काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हुए हंगामें को लेकर बनारस के कमिश्नर की अगुवाई में हुई जांच रिपोर्ट में कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी पर शक की सुई अटकी हुई है. कहा जा रहा है कि अगर घटना की रात कुलपति छात्राओं से मिलकर उनकी समस्या सुन लेते तो शायद नौबत यहां तक ना आती. सवाल ये उठता है जिस घटना में कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी की जिद के चलते इतना हंगामा हो गया कि सरकार ने आखिरकार कोई कदम क्यों नही उठाया?
कमिश्नर की जांच रिपोर्ट में भी बीएचयू प्रशासन और कुलपति को मामले मे बेहद लापरवाही करने का दोषी पाया गया है. चीफ प्रॉक्टर ओंकार नाथ सिंह मामले मे नैतिक जिम्मेदारी लेकर अपना इस्तीफा दे चुके हैं. शहर की पुलिस के दो अधिकारियो की बलि पहले ही ली जा चुकी है लेकिन त्रिपाठी पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है.
कौन है कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी?
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी मे प्रोफेसर रहे त्रिपाठी को बीएचयू का कुलपति उस वक्त बनाया गया, जब बीजेपी केंद्र में सत्ता में आई. कहा जाता है सालों से आरआरएस के सिपहसालार रहे त्रिपाठी को संगठन का वरदहस्त मिला हुआ है. इसलिए बीएचयू मे नौकरी देने मे धांधली के आरोप लगने के बाद भी उन पर कार्रवाई नहीं की गई.
इस घटना से दो महीने पहले बीएचयू के महिला महाविद्यालय में एक लडकी को समलैंगिक होने के आरोप मे कॉलेज से निकाल दिया जिसके बाद भी हंगामा हुआ फिर भी कुलपति का कुछ नही हुआ. आरोप है कि कुलपति ने बीएचयू के सुंदरलाल अस्पताल मे ऑक्सीजन सप्लाई का टेंडर नियमों की अनदेखी कर बीजेपी के एक विधायक को दे दिया, जिसके बाद लापरवाही में एक मरीज की मौत भी हो गई, लेकिन कुलपति पर आंच भी नही आई.
सुंदरलाल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक की नियुक्ति मे मनमानी की गई, उसकी शिकायत भी की गई और कोई एक्शन नहीं लिया गया. बताया जाता है कि कुलपति पर गंभीर मामलों में मुकदमे भी दर्ज है और उत्तर प्रदेश के सीतापुर मे अवैध कमाई से एक कॉलेज बनाने का भी आरोप लगा फिर भी उनपर कोई कार्रवाई नहीं की गई. बताया जाता है कि बीजेपी और संघ से नजदीकी होने की वजह से वो हर बार बच जाते हैं.