सुप्रीम कोर्ट किशोर न्याय अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर विचार करेगा. अधिनियम के तहत 18 वर्ष की उम्र प्राप्त होने से पहले लड़के या लड़की को नाबालिग माना गया है.
अधिनियम में 'किशोर' की परिभाषा की संवैधानिक वैधता पर विचार की मंजूरी देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्र की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. अदालत में नाबालिग की वैधानिक रूप से परिभाषित उम्र सीमा 18 से घटा कर 16 वर्ष किए जाने की मांग को लेकर अर्जी दायर की गई है.
वकील सुकुमार एवं कमल कुमार पांडेय द्वारा दायर अर्जी में सर्वोच्च न्यायलय से किशोर न्याय अधिनियम 2000 के कुछ प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 (समानता एवं स्वतंत्रता) के तहत दिए गए बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन घोषित करने की मांग की गई है.
अर्जी में उठाए गए मुद्दे को दिल्ली में चलती बस में 16 दिसंबर 20012 को एक युवती के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म में शामिल नाबालिग को देखते हुए महत्वूपर्ण माना जा रहा है.
मामले पर सुनवाई की सुनवाई शुरू करते हुए अदालत ने महान्यायवादी जी.ई. वाहनवती से पूछा कि क्या किसी हमलावर के अपराध की गंभीरता का किशोर न्याय अधिनियम के साथ कोई बंधन है और अधिनियम के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के प्रतिकूल तो नहीं हैं.