लॉकडाउन में मजबूर प्रवासी श्रमिकों ने पलायन शुरू किया तो दिल्ली के तमाम कारखानों पर ताले लग गए. कारखाना मालिक भी मंदी के शिकार हो गए. कई मालिकों को श्रमिकों के अभाव में फैक्ट्री बंद करनी पड़ी. कारखाना मालिकों को माल का ऑर्डर नहीं आ रहा है. रही सही कसर राज्यों की सीमाओं पर सख्ती ने पूरी कर दी. माल के आवागमन में काफी बाधा आ रही है.
फैक्ट्री मालिक अशोक गुप्ता ने बताया कि इंडस्ट्री खुलने के बाद से अच्छा रिस्पांस नहीं है. सिर्फ 20 फ़ीसदी ही काम बचा है. लेबर के अभाव में कई फैक्ट्रियां बंद हो गईं और अधिकतर लेबर अपने घर चले गए. फैक्ट्री के बहुत सारे खर्चे हैं. माल सप्लाई नहीं है. भुगतान नहीं है.
ऑटो मोबाइल फैक्ट्री मालिक राजन गुप्ता ने बताया, 'मेरी फैक्ट्री में 4 मजदूरों की जरूरत होती है. लेकिन सिर्फ एक ही बचा है. एक मशीन बंद पड़ी है. सिर्फ मजदूरों का मेहनताना निकालने के लिए ही काम हो रहा है. बवाना इंडस्ट्रियल एरिया 5 सेक्टर में बंटी हुई है. एक सेक्टर में अल्फाबेट के हिसाब से करीब 18 पॉकेट होंगे. आंकड़े के मुताबिक करीब 16 हजार फैक्ट्रियां हैं. औसत रूप में हर फैक्ट्री में 8 से 10 मजदूर काम कर रहे थे, लेकिन अब इक्का-दुक्का ही बचे हैं.
उद्यमी तजिंदर सिंह ने कहा कि इंडस्ट्री के लिए लेबर बहुत ज़रूरी है. उनको ये भी लग रहा है कि लेबर अब 6 महीने तक वापस नहीं लौटने वाला. ऐसे में बिना सरकारी रियायत के फैक्ट्री मालिक टैक्स की मार झेलने को मजबूर हैं. कारोबारियों को बवाना में मेंटेनेंस टैक्स, वाटर टैक्स, सीवर टैक्स, लीज कमर्शियल हाउस टैक्स, एनडीपीएल का फिक्स चार्ज देना पड़ रहा है.
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सतीश मित्तल का कहना है उनका फिक्सड चार्ज लाखों रुपये का है. सभी लेबर चले गए तो फैक्ट्री पर ताला जड़ना पड़ा और अब फिक्सड चार्ज के लिए खुद की गाड़ी भी बेच डाली.
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दरअसल, कारोबारी फैकट्री पर लोन नहीं ले सकते क्योंकि ये सभी फ्री होल्ड नहीं बल्कि लीज होल्ड हैं. ऐसे में सभी सरकार से रियायत की उम्मीद लाए बैठे हैं. सभी ने दिल्ली की बिजली कंपनियों पर लूटने का इल्जाम लगाया है.
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बवाना में रिलोकेशन इडस्ट्री माइक्रो इंडस्ट्री है जो MSME से भी छोटी हैं. बिना सरकारी रियारत कारखानों को चारों तरफ से टैक्स की मार पड़ रही है. पहले लॉकडाउन फिर लेबर के चले जाने और अब फिक्सड चार्ज ने कारोबार की कमर तोड़ दी है.