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Film Review: सोचने पर विवश करती है 'मार्गरिटा विद अ स्ट्रॉ'

साल 2005 में फिल्म 'अमु' आई थी जिसमें अभिनेत्री कोंकणा सेन के बेहतरीन अभिनय को रुपहले परदे पर फिल्माया था डायरेक्टर शोनाली बोस ने और अब 10 साल बाद एक बार फिर से अलग-अलग फिल्म समारोहों में सराही जाने वाली फिल्म 'मार्गरिटा विद अ स्ट्रॉ ' लेकर आई हैं शोनाली बोस.

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फिल्म का नाम: मार्गरिटा विद अ स्ट्रॉ
डायरेक्टर: शोनाली बोस
स्टार कास्ट: कल्कि कोचलीन, रेवती, सयानी गुप्ता
अवधि:  101.52 मिनट
सर्टिफिकेट: A
रेटिंग: 3 स्टार

साल 2005 में फिल्म 'अमु' आई थी जिसमें अभिनेत्री कोंकणा सेन के बेहतरीन अभिनय को रुपहले परदे पर फिल्माया था डायरेक्टर शोनाली बोस ने और अब 10 साल बाद एक बार फिर से अलग-अलग फिल्म समारोहों में सराही जाने वाली फिल्म 'मार्गरिटा विद अ स्ट्रॉ' लेकर आई हैं शोनाली बोस. आइये जानते हैं क्या है इस फिल्म की कहानी:

लैला (कल्कि कोचलीन ) एक मस्तिष्क पक्षाघात (Cerebral Palsy) की शिकार लड़की है जो व्हीलचेयर पर चलती है और जिसकी जिंदगी घर, कॉलेज और फ्रेंड्स के साथ गुजरती है. घर में भाई मोनू, पापा और मां (रेवती) रहते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली लैला को गाने लिखने का शौक है. लैला की कॉलेज के ही ध्रुव और नीमा से करीबी दोस्ती है लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए जब लैला का एडमिशन न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी हो जाता है तो उसे पाकिस्तान मूल की युवा लड़की खानुम (सयानी गुप्ता) से इश्क होने लगता है. समलैंगिग संबंधों के साथ-साथ पारिवारिक रिश्ते कैसे आगे बढ़ते जाते हैं इसी पर प्रकाश डालती है फिल्म 'मार्गरिटा विद अ स्ट्रॉ'.

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निर्देशक शोनाली बोस ने अपनी फिल्म के जरिए एक ही वक्त में कई कहानियां कहने की कोशिश की है. जहां एक तरफ मस्तिष्क पक्षाघात (Cerebral Palsy) की बीमारी से जूझती लैला है, तो वहीं हर पल खुशमिजाजी दर्शाता उसका परिवार है. लैला के पिताजी पंजाबी सिंगर सुखबीर के गानो के कायल हैं तो मां पूरे घर का ख्याल रखने के साथ-साथ बाहर का काम भी संभालती हैं.

कल्कि कोचलीन ने अपने एक्टिंग करियर की सबसे अच्छी फिल्म की है जिसमें अभिनय का स्तर अव्वल है. व्हीलचेयर पर बैठे हुए किस तरह से संवादों को बोलना है और किस वक्त क्या भाव आना है वो काबिल-ए-तारीफ है. वहीं युवा एक्टर के रूप में सयानी गुप्ता ने भी काफी नेचुरल एक्ट किया है खास तौर से जब कल्कि के साथ इंटिमेट सीन को फिल्माया जाता है.

शोनाली बोस ने एक इमोशनल फिल्म तो बनाई है लेकिन पूरी फिल्म के दौरान कभी भी भावुकता नहीं आती. अलग-अलग मुद्दे एक ही वक्त पर चलते रहते हैं और जिस पल आप थोड़ा भी भावुक होने की तरफ अग्रसित होते हैं उसी पल अगली कहानी शुरू हो जाती है. वहीं फिल्म का नाम तो काफी दिलचस्प है लेकिन कहानी के हिसाब से हिंदी में बेहतर और आकर्षक नाम हो सकता था जिससे की आम दर्शक भी खींचे चले आते.

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इस हफ्ते कल्कि की बेहतरीन अदाकारी के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है.

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