रणबीर हैं हिंदी सिनेमा के 'युवराज' | रणबीर की पार्टी में दीपिका इस दौर के सबसे कामयाब नायकों की फेहरिस्त में नाम दर्ज करा चुके, कपूर परिवार की चौथी पीढ़ी के वारिस रणबीर कपूर ने दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा के साथ रोमांस को लेकर खासी सुर्खियां बटोरीं. पर उससे ज्यादा वे इस सवाल को लेकर चर्चा में रहे कि अपने दादाजी के बैनर आर.के. को पुनर्जीवित करने के अपने इरादे को वे यकीन में कब बदलने जा रहे हैं.
मामू की राह चले इमरान खान | इमरान की पार्टी आमिर खान के भांजे इमरान खान का इरादा हीरो बनने का नहीं बल्कि निर्देशक बनने का था. वे ऐसी फिल्में करने में यकीन करते हैं जो उन्हें खुद को देखने पर अच्छी लगें. वे अपने मामू आमिर खान की इस बात में यकीन करते हैं ''फिल्म में काम करते समय आपको निर्देशक को पूरा सपोर्ट करना चाहिए क्योंकि वही एक ऐसा शख्स होता है, जिसका साथ कोई नहीं देता.''
प्रतीक के ताजगी भरे चेहरे के कई मुरीद प्रतीक बब्बर की दिली इच्छा क्रिकेटर बनने की थी लेकिन घूमने-फिरने का ऐसा शौक चढ़ा कि ख्वाब सच न कर सके और फिल्मों का रुख किया. वे आमिर खान, प्रकाश झा और संजय लीला भंसाली के बड़े बैनरों के तले फिल्मों में काम कर चुके हैं. उनकी आंखें भावों से भरपूर हैं और सामने वाले को निहत्था कर देने वाली उनकी मुस्कान उन्हें औरों से अलग करती है. वे एक ऐसा चेहरा हैं जो बॉलीवुड में कॉलेज के लड़के की भूमिका निभाने वाले नायक की कमी को पूरा करता है.
नील नितिन मुकेश के करियर की थ्रिलर शुरुआत इसे इत्तेफाक कहें या उनका चयन, नील नितिन मुकेश ने बॉलीवुड में अपना कॅरियर शुरू करने के लिए थ्रिलर को चुना. वे कॉमर्स ग्रेजुएट हैं और नायक बनने से पहले एक्सट्रा के तौर पर काम कर चुके हैं. उन्होंने चार साल बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर भी काम किया है.
रणवीर ने बचपन के शौक को बनाया करियर रणवीर सिंह की बचपन से ही अभिनेता बनने की ख्वाहिश थी. तभी तो वे छोटी उम्र में भी बेखौफ होकर खुद को व्यक्त कर देते या दादी के कहने पर जन्मदिन की पार्टी में जमकर नाच दिखा देते. उन्हें टेलीविजन देखने का शौक था और इसने उनके फिल्म इंडस्ट्री में आने के ख्वाब को और पुख्ता किया. मुबंई के रहने वाले इस नए अभिनेता ने बैंड बाजा बारात में दिल्ली के बिट्टू शर्मा के किरदार में घुसकर ऐसा रंग जमाया कि कोई भरोसा ही नहीं कर सका कि यह बंदा दिल्ली का नहीं है.
राजकुमार में है आम आदमी की झलक आपको पता है, दिवाकर बनर्जी की फिल्म एलएसडी (लव सेक्स और धोखा) के लिए राजकुमार यादव का तीन बार ऑडिशन हुआ, हर बार पहले खारिज किया गया, फिर बुलाया गया. चौथी बार के बुलावे पर बनर्जी से साफ कहकर आए कि आखिरी बार आए हैं.
अर्जुन सिंह जैसे नेता के परिवार से ताल्लुक रखने वाले अरुणोदय सिंह ने संघर्ष का ही रास्ता अपनाया. वे कछुए और खरगोश की दौड़ के किस्से में यकीन करते हैं. वे कहते हैं, ''मैंने छोटी शुरुआत की और आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ा.'' पहली फिल्म सिकंदर बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, लेकिन उन्हें आत्मविश्वास मिला.
