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पीके हिंदू विरोधी है या हम और आप...

पीके निज ब्रह्म विचार की खोज है. और इस ब्रह्म की खोज हमारे ऋषियों ने कैसे की. सबसे पहले उन्होंने इस प्रकृति के सर्जक के प्रति सवाल उपजाए. विशुद्ध उत्सुकता से उपजे सवाल. ईश्वर क्यों है, कौन है, कहां है. फिर अपने अपने तईं उसके जवाब खोजे.

मीडिया बिका हुआ है. आपमें से ज्यादातर बोलते हैं. सुनता हूं. सोचता हूं. जेब नहीं टटोलता. पता है, न अभी और न कभी बिका हूं.
मीडिया बेबस होता है. आपमें से शायद ही कोई बोलता हो. पर सच है. आज मैं सुनाता हूं. ये एक कहानी. आपकी. और मेरी भी.

बात कुछ बरस पहले की है. उमेश शुक्ल की फिल्म ओह माई गॉड रिलीज होने को थी. उन दिनों लुधियाना में संपादक था एक हिंदी अखबार का. फेसबुक पर, फोन पर, दोस्तों से सुन रहा था. फंडू फिल्म बनाई है. आडंबर के खिलाफ कुछ अच्छे सवाल रोचक ढंग से उठाए हैं. फिल्म में कमियां भी हैं. मगर देखना चाहिए. इंतजार करने लगा. मगर फिल्म लुधियाना समेत पंजाब के कई हिस्सों में रिलीज नहीं हुई. क्यों. क्योंकि कुछ मुट्ठी भर लोगों को लगा, कि उनका ईश्वर खतरे में है. हिंदू धर्म खतरे में है. और ये रणबांकुरे बुलंद आवाज में आक्रोश से भरे नारे लगाते भगवा झंडा उठाए चौराहों पर जुटने लगे. धमकी देने लगे कि फिल्म उनकी लाश पर रिलीज होगी. ये होगा. वो होगा. प्रशासन झुक गया. सिनेमाघर वाले रिरियाने लगे. फिल्म का एक शो रखा गया. हिंदुओं के हितों के तमाम रखवाले कुछ दर्जन की तादाद में पहुंचे. साथ में पुलिस प्रशासन. फिल्म खत्म हुई. भावुक आतुर हिंदू नेता बोले. ये 98 चीजें आपत्तिजनक हैं. इन्हें हटाइए और फिल्म दिखाइए. सिनेमाघरों ने हाथ खड़े कर दिए. प्रशासन ने चुप्पी साध ली और फिल्म रिलीज नहीं हुई. किसी के लिए सेंसर बोर्ड के अनापत्ति प्रमाणपत्र का कोई मतलब नहीं था. और शहर के बुद्धिजीवी, शहर की मीडिया. वे बस मामले की फ्लैट रिपोर्टिंग तक सीमित रहे. रिपोर्टर न्यूज रूम में दुनियादारी समझाते दिखे. साहब, इन लोगों की दुकान इसी से चलती है. जब प्रशासन और सिनेमाघर ही स्टैंड नहीं ले रहे, तो हम क्यों पचड़े में पड़ें. कुछ हफ्तों बाद फिल्म डीवीडी के जरिए देखी. और लगा. कैसा तमाचा मारती है ये फर्जी लोगों की धार्मिकता पर. पर किसी ने अंधेरा ही चुना हो, तो कोई शमा क्यों जलाए.

एक बार फिर कुछ लोग ईश्वर को, धर्म को एक फिल्म के हमले से बचाने के लिए निकल पड़े हैं. उन्होंने फिर फतवे देने शुरू कर दिए हैं. शुक्रवार की सुबह पहले शो में जब रिव्यू लिखने के लिए पीके फिल्म देखी, तभी अंदेशा हो गया था. आइए देखें इस जमात के तर्क क्या हैं.

