पोखरण में हुए दूसरे परमाणु परीक्षण की प्रभाव क्षमता पर सवाल खड़ा करने वाले रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के पूर्व वैज्ञानिक के. संथानम ने यह कहते हुए 1998 के परमाणु परीक्षणों की सफलता के निर्धारण के लिए जांच की हिमायत की है कि परमाणु शक्ति का सृजन मिथकों के आधार पर नहीं किया जा सकता.
पोखरण-2 परीक्षणों से अपेक्षित नतीजा नहीं मिलने के दावे से विवाद को जन्म देने वाले संथानम ने कहा, ‘‘मैं समझता हूं कि यह विज्ञान की एक आदर्श प्रक्रिया है और अगर दावे किये जाते हैं तो आम तौर पर सम्बन्धित तथ्यों की पड़ताल के लिये वैज्ञानिकों का कोई निष्पक्ष समूह बनाया जाता है.’’ तब क्या इस तरह की कोई जांच एक परमाणु शक्ति के रूप में देश की छवि को प्रभावित नहीं करेगी. इसपर उनका कहना था कि हमें ‘‘छवियों और छवि निर्माण’’ से प्रभावित नहीं होना चाहिए. छवि को अवश्य ही ठोस तथ्यों पर आधारित होना चाहिए और वैज्ञानिकों के योग्य दल से उसे मंजूरी मिलनी चाहिए. संथानम ने कहा, ‘‘इसलिए मिथक के सृजन से अवश्य ही परहेज किया जाना चाहिए.’’