पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर निर्वाचन आयोग (ECI) और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच विवाद तेज हो गया है. यह मामला अब अदालत तक पहुंचने की कगार पर है. निर्वाचन आयोग ने टीएमसी की उस मांग को खारिज कर दिया है, जिसमें पार्टी के बूथ स्तरीय एजेंटों (BLA) को मतदाता सूची के मसौदे पर दावों और आपत्तियों की सुनवाई सत्रों में भाग लेने की अनुमति देने की अपील की गई थी.
राज्य में तीन चरणों वाली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का पहला चरण पूरा हो चुका है. घर-घर सर्वे, फॉर्म वितरण, फॉर्म भरवाने और डिजिटल एंट्री के बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की जा चुकी है. अब दूसरा चरण दावों और आपत्तियों की सुनवाई पर केंद्रित है, जो 15 जनवरी 2026 तक चलेगा. निर्वाचन आयोग के सूत्रों के अनुसार, यदि टीएमसी की मांग मान ली जाती, तो अन्य सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (छह राष्ट्रीय और दो राज्य स्तरीय दल) की समान मांगें भी स्वीकार करनी पड़तीं.
यह भी पढ़ें: टिकट चयन में सख्ती... बंगाल में बीजेपी का फोकस बूथ स्ट्रेंथ पर, सितारों को तरजीह नहीं
इससे प्रत्येक सुनवाई में कम से कम 11 अतिरिक्त व्यक्ति उपस्थित होते, जिसमें दावेदार, उसके सहायक और कम से कम आठ दलों के बीएलए शामिल होते. इसमें चुनावी पंजीकरण अधिकारी (ERO), सहायक ईआरओ, माइक्रो ऑब्जर्वर के अलावा मतदाता और उसके साथी भी होते. ईसीआई सूत्रों का कहना है कि इतनी भीड़ में सुनवाई प्रक्रिया संचालित करना असंभव हो जाता और अलग-अलग एजेंट अपनी-अपनी व्याख्या करते, जिससे अराजकता फैलती. पश्चिम बंगाल में मान्यता प्राप्त राज्य स्तरीय पार्टियां टीएमसी और फॉरवर्ड ब्लॉक हैं, जबकि राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा, कांग्रेस, सीपीआई(एम), आम आदमी पार्टी, बसपा और एनपीपी हैं.
आयोग के इनकार पर टीएमसी ने आरोप लगाया कि यह जानबूझकर किया गया, क्योंकि अन्य दलों, खासकर भाजपा के पास सभी सुनवाई टेबलों के लिए पर्याप्त बीएलए नहीं हैं. टीएमसी ने कहा कि भाजपा के पास तो उम्मीदवार उतारने लायक कार्यकर्ता भी नहीं हैं. आयोग के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि वे किसी पार्टी की कथित ताकत या कमजोरी की कल्पना पर फैसले नहीं ले सकते. सभी दलों के लिए समान नियम लागू करने होते हैं, जो व्यावहारिक और उपयोगी हों.
यह भी पढ़ें: 17 दिन में सिर्फ 8 अपील... पश्चिम बंगाल में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर EC के आंकड़ों ने चौंकाया
चुनाव आयोग ने कहा कि सुनवाई में दस्तावेजों के जांच और सवाल-जवाब होते हैं, जिसमें बीएलए की कोई राजनीतिक भूमिका नहीं है. इसलिए सभी दलों के बीएलए को अनुमति न देना तर्कसंगत है, ताकि प्रक्रिया बिना बाधा के पूरी हो. टीएमसी आयोग के इस फैसले को 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की पारदर्शिता का मुद्दा बता रही है, जबकि आयोग इसे प्रक्रिया की सुचारूता के लिए जरूरी कदम मानता है.