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MCI की जगह लेगा नेशनल मेडिकल कमीशन, डॉक्टर क्यों हैं इस बिल के खिलाफ

सवाल उठता है कि जब देश में पहले से ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया थी तो नेशनल मेडिकल कमीशन की जरूरत क्यों महसूस की गई. नीति आयोग को ऐतराज था कि एमसीआई में डॉक्टरों की लॉबी सक्रिय रहती है, ऐसे में यह अपने मूल मकसद से भटक जाती है.

NMC बिल के विरोध में डॉक्टर (फोटो IANS) NMC बिल के विरोध में डॉक्टर (फोटो IANS)

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) बिल को मोदी सरकार राज्यसभा में भी पास कराने में कामयाब रही. वहीं इस बिल के खिलाफ देशभर में डॉक्टर सड़कों पर उतर आए और गुरुवार को अधिकांश डॉक्टर हड़ताल पर रहे.

अब सवाल यह उठता है कि जब देश में पहले एमसीआई थी तो एनएमसी की जरूरत क्यों महसूस की गई. नीति आयोग को ऐतराज था कि एमसीआई में डॉक्टरों की लॉबी सक्रिय रहती है, ऐसे में यह अपने मूल मकसद से भटक जाती है.

विरोध के बावजूद सरकार गुरुवार को राज्यसभा में यह बिल पास कराने में कामयाब हो गई जबकि 29 जुलाई को लोकसभा में यह बिल पास हो गया था. बिल पास होने के बाद अगले 3 सालों में नेशनल मेडिकल कमीशन का गठन किया जाएगा.

केंद्र की मोदी सरकार ने एमसीआई की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन बिल के जरिए कौन से नए प्रावधान जोड़ दिए जिस कारण आखिर इतना विरोध किया जा रहा है.

नेशनल मेडिकल कमीशन बिल के लिए तर्क

1. नेशनल मेडिकल कमीशन बिल तैयार करने वाले नीति आयोग को ऐतराज था कि एमसीआई में ज्यादातर डॉक्टर चुनाव चाहते हैं जिस कारण डॉक्टरों की लॉबी सक्रिय रहती है ऐसे में वे मूल मकसद पर ध्यान नहीं दे पाते.

2. एमसीआई के पास मेडिकल एजुकेशन और डॉक्टरों की प्रैक्टिस जैसे 2 बड़े काम नहीं होने चाहिए.

3. 2016 में एमसीआई पर बनी स्टैडिंग कमेटी ने कहा कि एमसीआई का सारा फोकस कॉलेजों को लाइसेंस देने पर रहता है जिससे पढ़ाई की बेहतरी प्रभावित होती है.

2017 में एमसीआई भंग

उक्त आपत्तियों के आधार पर केंद्र सरकार ने 2017 में एमसीआई को भंग कर एनएमसी के गठन की तैयारी शुरू कर दी थी. 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एमसीआई की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए निगरानी कमेटी बनाई थी. तब निगरानी कमेटी ने स्वास्थ्य मंत्रालय को बताया था कि एमसीआई सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर रहा है.

इसके बाद केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर एमसीआई की मैनेजमेंट कमेटी को भंग कर दिया तबसे मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई), बोर्ड ऑफ गवर्नेंस के जरिए संचालित होता है.

सिस्टम सुधारने की कवायद

मेडिकल क्षेत्र में सिस्टम को सुधारने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) बिल संसद में लाया गया. बिल के पास होने के बाद स्थितियां बदल जाएंगी.

अब तक एमसीआई के पास एडमिशन, मेडिकल शिक्षा, डॉक्टरों की रजिस्ट्रेशन से जुड़े काम होते थे, लेकिन अब इस बिल के पास होने के बाद यह सारा काम एनएमसी के पास चला जाएगा. इस तरह से एमसीआई की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन ले लेगा.  

नेशनल मेडिकल कमीशन का गठन होने के बाद इस कमीशन के अध्यक्ष का नाम केंद्र सरकार सुझाएगी जो 4 साल के लिए चुना जाएगा. दोबारा उसकी नियुक्ति नहीं होती थी. जबकि एमसीआई में डॉक्टर ही इसका अध्यक्ष होता था और वह कई बार अध्यक्ष बन सकता था.

प्रावधान जिसका विरोध हो रहा

1. नेशनल मेडिकल बिल के 32वें प्रावधान के तहत कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स को मरीजों को दवाइयां लिखने और इलाज का लाइसेंस मिलेगा. जबकि इस पर डॉक्टरों को आपत्ति है क्योंकि इससे मरीजों की जान खतरे में पड़ जाएगी.

2. इस बिल में एक प्रावधान यह भी है कि आयुर्वेद-होम्योपैथी डॉक्टर ब्रिज कोर्स करके एलोपैथिक इलाज कर पाएंगे. जबकि डॉक्टरों का कहना है कि इससे नीम-हकीम और झोलाछाप डॉक्टरों को बढ़ावा मिलेगा.

3. प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को 50 फीसदी सीटों की फीस तय करने का हक मिलेगा. जबकि डॉक्टरों का कहना है कि इससे प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा.

4. प्रावधान के अनुसार पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रैक्टिस शुरू करने के लिए डॉक्टरों को एक टेस्ट पास करना होगा. वहीं इसके विरोध में डॉक्टरों का कहना है कि एक बार टेस्ट में नाकाम रहने के बाद दोबारा टेस्ट देने का विकल्प नहीं है.

क्या है सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि नेशनल मेडिकल कमीशन देश में डॉक्टरों की कमी को दूर करने में सक्षम होगा.

1. सरकार का तर्क है कि इस बिल के आने से प्राइमरी हेल्थ वर्कर्स को 6 महीने का मेडिकल कोर्स करके प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिल जाएगा. जिससे वे इलाज और दवाई लिख सकेंगे. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को खासी राहत मिलेगी.

2. ब्रिज कोर्स के जरिए सीमित एलोपैथी प्रैक्टिस का अधिकार सिर्फ उन आयुष डॉक्टरों को मिलेगा जिनके पास प्रैक्टिस का लाइसेंस हो.

3. इस बिल में यह भी प्रावधान किया गया है कि बिना लाइसेंस मेडिकल प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों को एक साल की जेल और 5 लाख तक जुर्माने की व्यवस्था है.

4. प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को 50 फीसदी सीटों की फीस तय करने का हक देने से आर्थिक तंगी से बंद होने की नौबत नहीं आएगी.

5. देश में एमबीबीएस की मौजूदा 76 हजार सीटों में से 58 हजार सीटों पर फीस सरकार ही तय करेगी.

अब राज्यसभा में नेशनल मेडिकल बिल पास होने के बाद इसके कुछ ही दिन में कानून बनने का रास्ता साफ हो गया है. सरकार चाहती है कि नाराज डॉक्टर वापस आ जाएं. सरकार का कहना है कि यह उनके और नई पीढ़ी के ही हित में है. ऐसे समय में जब देश में डॉक्टरों की संख्या में भारी कमी है, सरकार इस बिल के जरिए डॉक्टरों की कमी पूरा करना चाहती है, लेकिन डॉक्टरों का विरोध-प्रदर्शन जारी है. अब देखना होगा कि नेशनल मेडिकल कमीशन के कानून बन जाने के बाद देश में मेडिकल क्षेत्र में किस तरह का बदलाव आता है.

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