ये कहते हैं कि पीके में हिंदू देवी देवताओं का मजाक बनाया गया है. गुरुओं का मजाक बनाया गया है. हमारे ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाया गया है. शिवलिंग पर दूध चढ़ाने जैसे धार्मिक रिवाजों का मजाक बनाया गया है. हिंदुस्तान की उदारता का नाजायज फायदा उठाया गया है. और यह सब एक एलियन के मार्फत किया गया है.

क्या पीके ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाती है. हां और नहीं. पीके सबसे पहले मुदित होता है. उसे लगता है कि इस ग्रह के वासियों ने अपने बनाने वाले से कनेक्शन स्थापित कर लिया है. मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघर बनाकर. मगर जब वह इनके भीतर जाता है, तो उसे बड़े बड़े दानपात्र दिखाई देते हैं. दरियाफ्त करने पर पता चलता है कि भगवान को खुश करने के लिए इसमें पैसा डाला जाता है. पीके का सवाल है, क्या भगवान को पैसे की जरूरत है. जवाब के लिए पीके की जरूरत नहीं. भगवान तो सबको धनधान्य देता है. तो उसे पैसों की जरूरत क्यों कर होगी. तर्क दिया जा सकता है कि ये हमारा कृतज्ञता ज्ञापित करने का तरीका है. मगर सवाल उठता है कि यही तरीका क्यों. और ये कितना कारगर है. हम एक बेहतर इंसान बनकर, बेहतर नागरिक बनकर भी तो यह काम कर सकते हैं. किसी जरूरतमंद बच्ची की पढ़ाई का खर्च उठाकर, किसी बीमार को खून देकर, समय पर टैक्स चुकाकर भी तो यही काम कर सकते हैं. भला गणेश लक्ष्मी को घंटी टनटनाकर और फिर सर्विस टैक्स में खर्चा कर हम कौन से शुभ लाभ की कामना करते हैं.

पीके मंदिरों में स्थापित प्रतिमाओं के प्रति उत्सुकता जाहिर करता है. उसका सवाल एक बच्चे सा सवाल है. जायज सवाल है. वह मंदिर के बाहर हाथ में मूर्ति लेकर कहता है. ये भगवान हैं. तो अंदर क्या हैं. बताया जाता है कि वह भी भगवान हैं. इसे किसने बनाया है. दुकानदार कहता है, मैंने बनाया है. पीके पूछता है कि हमें तो भगवान ने बनाया है. फिर हम भगवान को कैसे बना सकते हैं. यहां यह अकादमिक सवाल उठ सकता है कि क्या पीके सगुण ब्रह्म की पूजा का विरोधी है. क्या वह निर्गुण ब्रह्म का उपासक है. क्या पीके मूर्ति पूजा पर सवाल उठा रहा है. मगर पीके सिर्फ यहीं तक तो महदूद नहीं रहता. वह तो अजान की ऊंची आवाज पर भी सवाल उठाता है. मोहर्रम के दौरान निकलने वाले खून के प्रति भी प्रश्नचिह्न लगाता है. आदिवासियों को इसाई बनाए जाने पर भी उंगली उठाता है. और अगर कह सकूं तो कहूं कि पीके हर धर्म के उन तमाम तौर तरीकों पर सवाल उठाता है. जिनकी बुनियाद में लोभ, डर या फिर आस्था के नाम पर हर चीज को सिर झुकाकर मान लेने का आदेश है. पीके उस प्रश्नाकुलता का नतीजा है, जिसके जरिए इस पूरी सभ्यता का विकास हुआ है. अगर न्यूटन यह मान लेता कि सेब ईश्वर ने बनाया है और उसकी मर्जी है कि यह नीचे गिरे, तो गुरुत्वाकर्षण का पता चलता. और पीछे लौटते हैं. यदि हमारे पुरखे मान लेते कि आग ईश्वर ने बनाई है और इंसान का इस पर कोई वश नहीं तो क्या होता. क्या चक्का बनता. क्या औजार बनते. घर बनते. अन्नागार बनते. परिवार बनते, समाज बनते. तो यह सवाल ही हैं जो हमें बनाते हैं. सवाल ही हैं, जिन्होंने धर्म बनाया. मगर फिर हमने धर्म को सवालों से मुक्त क्यों कर दिया. सीने पर हाथ रखकर ईमानदारी से बताइए, जरूरत और डर. इन दो चीजों को छोड़कर कितने लोग ईश्वर की आराधना करते हैं. हे भगवान, हमें ये दे दो. हे भगवान हमें इससे बचा लो. यही दो देक हैं हर धर्म की. ज्यादातर धर्मगुरु हमारे और ईश्वर के बीच बिचौलिए बन गए हैं. अपनी सुविधा और सहूलियत के हिसाब से वे कभी रिवाजों तो कभी धर्मगुरुओं का हवाला देकर अपने मनमुताबिक हमारा मन तय करते हैं.

