scorecardresearch
 

Keynes: वो अर्थशास्त्री जो न होता तो अमेरिका फटेहाल होता, यूरोप कंगाल!

पहले विश्व युद्ध के बाद दुनिया जब महामंदी की चपेट में थी तो अभी रईस दिखने वाले यूरोप के देश भयंकर गरीबी से जूझ रहे थे. इन देशों में कोटे पर मिलने वाले ब्रेड के लिए जनता टूट पड़ती. बाजार दम तोड़ रहा था, उद्योग-धंधे चौपट हो चुके थे. तभी महामंदी के इस दौर में उम्मीदों की रोशनी लेकर आए अर्थशास्त्री कीन्स. उन्होंने दुनिया को खर्च और कमाई की ऐसी थ्योरी बताई कि 1930 से 1970 तक का दौर केन्सियनवाद कहा जाने लगा.

X
जॉन मेनार्ड कीन्स के सिद्धांतों पर चलकर यूरोप-अमेरिका 1929 की महामंदी से उबरे (फाइल फोटो) जॉन मेनार्ड कीन्स के सिद्धांतों पर चलकर यूरोप-अमेरिका 1929 की महामंदी से उबरे (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • महामंदी से दुनिया को निकालने में काम आई कीन्स की थ्योरी
  • कीन्स ने पूंजीवाद को दिया मानवीय चेहरा
  • 1930 से 1970 तक केन्सियनवाद का दौर

वर्ष 1929 खत्म होने वाला था. ये महामंदी का साल था. मंदी की मार से दुनिया के बाजार हांफ रहे थे. मार्केट में मनहूसी, सड़कों पर बेरोजगारों की फौज और बाजार में बिना बिके सामानों की (Unsold item) बेशुमार लिस्ट…तब दुनिया के बाजार कुछ ऐसे ही दिख रहे थे. अमेरिका, ब्रिटेन समेत दुनिया के तमाम देशों में गोदाम माल से भरे हुए थे. लोगों की क्रय शक्ति दयनीय स्तर तक गिर चुकी थी. बाजार में मांग थी ही नहीं. उत्पादन चक्र आगे बढ़ नहीं रहा था तो फिर मालिकों को मजदूरों और स्टाफ की जरूरत क्यों पड़ती? फैक्ट्रियों से बदस्तूर कर्मचारियों को पिंक स्लिप पकड़ाई जा रही थी.

तब यूरोपीय देशों में खाने के लिए ब्रेड की लाइनें ऐसे लगती थीं, मानो ये 20वीं सदी के महाशक्तियों के मुल्क नहीं, बल्कि गरीबी और फटेहाली से जूझ रहे अफ्रीकी देश हों.

अमेरिका में दो करोड़ लोग बेरोजगार थे. बेरोजगारी दर 25 फीसदी हो गई थी. नेशनल इनकम 30 फीसदी घट गई थी. शेयर बाजार क्रैश हो चुका था. अमेरिका और यूरोप ने ऐसी विकट आर्थिक परिस्थिति शायद ही कभी देखी थी. दुनिया की तत्कालीन महाशक्तियों में उथलपुथल मचा देने वाली इस आर्थिक परिघटना को 1929 की महामंदी (The Great Depression) के नाम से जाना जाता है.

महामंदी के दौर में उम्मीद लेकर आए

निराशाओं के इस फलक पर दुनिया की गोते लगाती अर्थव्यवस्थाओं के लिए ब्रिटेन का एक अर्थशास्त्री उम्मीद की किरण बनकर आया. नाम था जॉन मेनार्ड कीन्स (John Maynard Keynes). इसके विचारों ने दुनिया की अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव किए. इसने पूंजीवाद को मानवीय चेहरा दिया. कल्याणकारी राज्य की अवधारणा दी. मार्केट को डिमांड के रूप में ऑक्सीजन मिला और हांफ रहे बाजार धीरे-धीरे बैलेंस बनाने में कामयाब रहे.  ब्रिटेन और अमेरिका के अलावा कई देशों ने इस अर्थशास्त्री के सिद्धांतों पर अमल किया और महामंदी के इस दुष्चक्र से निकलने में कामयाब रहे.

यही नहीं वो कीन्स ही थे जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की अथाह बर्बादी से जूझ रहे देशों को एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान बनाने का विचार दिया. विचारों का यही बीज वर्ष 1946 में वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष बनकर वर्ल्ड इकोनॉमी को संचालित करने लगा.

