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Opinion: हिंदी-चीनी भाई-भाई, पार्ट-2

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अहमदाबाद पहुंच गए और पीएम मोदी ने बहुत ही गर्मजोशी से उनका स्वागत किया उनके सम्मान में साबरमती आश्रम के निकट प्रीति भोज का भी आयोजन है. चीन के राष्ट्रपति से भारत को बहुत उम्मीदें हैं. दोनों देशों के रिश्तों में पहले से कहीं ज्यादा ऊर्जा की उम्मीद है बल्कि नए द्वार भी खुलने के कयास लगाए जा रहे हैं.

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अहमदाबाद पहुंच गए और पीएम मोदी ने बहुत ही गर्मजोशी से उनका स्वागत किया उनके सम्मान में साबरमती आश्रम के निकट प्रीति भोज का भी आयोजन है. चीन के राष्ट्रपति से भारत को बहुत उम्मीदें हैं. दोनों देशों के रिश्तों में पहले से कहीं ज्यादा ऊर्जा की उम्मीद है बल्कि नए द्वार भी खुलने के कयास लगाए जा रहे हैं.

चीन एशिया की सबसे बड़ी शक्ति है और भारत से उसके हजारों साल के रिश्ते रहे हैं. हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार काफी बढ़ा है लेकिन इससे चीन को कई गुना ज्यादा फायदा हुआ है. अब भारत-चीन व्यापार बढ़कर 85 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है. अब चीन के प्रधान मंत्री भारत में सीधे 100 अरब डॉलर का निवेश करके एक नया अध्याय शुरू करना चाहते हैं. चीन भारत को अपने बने-बनाए सामाने बेचने के अलावा अब यहां की बड़ी-बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में पैसे लगाना चाहता है. वह भारत के इंडस्ट्रियल पार्कों में सात अरब डॉलर की राशि लगाना चाहता है. यहां की रेल परियोजनाओं में वह 50 अरब डॉलर से भी अधिक धन लगाकर उन्हें वर्ल्ड क्लास बना देने की इच्छा रखता है. वह यहां की सड़कों, बंदरगाहों और नदियों में बहुत भारी रकम लगाना चाहता है.

चीन ने पहले ही जता दिया है कि भारत की बुलेट ट्रेन परियोजना में उसकी बहुत ज्यादा रुचि है और वह दो रूटों पर बुलेट ट्रेन परियोजना में भागीदारी का इच्छुक है. इतना ही नहीं वह दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ाने के लिए कुछ भी कदम उठाने को तैयार है. नरेन्द्र मोदी के चीन से पुराने रिश्ते रहे हैं और वह चीन को अच्छी तरह समझते हैं इसलिए उनके लिए बातचीत को तार्कित परिणति तक ले जाने में कोई परेशानी नहीं होगी. चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है. वह उन चुनींदा देशों में है जिनका निर्यात आयात से कहीं ज्यादा है. इसलिए यहां बड़े पैमाने पर निवेश करना उसके लिए मुश्किल नहीं है. साम्यवाद से पूंजीवाद तक का जो सफर चीन ने तय किया है वह काबिले तारीफ है. उसने दुनिया के ज्यादातर देशों को धन, प्रगति और टेक्नोलॉजी में कहीं पीछे छोड़ दिया है.

आज दुनिया उसकी सैनिक ताकत से कहीं ज्यादा उसकी मौद्रिक ताकत की ओर देख रही है. भारत के संदर्भ में चीन ने एक बात मानी है कि चीन की निर्माण क्षमता और भारत का सॉफ्टवेयर तथा वैज्ञानिक कौशल, दोनों मिलकर बड़ा कंज्यूमर मार्केट खड़ा कर सकते हैं. शी का कहना है कि दोनों देश मिलकर अपार विकास कर सकते हैं. ज़ाहिर वह भारत की इस यात्रा को गंभीरता से ले रहे हैं. वह जानते हैं कि बदले हुए हालात में भारत उनके लिए एक बढ़िया भागीदार साबित हो सकता है. भारत के लिए यह अच्छा मौका है कि वह चीन को यहां बड़े पैमाने पर निवेश करने दे. पीएम मोदी इस तथ्य से अवगत हैं और इसलिए उन्होंने कई कदम उठाए हैं.

लेकिन जो लोग चीन को जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि भारत-चीन के संबंध हालांकि ऐतिहासिक हैं लेकिन दोनों में सीमा का विवाद बहुत पुराना और गहरा है जिसे लेकर दोनों एक बड़ी लड़ाई लड़ चुके हैं. चीन भारत के पूर्वोत्तर के कई भागों को अपना बताता है, खास तक अरुणाचल प्रदेश को. इस मुद्दे पर दोनों में काफी कटुता रही है और चीन वहां के लोगों को अपने यहां आने पर अलग कागज पर वीजा देता है जिसे नत्थी वीजा कहते हैं. मतलब यह है कि दोनों के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए बड़े कदम उठाने का भी यह बेहतरीन अवसर है, हालांकि चीन के रुख में अभी कोई बदलाव नहीं दिखता. लेकिन अगर दोनों में व्यापारिक संधियां बड़े पैमाने पर हुईं तो वह समय दूर नहीं कि सीमा विवाद में कमी आएगी और कोई रास्ता निकलेगा क्योंकि चीन चतुर कारोबारी भी है. वह जानता है कि बहुत बड़े मुनाफे के लिए छोटी-मोटी बातों से किनारा किया जा सकता है. तीन दिनों के बाद पता चलेगा कि शी जिनपिंग दरअसल भारत के लिए क्या लेकर आए हैं.

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