पीके निज ब्रह्म विचार की खोज है. और इस ब्रह्म की खोज हमारे ऋषियों ने कैसे की. सबसे पहले उन्होंने इस प्रकृति के सर्जक के प्रति सवाल उपजाए. विशुद्ध उत्सुकता से उपजे सवाल. ईश्वर क्यों है, कौन है, कहां है. फिर अपने अपने तईं उसके जवाब खोजे. ऋग्वेद में प्रकृति के तमाम कारकों को उपास्य माना गया. सूर्य, बादल, आग. फिर इस कतार में और भी देवता जुड़ते गए. सगुण और निर्गुण के बीच डोलते. मगर हिंदुस्तान में उपजे तमाम धर्मों ने एक सीख बार बार दोहराई. उदार बनो. समन्वयवादी बनो. और यही वजह है कि हम फख्र से अल्लामा इकबाल का लिखा गीत गाते हैं. यूनान मिस्र रोमां सब मिट गए जहां से. कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. हमारी ये हस्ती आलोचना के स्वीकार से बनी है. इसीलिए समय समय पर तमाम लोगों ने धर्म की आडंबर से प्रदूषित धारा को शुद्ध करने के लिए ज्ञान गंगा बहाई. क्या हमने बुद्ध को, महावीर स्वामी को, कबीर को, गुरु नानक देव को धर्मविरोधी घोषित कर दिया. नहीं, हमने अपने अपनाया, उनकी कही को समझने की समझ दिखाई. और इस तरह यकीन के प्रवाह को निरंतर रखा.

पीके की आलोचना तमाम बिंदुओं पर की जा सकती है. विशुद्ध सिनेमाई दृष्टिकोण से बात करें तो सबसे पहले यह ओह माई गॉड के प्लॉट का एक विस्तार लगता है. कई समीक्षक दूसरे हाफ में पीके की धर्मगुरु से मुठभेड़ के तौर तरीकों पर सवाल उठाते हैं. दूसरे हाफ की कमजोरी पर बात करते हैं. यह सब समझ आता है. मगर पहले हैदर को राष्ट्रविरोधी घोषित करना और फिर पीके को हिंदू विरोधी घोषित करना समाज के तालिबानीकरण की तरफ बढ़ाया गया कदम है. और ये कितना खतरनाक हो सकता है, इसके लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं. बस एक पल को आंखें मूंदिए और पेशावर के स्कूल में बिखरे बस्तों, किताबों और टिफिन बॉक्स को याद करिए. कफन में लेटे मासूमों को याद करिए. वे किसी ईश्वर को बचाने के लिए खुंखार हुए किन्ही भक्तों के शिकार हैं. पीके पूछता है. हमारी आंखों में आंखें डालकर. क्या ईश्वर इतना कमजोर है कि चंद लोग तलवारें निकालकर, बम फोड़कर उसे बचाने निकलेंगे और वह बच जाएगा.

