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नागपुर में शिंदे के 'सिपाही' बिगाड़ रहे बीजेपी का गेम, पवार के पावर से कांग्रेस भी परेशान

नागपुर महानगर पालिका परिषद के लिए 15 जनवरी को चुनाव है. बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ नागपुर माना जाता है, क्योंकि सीएम देवेंद्र फडणवीस का गृह क्षेत्र है, लेकिन एकनाथ शिंदे की शिवसेना के 'सिपाही' निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरकर सियासी गेम बिगाड़ रहे हैं. ऐसा ही हाल कांग्रेस का भी है.

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सीएम देवेंद्र फडणवीस के गढ़ नागपुर में शिंदे की सेना ने दिया टेंशन (Photo-PTI)
सीएम देवेंद्र फडणवीस के गढ़ नागपुर में शिंदे की सेना ने दिया टेंशन (Photo-PTI)

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का होम ग्राउंड है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय भी इसी शहर में स्थापित है, जिसके चलते देश भर की निगाहें नागपुर के महानगर निगम चुनाव पर लगी हुई है. ऐसे में बीजेपी के लिए नागपुर का चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.

नागपुर की सत्ता पर पिछले 15 सालों से बीजेपी का सियासी कब्जा है. नागपुर में बीजेपी लगातार तीन नगर निगम चुनाव जीत चुकी है और अपना मेयर भी बनाती रही है. इस बार बीजेपी जीत का चौका लगाने के लिए मैदान में उतरी है, लेकिन उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा महायुति के सहयोगी एकनाथ शिंदे की शिवसेना के 'सिपहसालार' बन गए हैं. इसके चलते बीजेपी के सामने सियासी चुनौती खड़ी हो गई है.

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बीजेपी के लिए नागपुर में उसकी सहयोगी शिवसेना ने सियासी टेंशन बढ़ा रखी है तो पवार फैमिली के पावर से कांग्रेस नागपुर में परेशान हो रही. कांग्रेस का नागपुर में एकला चलो की रणनीति कहीं भारी ना पड़ जाए. इस तरह बीजेपी दोनों के सामने नागपुर में चैलैंज है, लेकिन मुख्यमंत्री का होम ग्राउंड और संघ का मुख्यालय होने के चलते बीजेपी की साख ज्यादा दांव पर है.

नागपुर नगर निगम का सियासी समीकरण

नागपुर महानगर पालिका परिषद, जिसे नगर निगम भी कहा जाता है. नागपुर महानगर में कुल 151 वार्ड पार्षद चुने जाए हैं. 2017 के महानगर निगम के चुनाव में बीजेपी 108 सीटें जीतकर अपने दम पर मेयर बनाने में सफल रही थी. कांग्रेस ने 28 सीटें जीती थी तो बसपा के 10 पार्षद चुने गए थे. शिवसेना के दो और एनसीपी के एक पार्षद जीतकर आए थे.

2026 के नगर निगम चुनाव में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना मिलकर लड़ रही है. 151 सीटों में से बीजेपी 143 सीट पर खुद अपने प्रत्याशियों को उतारा है तो 8 सीट पर एकनाथ शिंदे की शिवसेना चुनावी मैदान में है. महायुति से अलग किस्मत आजमा रहे अजित पवार की एनसीपी ने 96 सीट पर अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं.

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नागपुर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस अकेले दम पर किस्मत आजमा रही है और सभी 151 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं. उद्धव ठाकरे गुट वाली शिवसेना (यूबीटी) नागपुर नगर निगम चुनाव में 58 सीट पर उम्मीदवार उतारे हैं जबकि शरद पवार की एनसीपी (एसपी) ने 76 सीट पर दांव आजमा रही है. इसके अलावा AIMIM और बसपा सहित तमाम छोटी पार्टियां और निर्दलीय चुनावी मैदान में है.

राज ठाकरे की मनसे ने भी नागपुर 22 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. इतने सारे खिलाड़ियों के मैदान में होने से यह साफ है कि हर वार्ड में वोटों का जबरदस्त बंटवारा होगा, जिसका सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ेगा.

बीजेपी की राह में शिंदे के 'सिपाही' बने बाधा?

