छत्तीसगढ़ के बिलासपुर उच्च न्यायालय ने पीयूसीएल के नेता बिनायक सेन तथा कलकत्ता के व्यापारी पीयूष गुहा की जमानत की अर्जी खारिज कर दी है. सेन और गुहा राजद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं.
बिलासपुर उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति टीपी शर्मा और न्यायमूर्ति आर एल झंवर की खंडपीठ ने सेन और गुहा की जमानत की अर्जी पर सुनवाई के बाद अर्जी खारिज कर दी. सेन और गुहा की जमानत की अर्जी पर सुनवाई पूरी होने के बाद बुधवार को न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.
गुरुवार को न्यायालय की कार्यवाही शुरू होने के बाद खंडपीठ ने सेन की जमानत की अर्जी खारिज करने की जानकारी दी. न्यायालय द्वारा सेन की जमानत की अर्जी खारिज करने के बाद उनके वकील महेंद्र दूबे और बिनायक सेन की पत्नी इलीना सेन ने कहा कि वे अब उच्चतम न्यायालय में जमानत की अर्जी दाखिल करेंगे. {mospagebreak}
इलीना सेन ने कहा कि वे अब उच्चतम न्यायालय जाएंगे तथा इसके लिए वे अपने वकीलों से बातचीत कर रही हैं. वहीं सेन के वकील महेंद्र दुबे ने कहा ‘चूंकि हमारी अर्जी खारिज हो गई है और न्याय प्रक्रिया के तहत उपचार उपलब्ध है, इसलिये अब हम उच्चतम न्यायालय जाएंगे तथा विशेष अनुमति याचिका भी दायर करेंगे.’ सेन की जमानत अर्जी पर फैसले को देखते हुए न्यायालय परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. फैसले के दौरान सेन के परिजन न्यायालय परिसर में मौजूद थे.
छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले की अदालत ने 24 दिसंबर वर्ष 2010 को पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन, कलकत्ता के व्यापारी पीयूष गूहा और नक्सली नेता नारायण सान्याल को राजद्रोह के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. सेन और गूहा ने राज्य के उच्च न्यायालय में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ तथा जमानत के लिए अर्जी लगाई थी. {mospagebreak}
बिनायक सेन की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता रामजेठमलानी ने न्यायालय में सुनवाई के दौरान पैरवी की थी तथा सेन पर लगे आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया था. जेठमलानी ने कहा था कि छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून पर उन्हें आपत्ति है क्योंकि इस कानून में किसी व्यक्ति की सुरक्षा का ख्याल नहीं रखा जाता. वहीं यह कानून भी सवालों के घेरे में है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कानून के खिलाफ उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की है.
उन्होंने कहा था कि बिनायक सेन को राजद्रोह के मामले में सजा दी गई है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि साक्ष्य पुलिस द्वारा बनाए गए हैं जिनपर भरोसा नहीं किया जा सकता. यह पूरा मामला राजनीति से प्रेरित लग रहा है. बुधवार को इस मामले में बहस के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता किशोर भादुड़ी ने राज्य शासन का पक्ष रखा था तथा बिनायक सेन और पीयूष गुहा को जमानत नहीं दिए जाने की मांग की थी.
वहीं राजनांदगांव में नक्सली हमले में मारे गए पुलिस अधीक्षक वीके चौबे की पत्नी रंजना चौबे ने बिनायक सेन की जमानत की अर्जी के खिलाफ हस्तक्षेप याचिका भी लगायी थी. सेन की जमानत की अर्जी की सुनवाई के दौरान यूरोपीय यूनियन के कार्यकर्ता भी न्यायालय परिसर में मौजूद थे जिन्हें रायपुर और बिलासपुर में विभिन्न संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा था.