बच्चों की देखभाल कोई हंसी-खेल नहीं, यह सिर्फ एक मुहावरा नहीं है. बच्चों की देखभाल का काम भले ही स्कूल की शिक्षिका को करना हो या अस्पताल के चिकित्सक को, विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की सही देखभाल ‘बच्चों का खेल’ नहीं है और यह पूरी तन्मयता और ध्यान से किया जाने वाला काम है.
रोहिणी के एक स्कूल में बच्चों की एक शिक्षिका अन्वेषा कौशिक ने बताया कि स्कूल के बच्चों की उचित देखभाल अपने बच्चों की देखभाल से भी कठिन काम है. अन्वेषा ने कहा ‘स्कूल में बच्चों की देखभाल का काम खुद के बच्चों की देखभाल से भी कठिन काम है. अपनी परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, स्कूल में बच्चों पर पूरा ध्यान देना जरूरी होता है.’
अन्वेषा ने कहा ‘स्कूल में हर तरह के बच्चे आते हैं. कई बार अलग-अलग परिवेश के बच्चे एक साथ होते हैं. ऐसे में बच्चों को गलत आदतों से दूर रखते हुए सही शिक्षा देना बहुत कठिन है. बच्चों में किसी भी गलत आदत के लिए उनके स्कूल को आसानी से दोषी ठहरा दिया जाता है, लेकिन उन्हें गलतियों से दूर रखना हमारे लिए किसी चुनौती से कम नहीं है.’
इस बात के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं कि चाइल्ड केयर प्रोफेशनल्स डे की शुरूआत कब से हुई, लेकिन कई दस्तावेजों के मुताबिक अमेरिका में बच्चों की देखभाल करने वाले पेशेवरों की काम की महत्ता को प्रमाणित करने के लिए हर वर्ष 27 अप्रैल को यह दिवस मनाया जाता है.{mospagebreak}बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अंकिता घाटगे बेजुबान बच्चों की देखभाल को सबसे कठिन काम मानती हैं. डॉ. अंकिता ने कहा ‘तीन-चार साल के बच्चों की देखभाल तो फिर भी आसान है, लेकिन सबसे ज्यादा कठिनाई शिशुओं की देखभाल में आती है. ऐसे बच्चे बोल भी नहीं पाते, जिससे उनकी परेशानी किसी को पता भी नहीं चल पाती.’
डॉ. अंकिता ने कहा ‘मां के लिए शिशु की देखभाल फिर भी आसान काम है, लेकिन हम लोगों के लिए नहीं. बीमार बच्चे अक्सर चिड़चिड़े हो जाते हैं और चिकित्सक के पास जाने में भी रोते हैं, ऐसे में उनकी परेशानी का आकलन कोई हंसी-खेल नहीं है.’ दूसरी ओर क्रेच संचालक सुहासिनी जोशी इस बात को स्वीकार करती हैं कि बच्चों की देखभाल करने वाले पेशेवरों को मां-बाप से भी ज्यादा धैर्य वाला और शांत होना पड़ता है.
सुहासिनी ने कहा ‘मां-बाप को एक बच्चे की देखभाल करनी होती है, लेकिन उन्हें इस काम में भी पसीने आ जाते हैं. हम जैसे लोग एक साथ इतने सारे बच्चों की देखभाल करते हैं, तो हमारे काम की कठिनाई का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.’ उन्होंने कहा ‘मेरा मानना है कि बच्चों की देखभाल में बहुत ज्यादा धर्य, संवेदनशीलता और शांति की जरूरत है. कई बार बच्चे अपने प्रश्नों से खीझ पैदा करते हैं, लेकिन ऐसे में भी भीतर से शांत होना जरूरी होता है.’