पीके पर सवाल उठ रहा है कि यह सिर्फ हिंदू धर्म पर ही निशाना क्यों साधता है. क्या वाकई. पीके ईश्वर तक अपनी बात पहुंचाने के लिए हर तरीका अपनाता है. मजार में चादर चढ़ाता है. गिरिजाघर जाता है. मगर ज्यादातर उसकी तकरार एक हिंदू धर्मगुरु से होती है. मेरा जवाब है. पीके हर धर्म के अपनाए गए तौर तरीकों पर सवाल उठाता है. कुछ पर कम, कुछ पर ज्यादा. जब हम यह जानते और मानते हैं कि इस देश का बहुसंख्यक हिंदू है. तो जाहिर कि पीके का सामना भी उनके ही तौर तरीकों से ज्यादा होगा. और इस क्रम में जो सवाल उपजेंगे, उनके जवाब भी इसी परिधि के इर्द गिर्द खोजे जाएंगे.

और कहने को तो ईसाई भी कह सकते हैं कि पीके चर्च में जाकर हिंदुओं की तरह ईसा मसीह के सामने नारियल क्यों फोड़ता है. मजार में वाइन की बोतल लेकर क्यों जाता है. तसल्ली रखिए. वहां भी आपकी तरह सतर्क लोग हैं. इसलिए उसे इन जगहों से भी खदेड़ दिया जाता है.

तर्कवादी भी वैसे पीके की आलोचना कर रहे हैं. उनका कहना है कि पीके आखिर में यह क्यों कहता है कि दो ईश्वर हैं. एक हमारा. लोगों का. जो ईश्वर से प्यार करते हैं. उसके प्रति कृतज्ञ हैं. उसकी बनाई दुनिया से प्यार करते हैं. और इसमें रहने के दौरान अपने कर्तव्यों का अच्छे से पालन करते हैं. दूसरा ईश्वर आडंबरप्रिय लोगों को बनाया हुआ. जिसमें तौर तरीके हैं. दूसरों के प्रति विद्वेष है. हिंसा है. डर है. लूट है. ईश्वर जैसी किसी संस्था या भाव में यकीन न रखने वाले कहते हैं कि पीके अंततः एक धार्मिक विचार को पोसने वाली फिल्म है. क्योंकि यह बुरे ईश्वर को हटाकर अच्छे ईश्वर की वकालत भर करती है सारे टंटे खड़े करने के बाद.

तो शिकायतें सबकी हैं. मगर ये शिकायतें वैचारिक विमर्श के दायरे में होनी चाहिए. इस तरह के फतवे कि बायकॉट पीके या पीके हिंदू विरोधी है, संकरी सोच का नतीजा हैं. और मेरा यकीन है कि यह महादेश संकरा नहीं है. यह पर्वत की तरह स्वाभिमानी, समुद्र की तरह तरल और सबको समाहित करने वाला और आसमान की तरह खुली और अपरिमित संभावना लिए है. पीके जैसी फिल्मों का और इसके सुझाए विचार प्रस्थान बिंदुओं का स्वागत किया जाना चाहिए. अपने धार्मिक तौर तरीकों की, यकीन की पड़ताल करते रहना चाहिए. उन्हें निथारते रहना चाहिए. जैसा कि कबीर बाबा कह गए हैं, निंदक नियरे राखिए...

और अब स्वागत है आपके कमेंट्स का. गर आप आमिर खान के धर्म इस्लाम को गालियां दें, तो फिल्म के डायरेक्टर राजकुमार हिरानी और राइटर अभिजात जोशी के धर्म को भी याद कर लीजिएगा. मुझे गालियों से नवाजें, मेरी मां-बहन से रिश्ता जोड़ें, उससे पहले अपनी मां की ममतामयी छवि और  सीखों को याद कर लीजिएगा, क्योंकि वह भी मेरी मां है. हिंदू धर्म के खतरे पर गला फाड़ने से पहले अपने पापों को याद कर लीजिएगा. और हां, सोचिएगा जरूर. क्योंकि सवाल अब भी बना हुआ है...और जवाब हमें आपको देना है.

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