बीजेपी ने अपने सियासी दुर्ग को बचाए रखने के लिए एकनाथ शिंदे की शिवसेना साथ गठबंधन कर रखा है, लेकिन शिंदे की सिपहसलार ही सियासी राह में बाधा बन गए हैं. बीजेपी ने शिंदे की शिवेसना को आठ सीटें दी है, जिसमें से छह सीट पर बीजेपी बैकग्राउंड वाले नेता चुनावी किस्मत आजमा रहे और दो सीट पर शिंदे की शिवसेना के मूल उम्मीदवार हैं.

नागपुर में शिवसेना को ज्यादा सीटें ना मिलने के चलते शिंदे की पार्टी के नाराज 30 से ज्यादा नेताओं ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल कर रखा है. शिवसेना के ये नेता अपने नाम वापस लेने के मूड में नहीं है. शिंदे के बागी नेता बीजेपी पर शिवसेना को खत्म करने का आरोप लगा रहे. ये सभी उम्मीदवार मैदान अभी तक डटे हुए और नाम वापस नहीं लेते हैं तो नागपुर में फिर बीजेपी के लिए सियासी मुश्किल हो सकती है. ऐसे में हिंदुत्व वोट बैंक में बंटवारे का खतरा है.

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शिंदे की शिवसेना के जिला प्रमुख सूरज गोजे पर ऐन वक्त पर मामला दर्ज होने से उनका टिकट कट गया है. शहर प्रमुख समीर शिंदे, धीरज फंदी, महिला प्रमुख मनीषा पापडकर, अनिता जाधव और पूर्व उपमहापौर रघुनाथ मालीकर चुनाव लड़ने के इच्छुक थे, लेकिन इनमें से किसी को भी शिवसेना से टिकट नहीं मिला. इसके चलते शिंदे के ये तमाम सिपहसलार अब बीजेपी को हराने के लिए मशक्कत कर रहे हैं, जिसकी वजह से नागपुर महानगर निगम चुनाव में समीकरण गड़बड़ा रहा है.

बीजेपी के लिए सियासी मुश्किले क्यों खड़ी

नागपुर महानगर निगम चुनाव शिंदे की पार्टी के नेता ही नहीं बीजेपी की मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं बल्कि अपने भी कई नेता बागी तेवर अपना रखे हैं. इस बार के चुनाव में सत्ता विरोधी लहर को काउंटर करने के मकसद से बीजेपी ने अपने मौजूदा 108 पार्षद में से 63 के टिकट काट दिए हैं और उनकी जगह पर नए चेहरों को उतारा है. ऐसे में बीजेपी के जिन नेताओं के टिकट काटे गए हैं, उनमें से कई नेता निर्दलीय चुनावी मैदान में है तो कई नेता बिना लड़े ही सियासी गेम बिगाड़ रहे हैं.

हमेशा चुनाव मोड में रहने वाली बीजेपी में उम्मीदवार तय करने में ऊहापोह की स्थिति अंतिम समय तक बनी रही, जिसके चलते नागपुर की 6 सीटों पर 2-2 उम्मीदवारों को पार्टी का एबी फार्म दे दिया गया. अब जिन 12 उम्मीदवारों ने एबी फार्म नामांकन के साथ जमा किए है, उनमें से किन 6 नेताओं के नाम वापस करवाए जा सकेंगे, इस पर मंथन चल रहा है.

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नागपुर में बीजेपी के चुनाव प्रभारी का कहना है कि बैठक कर निर्णय लेंगे और किसी को नाराज नहीं करेंगे. वैसे जिन 63 पूर्व नगरसेवकों की टिकट काटे गई है, उनमें भारी रोष देखा जा रहा है. यह नाराजगी भले ही सार्वजनिक नहीं हो रही है लेकिन चुनाव में पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है. बीजेपी के लिए अपने दुर्ग को बचाए रखना काफी मुश्किल होता जा रहा है.

अजित पवार किसका बिगाड़ेंगे नागपुर में गेम

महायुति की सरकार में डिप्टीसीएम अजित पवार नगर निगम चुनाव में अकेले किस्मत आजमा रहे हैं. नागपुर की 151 सीटों में से 96 पर अजित पवार के उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं. इनमें दूसरे दलों से आए पूर्व नगरसेवक और सभापति भी शामिल हैं. ये उम्मीदवार निश्चित रूप से संबंधित प्रभागों में बीजेपी का गणित बिगाड़ सकते हैं.

