लगातार रेल हादसों से दुखी होकर रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने अपने इस्तीफे की पेशकश की. पीएम मोदी उनका इस्तीफा मंजूर भी कर सकते हैं. लेकिन पिछले तीन सालों से रेलवे के लिए अपना खून-पसीना (खुद ट्वीट में किया जिक्र) एक करने वाले प्रभु को आखिर इस्तीफे क्यों देना पड़ रहा है, आखिर क्यों वे रेल हादसों को रोकने में नाकाम रहे. ये अभी भी एक बड़ा सवाल है.
सुरेश प्रभु ने अपने पिछले रेल बजट में मिशन जीरो एक्सीडेंट लॉन्च किया था. इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा कोष का गठन किया गया, जिसमें 1 लाख करोड़ रुपए से अगले 5 सालों में एक्सीडेंट को कम करने की कोशिश की जानी थी. एक सीनियर रेलवे अधिकारी ने कहा कि मंत्रालय अभी तक ऐसा सिस्टम लाने में असमर्थ रहा है, जिससे एक्सीडेंट रुक सके और ट्रेन पटरियों से ना उतरे.
इसके लिए रेलवे कई सिस्टम पर काम कर रहा है, लेकिन उनमें से एक भी सिस्टम कामयाब नहीं रहा है. रेलवे के इंजीनियर इसको लेकर लगातार काम भी कर रहे हैं, लेकिन इस काम की कोई तयसीमा नहीं है. अधिकारी के अनुसार, अगर हम अभी भी इन सिस्टमों पर काम करते हैं, तो इसमें काफी लंबा समय लगेगा.
नहीं है पैसा?
रेलवे यह खुद यह मान चुका है कि उसके मौजूदा दौर में जो रेलवे के कोच काम कर रहे हैं, उनमें से 90 प्रतिशत कोच असुरक्षित हैं. अगर हम इन कोचों को बदलना भी चाहे तो इसके लिए रेलवे को एक बड़ा निवेश चाहिए. जो कि पुराने कोचों को नई तकनीक से डेवलेप कर सकें.
इन दो हादसों की वजह से बना इस्तीफे का दबाव
23 अगस्त 2017
उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में बुधवार देर रात कैफियत एक्सप्रेस के 10 डिब्बे पटरी से उतर गए. आजमगढ़ से दिल्ली आ रही इस ट्रेन के हादसे के शिकार होने के कारण कम से कम 74 लोग घायल हो गए. यूपी में पिछले पांच दिनों के अंदर यह दूसरी बड़ी ट्रेन दुर्घटना है.
19 अगस्त 2017
उत्कल एक्सप्रेस मुजफ्फरनगर के खतौली के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, जिसमें 24 लोगों की मौत हो गई जबकि तकरीबन 150 लोग जख्मी हो गए. इस हादसे में रेल अधिकारियों की बड़ी लापरवाही सामने आई थी. रेलमंत्री ने इस मामले में रेलवे के कई वरिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई की.