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अखिलेश से जिनसे किया किनारा वही बनेंगे सहारा !

अपराधी और बाहुबली कैंडिडेट इंडिपेंडेट या अन्य पार्टियों से चुनाव लड़कर जीतते हैं और फिर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लेते हैं. या फिर बाहर रहते हुए भी हर संभव मदद करने के लिए तत्पर रहते हैं. आगामी चुनावों में भी यदि ये पार्टी के बैनर तले चुनाव नहीं लड़ते हैं तो चुनाव नतीजे आने पर ये सरकार बनाने की कवायद में अहम हो सकते हैं...

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ये दागी चुनाव के बाद कर सकते हैं समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने में मदद ये दागी चुनाव के बाद कर सकते हैं समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने में मदद

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगामी विधानसभा चुनावों के लिए अपनी एक साफ-सुथरी और विकास की छवि को केन्द्र में रखते हुए चड़ना चाहते हैं. उनकी चुनौती समाजवादी पार्टी से सिर्फ साफ-सुथरी छवि के उम्मीदवारों को उतारने की है.

अपने पूरे मख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान अखिलेश ने समय-समय पर अपराधी और बाहुबली को अपने से दूर करने की कवायद की है. जिससे चुनावों में यह आरोप पार्टी पर न लग सके कि पिता और चाचा की तरह उनके दरबार में बाहुबलियों को प्रभाव है. ऐसे लोगों को वह चुनावी समर से दूर रखना चाहते हैं.

चुनाव में टिकट निर्धारित करने की उनकी विवादित लिस्ट में आपराधियों और बाहुबलियों के नाम शामिल नहीं हैं. वहीं पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की अपनी सूची में इनके नाम शामिल हैं. यह कोई पहली बार नहीं है. इससे पहले भी पार्टी ने चुनाव से ठीक पहले अपराधियों और बाहुबलीयों को खुद से दूर कर दिया था. ऐसे अपराधी और बाहुबली इंडिपेंडेट या अन्य पार्टियों से चुनाव लड़कर जीतते हैं और फिर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लेते हैं या फिर बाहर रहते हुए भी हर संभव मदद करने के लिए तत्पर रहते हैं. आगामी चुनावों में भी यदि ये पार्टी के बैनर तले चुनाव नहीं लड़ते हैं तो चुनाव नतीजे आने पर ये सरकार बनाने की कवायद में अहम हो जाएंगे

अतीक अहमद

राजनीति में कदम रखते हुए 1989 में पहली बार अतीक अहमद इलाहाबाद (पश्चिमी) विधानसभा सीट से विधायक बने. फिर 1991 और 1993 में निर्दलीय और 1996 में पहली बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए. 1999 में अपना दल में शामिल हुए लेकिन प्रतापगढ़ से चुनाव हार गए. 2002 में अतीक ने पांचवी बार जीत दर्ज की और अगले ही साल समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. 2004 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने अतीक को फूलपुर से सांसद बनाया. लेकिन 2007 में बीएसपी नेता राजू पाल की हत्या में नामजद होने के बाद अतीक को समाजवादी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. अब एक बार फिर पार्टी से टिकट के चलते अतीक का नाम सुर्खियों में है.

मुख्तार अंसारी
1996 में मुख्तार अंसारी पहली बार विधान सभा के लिए चुने गए. अंसारी ने दो बार बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और दो बार निर्दलीय. तीन चुनाव उन्होंने जेल से ही लड़ा है. पिछला चुनाव उन्होंने 2012 में कौमी एकता दल से लड़ा और विधायक बने. समाजवादी पार्टी में मची कलह का एक श्रेय मुख्तार अंसारी को भी जाता है. सपा मुखिया मुलायम और राज्य इकाई के अध्यक्ष शिवपाल ने मुख्तार की पार्टी का अपनी पार्टी में विलय कराया तो मुख्यमंत्री अखिलेश ने इसका विरोध किया. गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी मुख्तार के खिलाफ भी प्रत्याशी नहीं उतारती है. वहीं मुख्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी गाजीपुर से सपा के टिकट पर चार बार विधायक रह चुके हैं और एक बार सांसद भी रहे हैं. वहीं पिछले चुनाव में दूसरे बड़े भाई सिबतुल्लाह अंसारी सपा के टिकट पर चुनाव जीते थे.

रघुराज प्रताप सिंह
रघुराज प्रताप उर्फ राजा भैया पहली बार 1993 में निर्दलीय विधायक बने. हालांकि समाजवादी पार्टी ने राजा भैया के खिलाफ मैदान में पार्टी का उम्मीदवार नहीं उतारा था. समाजवादी पार्टी लगातार राजा भैया को बाहर से समर्थन देती है. फिलहाल वह राज्य सरकार में मंत्री है. गौरतलब है कि 2002 में बसपा-भाजपा गठबंधन में निर्दलीय विधायकों के मुख्या बनकर उन्होंने मायावती को सपोर्ट किया लेकिन मंत्री पद न दिए जाने के बाद अपना समर्थन वापस ले लिया. आगामी चुनावों में भी उम्मीद की जा रही है कि राजा भैया निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे. राजा भैया को 1993 और 1996 के चुनाव में भाजपा से समर्थन मिला तो 2002 और 2007, 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने समर्थन देकर निर्दलीय विधायक चुने जाने में मदद की.

डीपी यादव
80 के दशक में पहली बार ब्लाक प्रमुख चुने जाने के बाद डीपी यादव मुलायम सिंह यादव के संपर्क में आए. मुलायम अपनी पार्टी गठित कर रहे थे और डीपी यादव को राजनीति में मजूबती के साथ पकड़ बनानी थी. मुलायम और डीपी एक दूसरे के नैचुरल बन गए. मुलायम ने डीपी को बुलंदशहर से टिकट दिया और यह चुनाव आसानी से जीतकर वह पहली बार विधायक बन गए. पहली जीत के बाद ही मुलायम ने उन्हें मंत्रीमंडल में भी जगह दे दी. लेकिन मुलायम और डीपी की बढ़ती नजदीकी ही दोनों के दूर होने का कारण बन गई. मुलायम ने पार्टी में डीपी के बढ़ते प्रभाव को लगाम लगाने के लिए समाजवादी पार्टी से बाहर कर दिया. इसके बाद वह लगातार समाजवादी पार्टी और मुलायम परिवार के लोगों के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे. गौरतलब है कि पिछले चुनाव से पहले डीपी एक बार फिर समाजवादी पार्टी का दामन थामना चाहते थे लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने उनकी एंट्री पर ब्रेक लगा दिया था.

 

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