मनमौजी है दीपक डोबरियाल का अंदाज अक्सर खाली समय मिलने पर दीपक डोबरियाल की दादी, चाची और अन्य महिलाएं उन्हें घेर कर बैठ जाती थीं, क्योंकि वे अपने किस्सों से उन्हें खूब हंसाते थे. उनके पिता चाहते थे कि वे सरकारी नौकरी करें लेकिन उनका मन रंगमंच में रमता था.
सोनाक्षी सिन्हा के घर में फिल्मों पर बातें करने की मनाही है. देर रात तक उन्हें घर से बाहर रहने की इजाजत नहीं मिलती. दबंग की बेशुमार कामयाबी के बाद भी सोनाक्षी सिन्हा को कहीं जाना होता है तो उन्हें अपनी मम्मी के साथ की जरूरत होती है. सोनाक्षी भी इन सबका निर्वाह करने को अपनी जिम्मेदारी मानती हैं. वे फिल्मी कॅरिअर और निजी जिंदगी के बीच संतुलन बनाए रखने के पक्ष में हैं.
सोनमः विरासत में अभिनय | सेक्सी सोनम अस्सी किलो की सोनम कपूर पहली दफा संजय लीला भंसाली के पास काम करने पहुंचीं तो वे हिल गए. इसरार के बाद दस दिनों में ही उन्होंने पांच किलो वजन घटाया और भंसाली की टीम का हिस्सा बनीं. कभी पिज्जा और कोल्डड्रिंक में डूबी रहने वाली, अनिल कपूर की बिटिया देखते-देखते प्रमुख अभिनेत्रियों की जमात में आ मिली.
अनुष्का है बॉलीवुड की बिंदास बाला अनुष्का शर्मा के माता-पिता उत्तराखंड के देहरादून से हैं, लेकिन उनका जन्म बंगलुरू में हुआ है और वहीं शिक्षा भी ली है. लेकिन मॉडलिंग के चलते उन्हें मुंबई आना पड़ा. जब वे रब ने बना दी जोड़ी की सीधी-सादी गृहिणी तानी से बदमाश कंपनी की ग्लैमरस बुलबल बनीं तो सब देखते रह गए.
थिएटर को अभिन्न हिस्सा मानती है कल्कि किसी भी फिल्म का चयन करने से पहले कल्कि कोचलीन फिल्म की पटकथा पढ़ती हैं और उसके बाद ही निर्माता या निर्देशक का नाम उनकी वरीयता रहता है. उनकी कोशिश स्टीरियोटाइप किरदारों से बचने की है. फिल्मों में आने से पहले उन्होंने कई कार्यशालाओं में हिस्सा लिया जिनमें रजत कपूर और अनामिका हक्सर जैसे जाने-माने नाम थे.
बॉलीवुड पर छाने को तैयार है प्राची देसाई एक पार्टी में सीरियल क्वीन एकता कपूर की मुलाकात प्राची देसाई से हुई तो उन्होंने एक्टिंग में कोई भी दिलचस्पी होने से साफ मना कर दिया. उनका मकसद उस वक्त फैशन डिजाइनिंग था. महीने भर बाद बालाजी के दफ्तर में लंच पर मुलाकात हुई तो कपूर ने उन्हें कैमरे के आगे एक्टिंग 'न करने' को राजी कर लिया.
माही गिल है गजब की 'पारो' | हॉट माही गिल माही गिल अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवन को किसी फिल्म से कम नहीं मानतीं. थिएटर में पोस्ट ग्रेजुएट माही ने पंजाबी फिल्म हवाएं के साथ फिल्मों में कदम रखा. उनकी कोशिश हमेशा से कुछ हटकर और मजबूत किरदार चुनने की रही है. वे कहती हैं, ''मैं स्क्रीन पर बोल्ड इसलिए नजर आती हूं क्योंकि वह स्क्रिप्ट की मांग रहती है, न कि सुर्खियां बटोरने के लिए.''
