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सवालों के घेरे में मोदी की कृषि नीति, किसान कर रहे खुदकुशी

आपने गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात के विकास के बड़े-बड़े दावे करते हुए सुना होगा. लेकिन गुजरात का एक ऐसा चेहरा भी है जो मोदी के दावों को खोखला साबित करता है. शायद उस गुजरात को मोदी नहीं जानते या जानबूझकर उस तरफ देखना ही नहीं चाहते.

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आपने गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात के विकास के बड़े-बड़े दावे करते हुए सुना होगा. लेकिन गुजरात का एक ऐसा चेहरा भी है जो मोदी के दावों को खोखला साबित करता है. शायद उस गुजरात को मोदी नहीं जानते या जानबूझकर उस तरफ देखना ही नहीं चाहते.

मोदी के अनुसार गुजरात का विकास मॉडल देश में भी लागू होना चाहिए. अगर गुजरात में विकास की बयार बह रही है, तो फिर क्यों सुसाइड कर रहे हैं गुजरात के किसान? अक्‍सर मोदी गुजरात के गर्व के दावे ठोकते हैं, फिर 4 सालों में 112 किसानों ने क्यों की आत्महत्या? मोदी खुद को विकास पुरुष कहते हैं, फिर उन्‍हें क्यों नहीं दिखती अपने ही राज्‍य के किसानों की मजबूरी?

आपने गुजरात में विकास के बड़े-बड़े दावे सुने होंगे. गुजरात में किसानों की खुशहाली की बड़ी-बड़ी बातें भी मोदी करते हैं. मोदी को कहते सुना होगा कि गुजरात चमक रहा है, लेकिन उस चमक का एक हिस्सा ऐसा स्याह है जिसके बारे में सुनकर आप भी चौंक जाएंगे. सूखे और कर्ज के मारे गुजरात के किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं. लेकिन लगता है मोदी को इसकी कोई परवाह नहीं.

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एक किसान की दुख भरी दास्‍तां पढ़ि‍ए, लेकिन कई अन्‍य किसानों के हालात इससे जुदा नहीं हैं. ‘बारिश ना होने की वजह से मेरी फसल बर्बाद हो गई है. बैंक और दूसरे कर्ज भी बढ़ गये थे. हमें सरकार की ओर से किसी भी तरह की कोई मदद नहीं मिली है. मेरे परिवार में 8 लोग हैं, उनका गुजारा भी अब मैं नहीं चला सकता. बैंक वाले मुझपर कर्ज चुकता करने का दबाव बना रहे हैं. 2005 में हमने जो फसल सुरक्षा बीमा लिया था उसका पैसा सरकार ने आजतक हमें नहीं दिया है. बावजूद इसके किसानों से लगातार बीमा के पैसे लिए जाते हैं.’

खुद को गुजरात के विकास के विधाता की तरह पेश करने वाले नरेंद्र मोदी के नाम ये वो चिट्ठी है जिसमें उनकी बादशाहत से निराशा के अलावा कुछ नहीं है. जामनगर के अनिरुद्ध सिंह जाडेजा ने इस चिट्ठी से चमत्कार की उम्मीद बांधी थी, लेकिन उन नाउम्मीदियों में मौत की प्रस्तावना थी. जाडेजा ने जान दे दी.

चमचमाते गुजरात के कर्जदार किसान के जान देने की ये खबर सात महीने पुरानी है. इस बीच जामनगर में द्वारका के एसडीएम ने पुलिस को आदेश भी दिया कि वो अनिरुद्ध सिंह की चिट्ठी को डाइंग डिक्लेरेशन के तौर पर दर्ज करे और आगे की कार्रवाई करें. लेकिन सात महीनों से अनिरुद्ध सिंह जडेजा का परिवार इंतजार ही कर रहा है. न फसल सुरक्षा बीमा का पैसा मिला और ना ही आत्महत्या का घोषित मुआवजा मिला.

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कितनी अजीब बात है कि एक तरफ किसान आत्महत्या कर रहे हैं, तो दूसरी ओर नरेंद्र मोदी किसानों से हमदर्दी के नारे हवा में उछाल रहे हैं. किसानों के लिए मोदी मेला लगाते हैं और दावे करते हैं कि उनकी सरकार कुर्सी के लिए नहीं बल्कि कृषि के लिए है.

नरेंद्र मोदी के इन दावों के साथ अनिरुद्ध सिंह की आत्महत्या की मजबूरी को मिलाकर देखिए तो एक अलग किस्म का ग़ुजरात नजर आता है. लाचार गुजरात, तरसता और तड़पता गुजरात. क्या नरेंद्र मोदी ने अपने इस गुजरात को कभी वाकई नहीं देखा? आत्महत्या से पहले लिखी गई अनिरुद्ध सिंह की चिट्ठी पूछ रही है, नहीं देखा तो क्यों नहीं देखा?

पिछले चार साल में गुजरात के 112 किसानों ने आतमहत्या कर ली. सबसे ज्यादा प्रभावित सौराष्ट्र और कच्छ इलाका है. लेकिन मोदी दावा करते हैं कि गुजरात में कृषि विकास दर दो अकों में है. अब मोदी के इस दावे पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

नरेंद्र मोदी इन दिनों गुजरात में कृषि मेला लगाकर किसानों की खुशहाली की खूब बातें कर रहे हैं. दुनिया को आधुनिक और ऑर्गेनिक कृषि का पाठ पढ़ाते हैं नरेंद्र मोदी. और गुजरात में कृषि विकास दर के दो अंकों में होने के दावे भी करते हैं नरेंद्र मोदी. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. वो पहलू जिसे या तो मोदी जानते नहीं या फिर जानबूझकर देखना नहीं चाहते.

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आरटीआई की मदद से मिले आंकड़ों के मुताबिक 1 जनवरी 2008 से लेकर 19 अगस्त 2012 तक गुजरात के 112 किसानों ने आत्महत्या की है. आपको जानकार हैरानी होगी कि सिर्फ 2012 में ही 65 किसानों ने सुसाइड किया है. सूखे के चलते जून 2012 से लेकर अक्टूबर 2012 तक यानी पांच महीनों में 42 किसानों ने आत्महत्या की. जानकार मानते हैं कि किसानों की खुदकुशी के लिए सिर्फ और सिर्फ मोदी की नीतियां जिम्मेदार हैं.

अहमदाबाद के सामाजिक कार्यकर्ता भरतसिंह झाला कहते हैं, मैं मानता हूं कि सरकार की जो नीति है उसकी वजह से किसानों को आत्महत्या करनी पड़ रही है, सरकार ने पिछले साल गुजरात में सूखा पड़ने बावजूद अब तक एक भी किसान को फसल सुरक्षा बीमा नहीं दिया है. भले ही गुजरात के चमकने की बातें की जा रही हैं, कृषि विकास दर के दो अंकों में होने के दावे किए जा रहे हैं लेकिन जानकार मानते हैं कि सब आंकड़ों का खेल है.

सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि अचानक 1.72% से 10.59 % कैसे हो गई कृषि विकास दर? विकास दर की गणना के लिए 1998-99 की जगह 2000-2001 क्यों किया गया बेस इयर?

सवाल इसलिए लाजिमी है क्योंकि मोदी जिनके बारे में बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, उन किसानों को लग रहा है कि सरकार ना तो उनके लिए कुछ कर रही है और ना ही उनकी बातें सुन रही है. अब सवाल ये कि बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, दुनिया को गुजरात की चमक-दमक दिखाने वाले मोदी को गुजरात का ये चेहरा क्यों नहीं दिखता.

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