पाकिस्तान के मशहूर शायर फैज अहमद फैज की नज्म को लेकर भारत में विवाद खड़ा हो गया है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-कानपुर (आईआईटी-के) ने उनकी नज्म 'लाजिम है कि हम भी देखेंगे' को लेकर जांच कमेटी गठित कर दी है. इस विवाद के बीच गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि इस नज्म का हिंदू-मुस्लिम से कोई ताल्लुक नहीं है. इसे पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ लिखा गया था.
आईआईटी कानपुर में फैकल्टी सदस्यों और अन्य लोगों की शिकायत पर जांच समिति गठित की गई है. फैकल्टी के सदस्यों की शिकायत थी कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने यह 'हिंदू विरोधी गीत' गाया था.
आईआईटी कानपुर की ओर से कहा गया कि सारी शिकायतों की जांच की जा रही है. शिकायतों में यह भी कि वहां पर कोई नारे लगाए गए थे या नहीं. कोई भड़काऊ भाषण दिया गया या नहीं. इन सब मसलों की जांच की जा रही है. जब जांच के निष्कर्ष आ जाएंगे तो बता दिया जाएगा और दोषियों पर सख्त कार्रवाई करेंगे.
नज्म को एंटी हिंदू कहना 'बेतुका': जावेद अख्तर
गीतकार जावेद अख्तर ने फैज की नज्म पर हुए विवाद पर कहा कि यह विवाद 'बेतुका और मजाकिया' किस्म का है. उन्होंने कहा कि फैज की नज्म को एंटी हिंदू कहना 'बेतुका और मजाकिया' है और इस प्रकरण पर गंभीरता से बातचीत करना कठिन है.
जावेद अख्तर ने कहा कि आज जिस नज्म पर विवाद हो रहा है, उसे फैज ने जिया उल हक सरकार के खिलाफ लिखा था. फैज ने जिया उल हक के 'सांप्रदायिक, प्रतिगामी और कट्टरपंथी' शासन के खिलाफ 'हम देखेंगे' लिखी थी.#WATCH Javed Akhtar:Calling Faiz Ahmed Faiz 'anti-Hindu' is so absurd&funny that its difficult to seriously talk about it.He lived half his life outside Pakistan,he was called anti-Pakistan there.'Hum Dekhenge' he wrote against Zia ul Haq's communal,regressive&fundamentalist Govt pic.twitter.com/nOtFwtfjQ9
— ANI (@ANI) January 2, 2020
मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि फैज अहमद फैज अविभाजित भारत में बड़े हुए और वह प्रगतिशील लेखकों के एक अग्रणी सितारे की तरह थे.
देश के बंटवारे से दुखी थे फैजः जावेद
जावेद अख्तर ने यह भी कहा कि फैज अहमद फैज ने भारत को आजादी मिलने के बाद कविताएं लिखीं और देश के बंटवारे पर भी अपना दुख व्यक्त भी किया था और अब उनके काम को राष्ट्र-विरोधी करार दिया जा रहा है. उन्होंने कहा कि जिस आदमी ने भारत के विभाजन पर दुख व्यक्त करने के लिए एक कविता लिखी थी, उसे अब भारत विरोधी करार दिया जा रहा है.
अख्तर ने कहा कि गीत के रचनाकार ने अपनी जिंदगी के आधे से ज्यादा समय तो पाकिस्तान से बाहर गुजारे क्योंकि वह वहां रह नहीं सकते थे. उन्हें वहां एंटी पाकिस्तान कहा जाने लगा था. उन्होंने आगे कहा कि जिस तरह यहां पर मौलिक अधिकारों की बात कहने पर भारत विरोधी कहा जाने लगता है, उसी तरह फैज के साथ पाकिस्तान में हुआ.
क्या है अनलहक?
उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस नज्म के शब्द पर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन इस नज्म का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है. लोगों को आपत्ति है कि गुजेगा अनलहक का नारा, ये क्या है. अनलहक का अर्थ होता है अहं ब्रह्मास्मि. क्रिएटर और क्रिएशन अलग नहीं हैं, दोनों एक ही हैं. वो भगवान का ही एक रूप है, वो अलग नहीं है.
जावेद ने कहा कि यह तो इस्लामिक विचार ही नहीं है. अनलहक सूफी विचार से आया है. इस्लाम और ईसाईयत में भगवान मालिक होता है और इंसान रियाया (जनता) है. इंसान उसके दरबार में है और खुदा उसको देख रहा है और उस पर फैसला करेगा. किसे जन्नत मिले या नरक (दोजख). ये एक वैदिक विचार है कि क्रिएटर और क्रिएशन एक है.
गीतकार और शायर जावेद ने मुगल शासक औरंगजेब के दौर की बात बताते हुए कहा कि सरमद दिल्ली में ही अनलहक का नारा लगाता था जिसकी मुगल शासक औरंगजेब ने गर्दन कटवा दी थी क्योंकि वो अनलहक नारे के खिलाफ था. औरंगजेब का कहना था कि यह इस्लाम के खिलाफ नारा है. इसमें तुम कह रहे कि तुम और खुदा अलग नहीं हो. आज जो लोग अनलहक के खिलाफ बोल रहे हैं वो औरंगजेब की तरह बोल रहे हैं. लोग कहते हैं कि यह हिंदू के खिलाफ है जबकि इस पर तो यह आरोप रहा है कि यह तो हिदू विचारधारा है.
फैज की विवादित नज्म
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से
सब भूत उठाए जाएंगे
हम अहल-ए-वफा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
हम देखेंगे.
फैज ने किस साल लिखी यह नज्म
यह नज्म फैज अहमद फैज ने 1979 में पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक के संदर्भ में लिखी थी और पाकिस्तान में सैन्य शासन के विरोध में लिखी गई थी. फैज अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण जाने जाते थे और इसी कारण वे सालों तक जेल में भी रहे.
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आईआईटी-कानपुर के छात्रों ने जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के समर्थन में 17 दिसंबर को परिसर में शांति मार्च निकाला था और मार्च के दौरान उन्होंने फैज की यह कविता गाई थी. आईआईटी कानपुर के उपनिदेशक मनिंद्र अग्रवाल के अनुसार, वीडियो में छात्रों को फैज की कविता गाते हुए देखा जा रहा है, जिसे हिंदू विरोधी भी माना जा सकता है.