डॉ मनमोहन सिंह भी हैं मुरीद

आखिर क्या थे राजनीतिक अर्थशास्त्री कीन्स के विचार? कैसे उन्होंने इकोनॉमी के नए नियम तय किए? देश के पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह उनकी चर्चा भारत के संदर्भ में बार-बार क्यों करते थे? कांग्रेस नेता राहुल गांधी जब एक बड़ी आबादी को डायरेक्ट कैश ट्रांसफर की बात करते हैं तो वह कीन्स की किताब से ही आइडिया लेते हैं.

अमेरिका का The Great Crash

1929 की महामंदी से निपटने के लिए कीन्स के फॉर्मूले को समझने से पहले इस महामंदी के चरित्र को समझ लें. प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) को खत्म हुए 11 साल हो रहे थे. दुनिया इसके विनाशकारी प्रभावों से उबर ही रही थी कि अमेरिका में शेयर स्टॉक 4 सितंबर 1929 को भरभराकर गिर पड़ा. 29 अक्टूबर 1929 को अमेरिकी शेयर बाजार ध्वस्त हो गया. इसे The Wall Street Crash of 1929 या The Great Crash कहते हैं. ध्यान दें साल 1929 के इस दिन न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में एक दिन में 1.6 करोड़ शेयरों का लेन-देन हुआ था. इसी के साथ आर्थिक तबाही की ये खबर पूरी दुनिया में फैली. लंदन स्टॉक एक्सचेंज सितंबर में ही क्रैश कर चुका था. इन घटनाओं ने द ग्रेट डिप्रेशन आने की मुनादी कर दी थी.

1932 में न्यूयॉर्क में ब्रेड और कॉफी के लिए लगी लंबी लाइन (फाइल फोटो)

कीन्स का मॉडल समझने से पहले क्लासिक इकोनॉमी और 'अदृश्य हाथ' को समझिए

इससे पहले अर्थशास्त्र के क्लासिक सिद्धांत पर विश्वास करने वाले दुनिया के देश ये मानकर चल रहे थे कि बाजार में एक समय ऐसा आएगा जब ये घोर मंदी अपने आप खत्म हो जाएगी. अर्थशास्त्र का क्लासिक मॉडल कहता है कि बाजार ऑटो करेक्ट करता है. इसमें सरकार को दखल देने की कोई जरूरत नहीं है. अर्थशास्त्र के क्लासिक सिद्धांत पर विश्वास करने वाले देशों का मानना था कि बाजार में वस्तुओं की मांग तब अपने आप पैदा हो जाएगी जब भुगतान की जाने वाली मजदूरी और बाजार में मौजूद श्रम (Labour) में संतुलन स्थापित हो जाएगा. बता दें कि अर्थशास्त्र की क्लासिक थ्योरी के विकास का श्रेय अर्थशास्त्र के पिता कहे जाने वाले एडम स्मिथ और रिकार्डो जैसे अर्थशास्त्रियों को जाता है. इन अर्थशास्त्रियों ने बताया कि बाजार में प्रोड्यूसर, वर्कर और कंज्यूमर तीनों के अपने हित हैं और इन तीनों के हितों का सामंजस्य ही मार्केट को चला रहा है. इनके हित एक दूसरे को बैलेंस करते हैं और मार्केट चलता रहता है. एडम स्मिथ ने यहां अदृश्य हाथ (Invisible hand) की चर्चा की थी और कहा कि यही अदृश्य हाथ बाजार को चला रहा है और यहां हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है.

इकोनॉमी का क्लासिक सिद्धांत बाजार में 100 फीसदी रोजगार का सपना देखता है. इनका मानना है कि प्रोड्यूसर, वर्कर और कंज्यूमर के बीच का चक्र सभी को रोजगार देने में सक्षम है. इस दिशा में कभी कभार विचलन होता भी है तो बाजार इसमें खुद सुधार कर लेता है और संतुलन की स्थिति प्राप्त हो जाती है.

फेल हो गई थी क्लासिक थ्योरी, 25 फीसदी तक पहुंच गई बेरोजगारी

अब हम एक बार फिर से 1929-30 की मंदी की और लौटते हैं. क्लासिक अर्थशास्त्र में भले ही सभी लोगों को रोजगार का लक्ष्य रखा जाता है लेकिन वास्तविकता में तो ऐसा नहीं हुआ. इस मंदी में बेरोजगारी दर 25 फीसदी पहुंच गई थी.

