लद्दाख की सरहद पर करीब एक महीने से चीन से जारी तनाव के बीच आजतक ने ई-एजेंडा कार्यक्रम की सीरीज में 'सुरक्षा सभा' का आयोजन किया है. ई-एजेंडा के 'किसमें कितना है दम' सेशन में पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रि.) बिक्रम सिंह डोकलाम के बाद चीन ने क्या सीखा, इस सवाल पर जवाब देते हुए पूर्व सेनाध्यक्ष ने कहा कि इससे साबित हुआ था कि हम वो ताकत रखते हैं कि चीन की आंखों में देख सकते हैं.
ये सामने आया है कि चीन हर उस मुल्क की इज्जत करता है जिसकी मिलिट्री मजबूत है. चीन ताकत का आदर करता है. डोकलाम के बाद यह संदेश बिलकुल स्पष्ट गया कि भारत की सेना को आप 62 की सेना मत समझिए. दूसरी बात अन्य पहलुओं पर हमारा देश भी चीन की तरह ही बढ़ रहा है. ये जाहिर है कि कोई देश जब सुपर पॉवर की तरफ बढ़ता है तो वो एग्रेसिव हो जाता है, इसी वजह से चीन एग्रेसिव हो रहा है और हम भी एग्रेसिव हो रहे हैं, पाकिस्तान को हमने कई बार ये बताया भी है. हमारे रक्षा मंत्री इस समस्या को अच्छे तरीके से हैंडल कर रहे हैं.
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चीन के साथ लंबी सीमा पर कई विवादों पर बात करते हुए पूर्व सेनाध्यक्ष ने कहा कि यह काफी जटिल मसला है. मैं तो कहूंगा कि दृढ़ नेतृत्व वाली सरकार ही इससे निपट सकती है. हमारी सीमाएं जो हैं वो बहुत ही अविकसित इलाके हैं. जैसे-जैसे यहां विकास होगा, धीरे-धीरे चीजें आसान होती जाएंगी. इसके समाधान के लिए नेशनल एजेंडा बनाना होगा. यह तभी हल होगा जब स्ट्रांग लीडरशिप ऐसा चाहेगी.
62 की लड़ाई और अब की परिस्थितियों पर बात करते हुए पूर्व सेनाध्यक्ष ने कहा कि मैंने अपने कार्यकाल में वेस्टर्न बॉर्डर से अपना फोकस चीन पर किया. इस्टर्न लद्दाख में इंजीनियर गए, नॉर्थ सिक्किम में भी कुछ कदम उठाए गए. पाकिस्तान अगर पंगा लेता है तो उसे हमने बता दिया है कि हम पलटवार करेंगे. हमने अपनी राजनीतिक दृढ़शक्ति भी दिखा दी है. चीन के मामले में हमें अभी इंफ्रास्ट्रक्चर और मजबूत करना है. अपने कंबैट पार्ट को तैयार करना है. वैमनस्य क्यों पैदा हुआ, इस बात पर विचार करें तो जब हमने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू की तो चीन ने सब देखा. पाकिस्तान के फ्रंट पर हमारी सेना विषम परिस्थितियों में भी लगातार डटी रहती है. वहां एक ऐसा युद्धाभ्यास लगातार चलता रहता है जो हमारी सेना को मजबूत करता है. आज हमारा एक सिपाही अन्य देशों के 10 सिपाहियों के बराबर है.
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भारतीय सेना की तारीफ करते हुए पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल (रि.) बिक्रम सिंह चीन जानता है कि हमारी मिलिट्री लीडरशिप काफी मजबूत है. सेना में कोई ऐसा अफसर या ऐसा जवान नहीं है जिसने वॉर प्रेक्टिस में हिस्सा न लिया हो. यूएन में हमेशा भारतीय सेना की मांग की जाती है क्योंकि यह ऐसी सेना है जिसने प्रॉक्सी वॉर के जरिए निडरता और जीत का स्वाद चख रखा है.
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