचार
इसके बाद सदन में अपने बारे में आजम के कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी को गंभीरता से लेते हुए नाईक ने विधानसभा अध्यक्ष से इस बारे में अनएडिटेड सीडी और रिकॉर्डिंग की कॉपी मुहैया कराने को कहा था, जो उन्हें 15 मार्च को उपलब्ध कराई गई थी. सीडी देखने के बाद गवर्नर ने विधानसभा अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर कहा कि मंत्री की भाषा विधानसभा की गरिमा, मर्यादा और परंपरा के मुताबिक नहीं है. सदन में संसदीय कार्य मंत्री का भाषण संसदीय कार्य मंत्री के रूप में उनकी योग्यता पर सवालिया निशान लगाता है. मुख्यमंत्री को इस बारे में विचार करना चाहिए.
राष्ट्रपति देंगे सलाह
विधेयक पर राज्यपाल ने जो सवाल खड़े किए हैं, उनपर राष्ट्रपति विचार करेंगे. इसके आधार पर वहब विधेयक के प्रावधानों के संदर्भ में राज्यपाल को सुझाव भी देंगे.सबसे अहम बात ये है कि जिस तरह से राज्यपाल के विचार के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है, ठीक वैसे ही राष्ट्रपति भी विधेयक पर असीमित समय तक विचार कर सकते हैं. ऐसे में इस विधेयक का फिलहाल लटकना तय माना जा रहा है.