जब 1992-93 में इंडस्ट्री खराब दौर से गुजर रही थी, उस समय अभिनव देव ने विज्ञापन की दुनिया में कदम रखने का फैसला लिया. यही कोई 450 विज्ञापन फिल्में बनाईं. बॉलीवुड में देहली बेली जैसी बोल्ड फिल्म से धमाकेदार आगाज किया. वे आर्किटेक्ट हैं और विज्ञापन की दुनिया का कोई ऐसा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार नहीं है, जो उन्हें न मिला हो. पर अब उनकी प्राथमिकता?
कंप्यूटर का मॉनिटर जब बहुत छोटा लगने लगा तो इस इंजीनियर ने रुपहले परदे का रुख किया. तनु वेड्स मनु के रूप में एक साफ-सुथरी कामयाब पारिवारिक फिल्म बनाकर आनंद राय ने कंप्यूटर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में आगे न जाने के अपने फैसले को बिल्कुल सही साबित किया.
दबंग की कहानी लिखने में अभिनव कश्यप साल भर से भी कम वक्त लगा, लेकिन उस स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाने के लिए निर्माता तलाशने में तीन साल से ज्यादा लग गए. एक कॉमन दोस्त के साथ अरबाज़ खान से मिलने से पहले तीन निर्माता उनकी कहानी को सत्तर के दशक की कहानी बताकर खारिज कर चुके थे.
जब देहरादून के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में कोई बड़ी फिल्म लगती थी तो टिकट के लिए अली अब्बास जाफर को मारामारी तक करनी पड़ती थी. देहरादून के उसी दौर ने जाफर की आंखों को फिल्मों की दुनिया का पहला सपना दिखाया. पढ़ने दिल्ली गए तो भी सपना किसी कोने में बसा रहा. पिछले महीने कमोबेश वैसा ही दृश्य उनकी फिल्म मेरे ब्रदर की दुल्हन के लिए बना.
जिस कहानी को राजकुमार गुप्ता कहना चाहते हैं, निर्देशन के दौरान उसे हू-ब-हू पेश करने के लिए एकदम जुनूनी रहते हैं. उन्हें ग्रेजुएशन तक इस बात का एहसास ही नहीं था कि उनका भविष्य फिल्म इंडस्ट्री में होगा. उन्हें ड्रामा को हकीकत और रियलिटी को ड्रामेटाइज करके पेश करने का गजब का कौशल आता है, जिसकी झलक आमिर और नो वन किल्ड जेसिका में बखूबी मिल जाती है.
तनु वेड्स मनु के एक गाने में पोस्ता, कलौंजी और मर्तबान जैसे शब्दों ने बड़े-बड़ों का कान इस ओर खींच लिया था. ऐसे में इसके रचयिता को चर्चा में आना ही था.
इमोशनल अत्याचार, ऐंवइ-ऐंवइ, कैरेक्टर ढीला, भाग-भाग डीके बोस...गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य एक आंधी की तरह नुमायां हुए हैं.
जब आसपास पहले से ही स्थापित संगीतकार बेहतर कर रहे हों तो ऐसे में किसी नए मौसिकीकार के लिए जगह बनाना मुश्किल होता है. उन्होंने कलयुग फिल्म में डिंगल सांग से शुरुआत की. और फिर पूरी फिल्में करने लगे.
कहते हैं ना कि बड़ा सोचना और दूर की सोचना हमेशा अच्छा होता है. और अमित त्रिवेदी ने यही किया. देव डी के इमोशनल अत्याचार जैसी असाधारण किस्म की धुन से लेकर आयशा की नरम-नाजुक मेलोडी तक उन्होंने हर तरह का संगीत रचा.
उनका संगीत कुछ हट के है. वह इसलिए क्योंकि संगीत उनके खून में है और वे हमेशा अलग ढंग से सोचना पसंद करती हैं. लव सेक्स और धोखा, ओए लकी लकी ओए और भेजा फ्राइ-2 में उनके काम ने सिनेमा के लोगों को फिल्म उद्योग की इस अकेली महिला संगीत निर्देशक के बारे में बैठकर सोचने को मजबूर कर दिया.