नागपुर के वार्ड 32 में बीजेपी में शामिल हुए पूर्व नगरसेवक राजकुमार नागुलवार ने टिकट न मिलने पर अजित पवार की पार्टी एनसीपी से ताल ठोक दी है. ऐसे ही कांग्रेस से आए तानाजी वनवे वार्ड नंबर 27 से मैदान में हैं. इतना ही नहीं दिलीप पनकुले, आभा पांडे जैसे वजनदार चेहरों के साथ 96 युवा और नए उम्मीदवार बीजेपी को सीधी टक्कर देते नजर आ रहे हैं.

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पवार के पावर से कांग्रेस की बढ़ी मुश्किलें?

कांग्रेस नागपुर नगर निगम चुनाव में अकेले दम पर उतरी है, लेकिन उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा उसकी पुरानी साथी शरद पवार की एनसीपी बन रही है. शरद पवार ने जिस तरह 76 उम्मीदवार उतारे हैं, उसके चलते कांग्रेस की चिंता बढ़ गई है. कांग्रेस और एनसीपी की विचारधारा समान होने के कारण कांग्रेस के वोट बंटने की आशंका अधिक है. यह भी चर्चा है कि अजित पवार गुट वाली एनसीपी के चलते वोटर भी कई जगह कांग्रेस के वोट काट सकते हैं.

नागपुर में एनसीपी की स्थिति भले ही बहुत मजबूत न हो, लेकिन कुछ स्थानों पर मजबूत कैंडिडेट उतार रखे हैं. वार्ड 13 से पूर्व विधायक प्रकाश गजभिए चुनाव लड़ रहे हैं. 23-डी से शहर अध्यक्ष दुनेश्वर पेठे किस्मत आजमा रहे. इसके अलावा कुछ वार्डों में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे गए हैं, जो सीधे कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं. वार्ड 21-डी में कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ता इरशाद अली की टिकट काट दिया, जिसके चलते निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं और शरद पवार की पार्टी का समर्थन है.

कांग्रेस का नागपुर में प्रभाव मुख्य रूप से उत्तर और मध्य के इलाकों में है, जहां दलित, मुस्लिम और अल्पसंख्यक वोट निर्णायक भूमिका में हैं. बसपा एक समय यहां किंगमेकर हुआ करती थी, लेकिन अब उसका आधार लगभग खत्म हो चुका है और उसकी जगह वंचित बहुजन अघाड़ी लेने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस जिन वोटों के सहारे नागपुर में जीत की उम्मीद लगाए हुए, उसी वोटों पर शरद पवार से लेकर बसपा और ओवैसी की पार्टी की नजर है.

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फडणवीस के सामने बैटल ग्राउंड बचाने की चुनौती

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस शुरुआत से ही नागपुर के राजनीतिक इतिहास में बेहद चर्चित चेहरा रहे हैं वो 1997 में महज 27 साल की उम्र में नागपुर के मेयर बने थे. उस समय वह देश के दूसरे सबसे कम उम्र के मेयर थे. उन्होंने 1997 से 1999 तक मेयर के रूप में काम किया. इसके बाद जब महाराष्ट्र में 'मेयर-इन-काउंसिल' सिस्टम लागू हुआ, तो वह फिर से चुने गए.

मेयर के तौर पर उन्होंने प्रॉपर्टी टैक्स सुधार और निगम की आय बढ़ाने के लिए जो कड़े फैसले लिए, उसी ने उन्हें बाद में मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाने में मदद की. नागपुर बीजेपी का पॉवरहाउस कहलाता है, गडकरी और फडणवीस की जोड़ी ने यहां विकास के बड़े काम (मेट्रो, फ्लाईओवर्स) किए हैं, जो उनकी सबसे बड़ी ताकत है. आरएसएस का मुख्यालय होने के कारण संगठन की पकड़ यहां बेहद मजबूत है. ऐसे में बीजेपी के सामने नागपुर को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई.

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