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‘CAA बना उकसावे का हथियार...’, दिल्ली हिंसा केस में 'सुप्रीम' फैसले से पहले कोर्ट में आरोपियों-पुलिस के बीच तीखी बहस

दिल्ली दंगों से जुड़े 'लार्जर कंस्पिरेसी केस' में सुप्रीम कोर्ट के सामने आरोपियों और दिल्ली पुलिस की ओर से तीखी बहस देखने को मिली. आरोपियों ने जांच में देरी, लंबे कारावास और ठोस सबूतों की कमी का मुद्दा उठाया, जबकि पुलिस ने इसे देश को अस्थिर करने की पूर्व-नियोजित साजिश बताया.

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शरजील इमाम (बाएं) और उमर खालिद पर 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया था. (फाइल फोटो)
शरजील इमाम (बाएं) और उमर खालिद पर 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया था. (फाइल फोटो)

दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े मामले में फैसले से पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने आरोपियों और दिल्ली पुलिस दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं. इस सुनवाई में एक तरफ आरोपियों ने जांच और ट्रायल की प्रक्रिया पर सवाल उठाए, तो दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस ने इसे देश को अस्थिर करने की साजिश बताया. इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट 5 जनवरी को अपना फैसला सुनाएगा.

आरोपियों के वकीलों ने कोर्ट में कहा कि इस मामले की जांच में असामान्य और बेवजह देरी हुई है. एफआईआर दर्ज होने के बाद भी ट्रायल शुरू होने में कई साल लग गए, जबकि आरोपी लंबे समय से जेल में बंद हैं. उनका आरोप है कि पुलिस बार-बार सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करती रही, जिससे ट्रायल लगातार टलता रहा और मामला अनिश्चित समय तक लटका रहा.

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उमर खालिद के मामले में बचाव पक्ष ने कहा कि दंगों के समय वह दिल्ली में मौजूद ही नहीं थे. उनके खिलाफ न तो किसी हथियार का सबूत है, न कोई चश्मदीद और न ही हिंसा भड़काने का कोई सीधा प्रमाण.

उमर खालिद का क्या पक्ष है?

वकीलों का कहना है कि अभियोजन (उमर खालिद) का पूरा केस 17 फरवरी 2020 को अमरावती टीवी पर दिए गए एक भाषण पर टिका है, जिसमें कहीं भी हिंसा के लिए उकसाने की बात नहीं कही गई थी. उन्होंने यह भी बताया कि मार्च 2020 में एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन जून 2023 तक सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल होती रहीं, जिसके कारण तीन साल से ज्यादा समय तक ट्रायल शुरू नहीं हो सका.

शरजील इमाम क्यों जेल में बंद हैं?

शरजील इमाम को लेकर दलील दी गई कि वह अगस्त 2020 से जेल में हैं, जबकि जांच को 2024 में जाकर पूरा बताया गया. उनके खिलाफ सिर्फ शांतिपूर्ण विरोध के समर्थन में दिए गए भाषण का आरोप है. बचाव पक्ष ने कहा कि असहमति या विरोध को अपराध नहीं माना जा सकता.

शिफा उर रहमान का क्या केस है?

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शिफा उर रहमान के मामले में कहा गया कि न तो उनकी कोई संगठनात्मक भूमिका थी, न उन्होंने कोई भड़काऊ भाषण दिया और न ही किसी हिंसक गतिविधि में शामिल रहे. उनके खिलाफ सिर्फ कुछ सीमित डिजिटल सबूत और दो बयान हैं, जो यूएपीए जैसे कठोर कानून के तहत अपराध नहीं होते.

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दिल्ली पुलिस ने क्या तर्क दिए?

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यह हिंसा अचानक नहीं भड़की थी, बल्कि यह एक पूरी तरह से सुनियोजित और पहले से तय साजिश थी. पुलिस के मुताबिक यह तथाकथित 'रेजीम चेंज ऑपरेशन' का हिस्सा था, जिसका मकसद भारत को अस्थिर करना और अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि को नुकसान पहुंचाना था.

पुलिस ने कहा कि यह हिंसा जानबूझकर उस समय कराई गई, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर थे, ताकि दुनिया का ध्यान इस पर जाए. पुलिस का यह भी दावा है कि नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA को जानबूझकर एक भड़काऊ मुद्दे के रूप में चुना गया और उसे शांतिपूर्ण विरोध की आड़ में आगे बढ़ाया गया.

दिल्ली पुलिस के अनुसार, गवाहों के बयान, दस्तावेज और तकनीकी सबूत आरोपियों को इस कथित बड़ी साजिश से जोड़ते हैं. पुलिस ने यह भी कहा कि ट्रायल में हुई देरी के लिए आरोपी खुद जिम्मेदार हैं. अब सुप्रीम कोर्ट दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर मामले पर विचार कर रहा है.

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