राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव बिहार में अपनी राजनैतिक जमीन बचाने की कोशिश में जुट गए हैं. नवंबर, 2010 के विधानसभा चुनावों में पूरी तरह सफाया हो जाने के कारण एक लंबी चुप्पी के बाद लालू ने 3 जून की पुलिस गोलीबारी पीड़ितों के समर्थन में 3 सितंबर को अररिया जिले तक, फारबिस गंज यात्रा शुरू की.
भजनपुरा गांव में एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान का विरोध कर रहे मुसलमानों के एक समूह पर पुलिस गोलीबारी में चार लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें एक शिशु और एक गर्भवती महिला भी थी.
फारबिस गंज के दौरे के दो दिन बाद लालू मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा का एक अस्पताल भी देखने गए, जहां उन्होंने अपने घावों का इलाज करा रही पिछड़ी जाति की एक महिला का हालचाल पूछा, जिसको गांव के कुछ दबंग लोगों ने मारा-पीटा था. लालू ने पीड़तों की आर्थिक मदद करते हुए भजनपुरा में मृतकों के परिवार को एक-एक लाख रु. और नालंदा की महिला को 10,000 रु. दिए.
अपने स्वर्णिम दिनों में लालू आम जनता के जादूगर हुआ करते थे, जो उनसे सीधे जुड़ जाते थे और जहां भी जाते, जनता के साथ रिश्ता कायम कर लेते थे. नवंबर, 2005 में नीतीश ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया था, उसके करीब छह साल बाद लगता है उनकी हेकड़ी खत्म हो चुकी है और उनके व्यक्तित्व केंद्रित प्रचार का समय खत्म हो गया लगता है, शायद इसलिए वे अब ऐसे मुद्दों पर दांव लगा रहे हैं जो जनता को जगा सकें.
लालू के लिए अच्छी खबर यह है कि बिहार में मुद्दों की कोई कमी नहीं है. लेकिन बुरी खबर यह है कि लालू की वह साख नहीं रह गई है, जिसके भरोसे वे कोई बड़ा जन आंदोलन चला सकें. 2010 के विधानसभा चुनावों के समय वे राज्य में आम जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने में नाकाम रहे थे, जैसे कि राज्य की खराब आबकारी नीति.
यहां तक कि अब भी भजनपुरा के पीड़ितों तक पहुंचने में उन्हें तीन महीने लग गए जबकि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी 1 जुलाई को ही उनका हालचाल लेने पहुंच गए थे. ताज्जुब नहीं कि नीतीश ने लालू के इस प्रयास पर चुटकी लेते हुए कहा, ''लगता है, उनकी नींद काफी देर से खुली है.''
सितंबर के शुरू में उनके दो दौरों से लगता है कि वे एक बार फिर अपना जनाधार वापस पाने की कवायद में जुट गए हैं. वक्त के साथ लालू बदल गए हैं. लेकिन दिक्कत यह है कि बिहार भी बदल गया है.