बचपन में वे हमेशा संगीत सुनने में लगे रहते थे और उन्होंने 8 साल तक कर्नाटक संगीत सीखा. उन्होंने 10 वर्ष की उम्र से ही गीत बनाने शुरू कर दिए थे और 12 वर्ष की उम्र में उनकी पोटली में 50 गीत तैयार थे.
बारह वर्ष की उम्र में उन्होंने एकाएक पाया कि वे आसानी से प्रमुख वाद्य यंत्रों पर लोकप्रिय धुनें बजा सकते हैं.
पटकथा लेखक संजय चौहान की कहानी दूसरों से कई मायनों में अलग है और दिलचस्प भी. 2000 में मुंबई पहुंचे और दस दिन बाद इंसाफ सीरियल उनके हाथ में था. 2003 में ओम पुरी और रेवती अभिनीत, उनकी लिखी पहली फिल्म आई और चर्चित हुई.
फिल्म शैतान के साथ उन्होंने बॉलीवुड में बतौर निर्देशक अपनी पारी शुरू की है. खास यह कि उनकी इस फिल्म को बॉलीवुड में कोई प्रोड्यूस करना नहीं चाहता था. लेकिन अनुराग कश्यप ने इस समस्या का हल निकाला.
भारतीय युवाओं को अपनी भाषा और शब्दों की बाजीगरी से उन्होंने ऐसा आकर्षित किया कि वे फिल्म इंडस्ट्री का एक हॉट नाम बन गए. दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए करने वाले अक्षत दिल्ली के ही रहने वाले हैं.
उनकी बतौर पटकथा लेखिका पहली फिल्म फना थी, जिसे दर्शकों ने बेहद पसंद किया. उन्होंने इस फिल्म का पहला ड्राफ्ट लिखने में महज तीन हफ्ते का समय लिया था.
एक ईमानदार जिद ने उनसे मनु और तनु जैसे किरदार लिखवाए. ''राज, राहुल, सिमरन और कैफे कॉफी डे संस्कृति के किरदारों में छोटे शहरों-कस्बों के लोग खो गए थे.
वे पांच साल की उम्र से गा रही हैं. नई दिल्ली के स्प्रिंगडेल्स स्कूल की यह छात्रा टीवीएस सा रे गा मा कार्यक्रम की विजेता रही है.
आंतरिक आक्रोश को महसूस कर उसे फिल्म ताल के गीत नी मैं समझ गई और सिंघम के मौला-मौला में जिस तरह ऋचा ने स्वर दिया है, अब तक ऐसा चुनिंदा गायक ही कर पाए हैं.
बेहद खूबसूरत आवाज की मलिका शिल्पा राव अपने पहले गीत फिल्म अनवर के तोसे नैना लागे रे से ही लोगों के दिलोदिमाग पर छा गई थीं.
इसे ही कहते हैं प्रतिभा कूट-कूट कर भरी होना. वे न केवल एक अच्छी गायिका हैं बल्कि गीतकार, नर्तकी और टीवी कार्यक्रम की बढ़िया मेजबान भी हैं. 2002 में वे चैनल वी के टैलेंट शो की पांच विजेताओं में से एक थीं.
उन्होंने बॉलीवुड में अपनी उपस्थिति रंग दे बसंती के यूथफुल ट्रैक ऐ साला! के साथ दर्ज कराई. मुंबई का रहने वाला यह युवा गायक अपनी गायकी के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के राष्ट्रीय पुरस्कार और बॉलीवुड में कदम रखने के पहले ही साल में फिल्मफेयर पुरस्कार जीत चुका है.
हालांकि अपना कॅरियर उन्होंने करीब एक दशक पहले शुरू किया लेकिन ख्याति उन्हें 2007 में जोरदार पंजाबी गाने नगाड़ा बजा से मिली. जब वी मेट फिल्म के लिए इसे गाया था उन्होंने. जी ये जावेद अली हैं.
उन्होंने अपनी ताजगी और एहसास से लबरेज आवाज में 2009 में वेक अप सिड में गूंजा-सा कोई इकतारा गाकर सबको सम्मोहित कर लिया. इस गीत ने देश के करोड़ों लोगों के दिलों को छुआ और शीर्ष गीतों की सूची में अपनी जगह तो बनाई ही, उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार भी दिलवाया.