उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश ने कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल देने की शीर्ष न्यायपालिका की प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए सलाह दी है कि ‘न्यायाधीशों को अपनी सीमा में रहना चाहिये.’ न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने कहा कि निगरानी समिति का गठन करने के निर्देश देने जैसे विधायिका या कार्यपालिका के विशुद्ध अधिकार क्षेत्र वाले मुद्दों पर सरकारी कामकाज को ‘आउटसोर्स’ कर देना न्यायपालिका का काम नहीं है.
चावल की मिल के अधिग्रहण से जुड़े 14 वर्ष पुराने एक मामले में न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका को अपनी भूमिका निगरानी समिति का गठन करने के बजाय नौकरशाहों को निर्देश देने तक ही समिति रखनी चाहिये.
उन्होंने कहा, ‘‘सुप्रीम कोर्ट के जज को हैसियत में रहना चाहिये.’’ न्यायमूर्ति काटजू ने कहा, ‘‘मैं ऐसे आदेशों के खिलाफ अपनी आवाज उठा रहा हूं और मैं ऐसा करना जारी रखूंगा.’’ एक पीठ की ओर से सुनवाई करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘बादशाहत नहीं है कि जो मर्जी में आया वो कर दें.’’ न्यायमूर्ति टी. एस ठाकुर भी इस पीठ के सदस्य थे.
न्यायमूर्ति काटजू की यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आयी जिसमें बिहार की एक कंपनी ने 1996 के उच्चतम न्यायालय के एक फैसले के कार्यान्वयन की मांग की थी. वर्ष 1996 के इस फैसले में शीर्ष अदालत ने बंद पड़ी कागज मिल को दोबारा शुरू करने के लिये निगरानी समिति का गठन किया था. न्यायमूर्ति काटजू ने कहा, ‘‘न्यायाधीशों को उनकी सीमाओं को समझना चाहिये. मैं न्यायिक कामकाज की आउटसोर्सिंग के खिलाफ हूं. निगरानी समिति क्या होती है? क्या यह न्यायपालिका का कार्य है?’’ उन्होंने कहा कि अदालतों को कार्यकारी को आदेश देने का अधिकार है लेकिन इसके मायने ये नहीं हैं कि समितियों का गठन कर दिया जाये.