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एजुकेशन न्यूज़

मेंस्ट्रुअल कप: चलन में क्यों नहीं आ पा रहा सेनेटरी पैड का ये ऑप्शन

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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पीरियड्स के दिनों को आसान बनाने के लिए मेडिकल साइंस लंबे समय से कई प्रयोग कर रहा है. इसी दिशा में सेनेटरी पैड और टैंपून्स के अलावा मेन्स्ट्रुअल कप काफी प्रचलित हो रहे हैं. ये पीरियड्स के दौरान इस्तेमाल करने के लिए अच्छा व‍िकल्प माने जाने लगे हैं. लेकिन अभी इनके इस्तेमाल करने को लेकर कई तरह की भ्रांतियां भी हैं, आइए जानते हैं कि इस बारे में डॉक्टर क्या कहते हैं. 

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आगरा मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और महिला व प्रसूत‍ि रोग विशेषज्ञ डॉ निध‍ि का कहना है कि ये एक सेनेटरी पैड का बेहतर विकल्प बनकर सामने है. कई महिलाओं को पैड में यूज होने वाले मैटेरियल से एलर्जी की श‍िकायतें आती हैं. लेकिन मेंस्ट्रुअल कप के इस्तेमाल ने पीरियड्स के कठ‍िन दिनों को काफी आसान बनाया है, साथ ही सेनेटरी पैड से उत्पन्न होने वाले वेस्ट मैट‍िरियल के खतरों को भी ये कम कर सकता है. डॉ निध‍ि कहती हैं कि भले ही शहरी महिलाओं में मेन्स्ट्रुअल कप का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है फिर भी इसे लेकर जागरुकता की बहुत कमी है. 

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मेंस्ट्रुअल कप से पहले टैंम्पून भी एक विकल्प के तौर पर सामने आया था, लेकिन वो कप से बिल्कुल अलग है. डॉ निध‍ि कहती हैं कि मेंस्ट्रुअल कप रीयूजेबल होते हैं. लेकिन इनका इस्तेमाल बहुत सावधानीपूर्वक और प्रॉपर गाइडेंस के बाद ही किया जाना चाहिए. वर्जिन लड़कियों के लिए इसका इस्तेमाल काफी कठ‍िन होता है. इसे पीरियड्स के दौरान कप के वजाइनल पार्ट में इस्तेमाल करते हैं. ये वजाइना में अच्छे से फिट हो जाते हैं फिर इन्हें दोबारा भी इस्तेमाल किया जा सकता है. 

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डॉ निध‍ि कहती हैं कि मेंस्ट्रुअल कप अभी भी आम चलन में नहीं आए हैं. इसके लिए बहुत काउंसिलिंग की जरूरत होती है. डॉ निध‍ि अपने अनुभव बताती हैं कि उन्होंने साल 2017 में  FOGSI (The Federation of Obstetric and Gynaecological Societies of India) के साथ मिलकर एक ड्राइव चलाई थी, जिसमें उन्हें उत्साहजनक प्रत‍िक्र‍िया नहीं मिली. उन्होंने कहा कि लोगों को लगता है कि इसे हटाकर धोकर फिर से यूज करना बहुत सुविधाजनक नहीं लगता. 

 

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इसके अलावा जिन लोगों को माहवारी के दौरान तीव्र रक्तश्राव (heavy bleeding) होती है, उन्हें भी इसके इस्तेमाल में समस्या आती है. उन्होंने कहा कि मेंस्ट्रुअल कप की उस ड्राइव के दौरान मिले अनुभवों से ये भी स्पष्ट था कि भारत में अभी भी कोई भी चीज वजाइना में रखकर इस्तेमाल करना गंदा माना जाता है. इसे लेकर महिलाओं में एक अलग तरह का टैबू है, जिसके कारण भी इसका इस्तेमाल अभी तेजी से नहीं बढ़ा है. 

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इसके अलावा साल 2019 में द लैंसेट जर्नल में प्रकाश‍ित एक अध्ययन में सामने आया कि इसके इस्तेमाल में सबसे बड़ी समस्या इसे फिट करने और फिर निकालने की है. इस पर कुल 43 अध्ययन किए गए जिनमें 3300 अमीर और गरीब लड़किय़ां व महिलाएं शामिल थीं. महिलाओं का कहना था कि इसे लगाना असहज तो होता ही है साथ ही दर्द भी होता है. कई महिलाओं ने लीकेज और त्वचा से रगड़ने की दिक्कत भी बताई. हालांकि बड़ी संख्या में महिलाओं ने इसे सुविधाजनक भी पाया. 

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क्या होते हैं मेंस्ट्रुअल कप, कैसे होता है इस्तेमाल 

बता दें कि मेन्स्ट्रुअल कप मुलायम और लचीले मटीरियल जैसे रबड़ या सिलिकॉन से बने होते हैं. इसे पीरियड्स के दिनों में वजाइना में फिट करने के बाद ब्लड बाहर नहीं आता. इसमें सैनेटरी पैड के मुकाबले ज्यादा ब्लड सहेजने की क्षमता होती है. इसे नियमित अंतराल पर खाली करने और सेनेटाइज्ड ढंग से साफ करने की जरूरत होती है. इसमें दो आकार आते हैं, एक घंटी का आकार जिसे वजाइना में नीचे की तरफ लगाते हैं और दूसरा सरविकल कप जो थोड़ा ऊपर की तरफ फिट करना होता है.

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विशेषज्ञ महिलाओं को अपने मुताबिक सही आकार का कप चुनने की सलाह देती हैं. फिर नये कप को निकालकर मोड़ने के बाद वजाइना में डाला जाता है, अंदर जाकर ये खुल जाता और आसपास की जगह को कवर कर लेता है जिससे लीकेज न हो. फिर ठीक ऐसे ही दबाते हुए नीचे की तरफ निकाला जाता है फिर इसमें जमा खून को खाली करके इसे साफ करके दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं. 

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अगर कीमत की बात करें तो ये सेनेटरी पैड से थोड़े महंगे होते हैं. इसमें एक मेन्स्ट्रुअल कप की कीमत 1200 से अध‍िक होती है, लेकिन इनका बार इस्तेमाल हो सकता है इसलिए ये बहुत महंगे नहीं पड़ते. विशेषज्ञों के अनुसार एक मेंस्ट्रुअल कप का इस्तेमाल करीब दस साल तक हो सकता है. अगर इसका चलन बढ़ जाए तो पर्यावरण के लिहाज से इसे बेहतर विकल्प के तौर पर माना जा रहा है.