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दो नावों की सवारी हरियाणा में डुबा रही कांग्रेस की लुटिया

लोकसभा चुनाव में हरियाणा की सभी 10 सीटों पर कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा. जबकि कांग्रेस ने प्रदेश के सारे अपने दिग्गज नेताओं को मैदान में उतार दिया था, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा तक शामिल हैं.

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नए प्रयोग की तैयारी में कांग्रेस (फोटो-Getty Image)
नए प्रयोग की तैयारी में कांग्रेस (फोटो-Getty Image)

हरियाणा में करारी हार के बाद भी कांग्रेसी नेताओं के बीच गुटबाजी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. हरियाणा विधानसभा चुनाव में महज तीन महीने से भी कम समय बचा हुआ है, बावजूद इसके कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच वर्चस्व की जंग जस की तस बनी हुई है. राज्य में दलित और जाट दोनों समुदाय को एक साथ साधकर रखने की वजह से कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हुड्डा-तंवर में किसी के खिलाफ कार्रवाई करने से बचती रही है. इसी का नतीजा है कि हरियाणा में कांग्रेस का ग्राफ 2014 के बाद से लगातार गिरता जा रहा है.

लोकसभा चुनाव में हरियाणा की सभी 10 सीटों पर कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा. जबकि कांग्रेस ने प्रदेश के सारे अपने दिग्गज नेताओं को मैदान में उतार दिया था, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा तक शामिल हैं. इसके बाद भी कांग्रेस का राज्य में खाता तक नहीं खुला यहां तक की रोहतक सीट भी हार गए.

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लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने 9 जून को दिल्ली में प्रदेश भर से अपने समर्थकों को बुलाकर संदेश दिया कि अगले एक सप्ताह में प्रदेश कांग्रेस में फेरबदल हो जाएगा और प्रदेश कांग्रेस की कमान उनके खेमे के पास होगी. इसके जवाब में प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने 12 जून को गुरुग्राम में कार्यकर्ताओं की बैठक में हुड्डा पर तंज कसते हुए बिना नाम लिए कहा था कि जो आजकल एक सप्ताह में बदलाव की बात करते हैं वे तो पिछले साढ़े चार साल से यही बात कहते आ रहे हैं, लेकिन आज तक कोई बदलाव नहीं करा सके.

दरअसल अशोक तंवर और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच सियासी वर्चस्व की जंग आज की नहीं है बल्कि पिछले कई सालों से चली आ रही है. इस गुटबाजी से कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा और फिर 2014 में ही राज्य की अपनी सत्ता गवांनी पड़ी और बीजेपी पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में विरामान हुई.

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी में गुटबाजी खत्म के लिए लोकसभा चुनाव 2019 से ठीक पहले हुड्डा-तंवर को एक बस में बैठाकर दिल्ली से हरियाणा तक का सफर तय कराया, इसके बाद भी दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक वर्चस्व की जंग कम नहीं हुई. इसका खामियाजा लोकसभा चुनाव में पार्टी को उठाना पड़ा.

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कांग्रेस हरियाणा में एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद भूपेंद्र हुड्डा और तंवर पर किसी तरह की कार्रवाई करने से बचती रही है. इसके पीछे दोनों नेताओं के जाति वोटबैंक वजह है. राज्य में 25 फीसदी जाट, 20 फीसदी दलित समुदाय के वोटर हैं. यही वजह है कि किसी एक के खिलाफ कार्रवाई की गई तो दूसरे समुदाय को लोगों के बीच गलत संदेश जाएगा. और इसी कशमकश में कांग्रेस की लुटिया हरियाणा में डूबती जा रही है.

कांग्रेस नए प्रयोग की तैयारी में

हरियाणा में कांग्रेसी दिग्गजों की गुटबाजी खत्म करने को लेकर हाईकमान नया प्रयोग करने की तैयारी में है. राज्‍य में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा और अशोक तंवर की लड़ाई में पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा को फायदा हो सकता है. हरियाणा में पार्टी की कमान तंवर के हाथों से लेकर कुमारी शैलजा को सौंपकर दलित वोटरों को साधने की कोशिश होगी. साथ ही कांग्रेस हाईकमान सभी गुटों को एक डोर में बांधने की मंशा से तीन कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाने का दांव भी चल सकती है. वहीं, जाट समुदाय को साधने की दिशा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा को विधायक दल का नेता बनाया जा सकता है.

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