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वो कौन से हिंदू राजा हैं, जिनका सिक्का भारत के बाहर भी चला करता था

भारत में मुगलों से पहले कई ऐसे हिंदू राजा हुए हैं, जिनका साम्राज्य काफी शक्तिशाली था. इनके जमाने में दूसरे देशों तक भारत की सीमा फैली हुई थी. जहां भारत के राजाओं का राज नहीं भी था, वहां इनके नाम के सिक्के चलते थे. क्योंकि, तब यहां के साम्राज्य काफी शक्तिशाली थे और दूसरे देशों के साथ इनके कारोबारी रिश्ते काफी मजबूत थे. इसलिए भारत की मुद्रा वहां काफी मजबूत मानी जाती थी और डिमांड में रहती थी.

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भारत के हिंदू सम्राटों के सिक्के का विदेशों में भी था जलवा (Photo - Pexels)
भारत के हिंदू सम्राटों के सिक्के का विदेशों में भी था जलवा (Photo - Pexels)

भारतीय इतिहास में कई ऐसे राजवंश और राजा हुए, जिनका साम्राज्य आधुनिक समय के सीमाओं के परे था. यानी इन हिंदू राजा का प्रभुत्व पाकिस्तान, अफगानिस्तान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका जैसे देशों तक फैला था. जिन देशों में भारतीय सम्राटों का शासन नहीं भी था, वहां भी भारत का प्रभाव काफी मजबूत था. क्योंकि, भारत के साथ व्यापार करना दूसरे देश सम्मान की बात समझते थे. यही वजह है कि भारतीय मुद्रा की दूसरे देशों में उस वक्त काफी मांग थी और ये काफी मजबूत थी.

उत्तर से लेकर दक्षिण तक कई ऐसे हिंदू राजा हुए, जिनका सिक्का आधुनिक भारत से बाहर भी चलता था. कुछ देशों में तो यह वहां के स्थानीय मुद्रा से भी ज्यादा लोकप्रिय था. समुद्रगुप्त के जमाने में सोने के सिक्के चलते थे, जो इस साम्राज्य के वैभव को दर्शाते थे और दूसरे देशों में भी एक समान रूप से इनका दबदबा था. कई ऐतिहासिक खोज में इनके प्रमाण मिले हैं. वैश्विक व्यापार में समुद्रगुप्त के सोने के सिक्कों की चलती थी. 

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्रगुप्त के जमाने की आर्थिक संपन्नता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने राज्य में सिर्फ सोने के सिक्के चलवाए और सिक्कों में चांदी का इस्तेमाल कभी नहीं किया. राधाकुमुद मुखर्जी लिखते हैं कि समुद्रगुप्त ने आठ तरह के सिक्के ढलवाए. अपने सिक्कों के लिए सोना उसे अपनी विजय अभियानों के दौरान मिला. समुद्रगुप्त के जमाने में रोमन, ससेशियन, पर्शियन जैसे विदेशी साम्राज्यों के साथ कारोबार था. इस वजह से भारत के सिक्के वहां तक पहुंच चुके थे और वहां काफी डिमांड रहती थी.

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इसी तरह भारत के विजयनगर साम्राज्य के हिंदू राजा का सिक्के का भी भारत के बाहर काफी प्रभाव था.  आरबीआई के मुताबिक, दक्षिण में, दिल्ली सल्तनत और मुगलों के समकालीन विजयनगर राजवंश, एक ऐसा साम्राज्य था जिसकी मुद्रा मानकीकृत मुद्रा का एक दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करती है.जिसने बाद में यूरोपीय और अंग्रेजी व्यापारिक कंपनियों के लिए एक आदर्श का काम किया. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना लगभग 1336 ईस्वी में हरिहर और बुक्का द्वारा कृष्णा नदी के दक्षिण में की गई थी. विजयनगर काल में यूरोपीय व्यापारियों, विशेषकर पुर्तगालियों का आगमन हुआ.

आरबीआई

इस साम्राज्य कृष्णदेवराय ने विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित किया, जिसके कारण मुद्रा का व्यापक इस्तेमाल जरूरी थी. विजयनगर साम्राज्य के सिक्के मुख्य रूप से सोने और तांबे के बने होते थे. विजयनगर के अधिकांश सोने के सिक्कों के एक तरफ पवित्र छवि और दूसरी तरफ राजलेख अंकित होता था. विजयनगर साम्राज्य के महत्वपूर्ण सोने के सिक्कों में तिरुपति के देवता, अर्थात् भगवान वेंकटेश्वर की छवि वाले सिक्के शामिल थे, जिन्हें या तो अकेले या अपनी दो पत्नियों के साथ दर्शाया गया था. विजयनगर साम्राज्य के सिक्के अरब देशों, पुर्तगाल और साउथ -ईस्ट एशियाई देशों में चलते थे. इन सिक्कों ने डच और फ्रांसीसी 'सिंगल स्वामी' पैगोडा और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के 'थ्री स्वामी' पैगोडा को प्रेरित किया.

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भूले राजवंशों का इतिहास बताते हैं सिक्के
इसी तरह सिक्कों के विशेषज्ञ पंकज टंडन ने बलूचिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) में मिले सिक्कों के बारे में बताया है कि वो परातराज नामक राजाओं द्वारा जारी किए गए थे. इन राजाओं ने लगभग अज्ञात परदान राज्य पर शासन किया था. उन्होंने खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण तांबे के सिक्के और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण चांदी के सिक्के जारी किए थे. टंडन ने 11 परातराज शासकों का कालक्रम तैयार किया, जिन्होंने संभवतः 125 से 300 ईस्वी के आसपास शासन किया था.

टंडन कहते हैं कि भारतीय मुद्रा शायद दुनिया की सबसे आकर्षक मुद्रा है. इस पर प्राचीन ग्रीस, रोम, फारस और चीन जैसे बाहरी देशों का प्रभाव दिखता है, और साथ ही 2,500 वर्षों में सिक्कों का स्वदेशी विकास भी हुआ है.  ये प्राचीन भारतीय सिक्के रेशम मार्ग के किनारे स्थित बाज़ारों, पूर्व और पश्चिम को जोड़ने वाले व्यापार मार्ग, विजेताओं और उनकी चलती-फिरती टकसालों, युद्धों और लुप्त हो चुके राज्यों की याद दिलाते हैं. इन सिक्कों पर राजाओं, देवताओं और जानवरों के चित्र बने हैं. इससे पता चलता है कि आज के  पाकिस्तान, अफगानिस्तान और फारस तक भारतीय राजा के सिक्के चलते थे.

आरबीआई

इसी तरह 4 से 9 शताब्दी में आज के तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में फैले पल्लव राजवंश के सोने और तांबे के सिक्के कंबोडिया तक सर्कुलेटेड हुए थे और वहां के खमेर शासकों के सिक्कों पर इनका प्रभाव देखने को मिलता है. इनके बाद के 9वीं से 13वीं शताब्दी तक चोल साम्राज्य के सिक्कों का भी भारत के बाहर दबदबा रहा है. यहां के सिक्कों का श्रीलंका, इंडोनेशिया, थाईलैंड तक प्रभाव था. 

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