1929 की मंदी के बाद सड़क पर कार की नीलामी करता एक शख्स (फोटो-Getty)

आर्थिक महामंदी के दौरान दुनिया के देश अपने अपने यहां बाजार में इसी संतुलन का इंतजार कर रहे थे ताकि इकोनॉमी पटरी पर आ सके. इसी दौरान केन्स आए और उन्होंने एक ही वाक्य कहकर तहलका मचा दिया, वो ये था था कि In the long run we all are dead. इसका सीधा सा मतलब था कि बाजार में जब तक ये स्थिति आएगी, बाजार जब तक खुद को सुधारेगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.

नोटबंदी की आलोचना करते हुए मनमोहन ने मोदी को यही लाइन कही थी

यूरोप और अमेरिका के बाजार से एक बार फिर भारत की राजनीति में लौटते हैं. साल 2016 में जब नोटबंदी पर राज्यसभा में बहस हो रही थी तो पूर्व पीएम डॉ मनमोहन सिंह ने मोदी सरकार को खरी खरी सुनाते हुए अर्थशास्त्री कीन्स की इन्हीं पक्तियों को दोहराया था. डॉ मनमोहन सिंह ने कहा कि जो लोग यह कहते हैं कि नोटबंदी भविष्य में लाभदायक सिद्ध होगी उन्हें ये पंक्तियां याद करनी चाहिए In the long run we all are dead .दरअसल डॉ मनमोहन सिंह ने एनडीए सरकार को याद दिलाया कि अगर नोटबंदी की वजह से ऐसी कोई स्थिति आती भी है तो तबतक देर हो चुकी होगी और उद्योग धंधे चौपट हो चुके होंगे.

कीन्स ने मंदी से निपटने का क्या तरीका सुझाया

ईटन स्कॉलरशिप हासिल कर चुके और कैम्ब्रिज में पढ़े ब्रिटिश अर्थशास्त्री कीन्स ने मंदी से जूझ रहे देशों को बताया कि अब समय आ गया है कि क्लासिक थ्योरी से परे हटते हुए सरकार को इकोनॉमी में हस्तक्षेप करने की जरूरत है. साल 1936 में कीन्स दुनिया के सामने अपनी सर्वेश्रेष्ठ कृति (Magnum opus) The General Theory of Employment, Interest and Money लेकर आए. इस किताब ने इकोनॉमी की प्रतिस्थापना ही बदल दी.

इस पुस्तक में कीन्स ने कहा कि ये स्टेट की जिम्मेदारी है कि वो पहल करे और बाजार में मांग पैदा करे. स्टेट हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकता है. कीन्स ने इसके लिए उपाय सुझाए. उन्होंने कहा कि सरकार टैक्स में कटौती करे, लोगों को कर्ज दे. कैश ट्रांसफर करे. अपने खर्च में कई गुना इजाफा करें, लेकिन ये खर्चे कहां किए जाएं? कीन्स ने कहा कि सरकार बड़े पैमाने पर सड़कों का निर्माण करे, रेलवे लाइन बिछाए, मेगा इंफ्रा के प्रोजेक्ट हाथ में ले. कीन्स ने यह भी कहा कि अगर सरकार को ऐसा करने के लिए राजकोषीय घाटा सहना पड़े तो इसमें कोई हर्ज नहीं. आप आज भी देखते होंगे कि दुनिया के कई विकासशील देश राजकोषीय घाटा के बावजूद मेगा इंफ्रा के प्रोजेक्ट लॉन्च करते हैं. बुलेट ट्रेन, एयरपोर्ट, सड़कें, मेट्रो, बिजली इसके उदाहरण हैं.

कीन्स ने कहा कि सरकार के इस कदम के एक साथ कई असर होंगे. सरकार द्वारा शुरू किए गए मेगा प्रोजेक्ट के लिए कच्चे माल की मांग होगी. कच्चे माल का उत्पादन होगा तो इसमें लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा. इससे उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी, फिर मांग में इजाफा होगा. इसका परिणाम यह होगा कि फैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ेगा और जब प्रोडक्शन बढ़ेगा तो रोजगार स्वत: बढ़ेगा. कम ब्याज पर कर्ज लेकर लोग अपना बिजनेस शुरू करेंगे. इस तरह से अर्थव्यवस्था मंदी के दुष्चक्र से बाहर निकालेगी. यही नहीं इससे रेल, रोड और दूसरा मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर भी देश को मिलेगा जो विकास के लिए उत्प्रेरक का काम करेंगे. ये प्रोजेक्ट निजी कंपनियों से निवेश मांगने में आकर्षण का काम करेंगे और स्टेट में कैपिलट फ्लो बढ़ेगा.

