सियाचिन ऐसा बर्फीला रेगिस्तान है जहां सिर्फ बर्फ ही बर्फ है. यहां सांस लेने के लिए पूरी ऑक्सीजन भी नहीं मिलती. फिर भी भारतीय जवान वहां डटे रहते हैं, और देश की रक्षा करते हैं.
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सियाचिन पर तैनाती के बाद फौजियों को बेहद मुश्किल भरी जिंदगी गुजारनी पड़ती है, यहां तैनाती के तीन महीने के दौरान सैनिकों को नहाने को नहीं मिलता.
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जवान यहां पर दाढ़ी भी नहीं बना पाते, हर रात अपनी चौकी के सामने से उन्हें बर्फ हटानी पड़ती है, क्योंकि बर्फ नहीं हटाई जाए तो बर्फ के दबाव से बर्फ की जमीन फटने का खतरा होता है.
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जवानों को पीने के पानी के लिए बर्फ पिघलानी पड़ती है, सैनिकों के पास एक खास तरह की गोली होती है, जिसे पिघले पानी में डालकर उसे पीने लायक बनाया जाता है.
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मुश्किल ट्रेनिंग और जज्बे के बावजूद सैनिकों को हाइपोक्सिया, हाई एल्टीट्यूड एडीमा जैसी बीमारियां हो जाती हैं, जिससे फेफड़ों में पानी भर जाता है और शरीर के अंग सुन्न हो जाते हैं.
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हाल ही में 13 अप्रैल को देश ने सियाचिन दिवस भी मनाया है. इतिहास के पन्नों में 13 अप्रैल का दिन बेहद खास है. इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं. उसमें सियाचिन पर कब्जे की शुरुआत महत्वपूर्ण है.
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भारत की रणनीति में यहां युद्ध कभी भी नहीं था, पर जुलाई, 1949 में कराची एग्रीमेंट में खींची गई सरहद को लेकर कुछ स्पष्ट नहीं हुआ था.
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इसके बाद साल 1972 के शिमला समझौते के वक्त भी सियाचिन को बेजान और इंसानों के लायक नहीं समझा गया.
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आपको बता दें कि सियाचिन 76 किलोमीटर लंबा दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर है. यहां 1984 से 2012 तक 846 सैनिक शहीद हो चुके हैं.
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सियाचिन में भारतीय फौज के करीब 150 फौजी पोस्ट हैं, जिनमें करीब 10 हजार फौजी तैनात रहते हैं.
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एक अनुमान के मुताबिक सियाचिन में सेना की तैनाती का एक दिन का खर्च ही करीब 5 करोड़ रुपए है.
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अनुमान है कि सियाचिन की रक्षा पर साल में डेढ़ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होते हैं.