भारत की थल सेना, एयरफोर्स और नेवी साथ मिलकर देश की सुरक्षा में तैनात रहती हैं. सभी सेनाओं का काम करने का तरीका और किसी भी ऑपरेशन को अंजाम देने का तरीका अलग-अलग होता है. ऐसे ही एयरफोर्स के पायलट और नेवी के पायलट का काम करने का तरीका अलग होता है. आइए आपको बताते हैं कि कैसे एयरफोर्स और नेवी के पायलट का काम अलग-अलग होता है...
ट्रेनिंग- वायु सेना और नेवी के पायलट की ट्रेनिंग अलग होती है. मिशन और ऑपरेशन में अंतर होने की वजह से उन्हें उनके मिशन के आधार पर तैयार किया जाता है. दरअसल नौसेना के पायलट आमतौर पर मिशन के लिए तेज रिएक्ट करते हैं क्योंकि उनकी पोस्टिंग विमान वाहक पर होती है और वहां के आस-पास के क्षेत्र में ही उन्हें ऑपरेशन को अंजाम देना होता है. वहीं वायु सेना के पायलट अपने रिजन के एयर बेस में तैनात रहते हैं और उन्हें एक्शन लेने में टाइम लगता है. इसलिए उन्हें उस स्थिति के लिए ट्रेनिंग दी जाती है.
साथ ही नेवी पायलट को विमान वाहक से लैंडिंग और टेकऑफ को अंजाम देना होता है. कहा जाता है कि किसी बड़ी खाली जमीन में प्लेन को लैंड करवाने से ज्यादा मुश्किल विमान वाहक पर करना है. इसलिए कई मायनों में नेवी पायलट का काम मुश्किल हो जाता है. इसके लिए उन्हें उसके हिसाब से ट्रेनिंग दी जाती है.
एयरक्राफ्ट साइज- बता दें कि एयर फोर्स और नेवी के प्लेन के साइज में काफी अंतर होता है. नेवी के पायलट विमान वाहक के डेक पर टेकऑफ और लैंडिंग के लिए छोटे विमानों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, जबकि वायु सेना के पायलट बड़े विमान से ऑपरेशन को अंजाम देते हैं. साथ ही एयरफोर्स के प्लेन ज्यादा हथियार सामग्री ले जाने में सक्षम होते हैं. साथ ही नेवी में हेलीकॉप्टर का भी ज्यादा इस्तेमाल होता है. कई प्लेन को नेवी के आधार पर अलग से मोडिफाई किया जाता है.
पायलट विंग्स- एयरफोर्स पायलट हो या नेवी पायलट उन्हें एक बार प्लेन उड़ाने की इजाजत मिलने के बाद बैज के रूप में विंग्स दिए जाते हैं. यह विंग्स सेना की अलग-अलग शाखाओं के आधार पर होते हैं. एयरफोर्स पायलट को सिल्वर और नेवी के पायलट को गोल्ड विंग्स दिए जाते हैं.
वहीं जब उम्मीदवारों का चयन नेवी या एयरफोर्स के लिए होता है, तो उन्हें ट्रेनिंग से पहले अलग-अलग कोर्स का चयन करना होता है. इसमें नेवी और एयरफोर्स के पायलट के लिए अलग अलग मिशन के हिसाब से इन्हें तैयार किया जाता है. इस फील्ड में एविएशन, रडार आदि शामिल है.