दिल्ली के स्कूल वाहन सड़कों पर नियम तोड़ते दिख जाते हैं. इन्हें ना तो ट्रैफिक पुलिस का डर है और न ही हादसों का. राजधानी के ज्यादातर स्कूल वैन में 15 से 20 बच्चे भरे जाते हैं, जबकि उनकी क्षमता महज 8 की होती है.
इतना ही नहीं, यह वैन चालक कानून की धज्जियां उड़ाने में भी किसी से कम नहीं. कानून के अनुसार हर स्कूल वैन में आग से निपटने के जरूरी इंतजाम भी होने चाहिए. नियमों के मुताबिक वैन में कम से कम एक फायर एक्सटिंगुईशर होना ही चाहिए, हर गाड़ी में एक फर्स्ट एड बाक्स भी होना चाहिए, पर यह हमें किसी भी गाड़ी में नहीं मिलता.
इतना ही नहीं इन स्कूलो में चल रही स्कूल वैन में ज्यादातर गाड़िया कमर्शियल है ही नहीं, यानी यह गाड़ियां प्राइवेट हैं. दिल्ली में स्कूल वैन में कई हादसे हो चुके हैं. कई हादसों में बच्चों ने अपनी जान भी गंवाई हैं. इन हादसों के बाद भी दिल्ली-एनसीआर के नामी स्कूलों में स्कूल बसों की हालत नहीं सुधरी है. नियम कहता है कि बस में दो रॉड लगी हुई होनी चाहिए, जिससे बच्चा बस से बाहर सिर न निकाल सके, लेकिन दिल्ली में ऐसे नियमों को कोई कोई स्कूल बस नहीं मानता है.
इसके साथ इन बसो में न ड्राइवर का नाम होता है और ना ही फोन नंबर. कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि आपके बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने वाला हर वाहन में कहीं न कहीं सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर. उनकी जान के साथ खिलवाड़ कर रहा है.