पूंजीवाद पर मानवीय चेहरे का मुलम्मा

कहा जाता है कि कीन्स ने अपने इन उपायों द्वारा आलोचना झेल रहे पूंजीवाद को मानवीय चेहरा दिया. मुनाफे और व्यक्तिगत लाभ पर चलने वाली पूंजीवादी व्यवस्था में जनकल्याणकारी प्रोजेक्ट सड़क, रेल, बिजली की चर्चा हो रही थी. इससे पहले अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे यूरोपीय देश पूंजीवाद की पहचान बने थे. इधर 1917 में रूस की क्रांति हो चुकी थी और रूस की कम्युनिस्ट सरकार साम्यवाद आधारित आर्थिक मॉडल का निर्माण करना चाहती थी. दो आर्थिक विचारधाराओं के बीच टकराव की स्थिति में कीन्स पूंजीवाद के लिए लुभाने वाली व्याख्या लेकर आए और उन्होंने शोषण के आरोपों से जूझ रहे पूंजीवाद को मानवीय चेहरा दिया.

1936 में अमेरिका के ओकलाहोमा में एक महिला अपने बच्चों के साथ (फाइल फोटो)

अमेरिका में कीन्स के विचारों को बड़ा सम्मान मिला. तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रुजवेल्ट के 'न्यू डील' ने बड़े पैमाने पर पब्लिक प्रोजेक्ट को फंड किया. मकसद था बेरोजगार जनता काम पर लौटे. धीरे-धीरे ही सही अमेरिका की इकोनॉमी रिकवरी मोड में आ गई. दूसरे विश्वयुद्ध के समय अमेरिका में युद्ध से जुड़े साजो-सामान से लेकर सीमेंट, स्टील, ऑटो, पेट्रोकेमिकल्स में धुआंधार उत्पादन होने लगा. ब्रिटेन में भी काम शुरू हुआ. स्वीडन में इस पॉलिसी को अपनाया गया. नाजी जर्मनी ने इस थ्योरी पर काम करते हुए लंबी-लंबी सड़कें बनवाना शुरू कर दिया.

कीन्स के विचार इतने लोकप्रिय हुए कि 1930 से लेकर 1970 तक का दौर केन्सियनवाद के दौर से जाना जाता है.

2008-09 में फिर याद आए कीन्स
 
1930 के बाद कहा जाने लगा है कि जब भी दुनिया में आर्थिक संकट दस्तक देता है. राजनेता और देश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स की शरण लेते हैं. 1970 के बाद भले ही कीन्स का प्रभाव कम होने लगा, लेकिन 2008-09 में जब अमेरिका सब प्राइम क्राइसेस और लेहमान ब्रदर्स के संकट से जूझने लगा तो कीन्स की थ्योरी में लोगों की दिलचस्पी एक बार फिर बढ़ गई. 2009 शुरू होते ही आर्थिक पैकेज, Stimulus दिए जाने लगे. समय रहते कदम उठाए जाने के कारण 2008-09 मंदी का असर सीमित रहा. भारत में भी कोरोना से ध्वस्त एविएशन सेक्टर को सरकार ने आर्थिक पैकेज दिया.

जब मनमोहन सिंह ने कीन्स के Animal spirit को याद किया

कीन्स की नीतियों ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के कामकाज को प्रभावित किया. 2012 में डॉ मनमोहन सिंह की सरकार पर आरोप लगा कि भारत सरकार पॉलिसी पैरालिसिस से जूझ रही है. सरकार फैसले नहीं ले पा रही है. इन आरोपों के जवाब में मनमोहन सिंह ने कई बड़े आर्थिक फैसले लिए. तब उन्होंने कहा था कि हमें देश की अर्थव्यवस्था में एनिमल स्पिरिट (Animal spirit) को जगाने की जरूरत है. इस टर्म के जन्मदाता अर्थशास्त्री कीन्स ही माने जाते हैं. आखिर क्या है एनिमल स्पिरिट का मतलब? डॉ मनमोहन सिंह किन अर्थों में इसकी चर्चा करते थे?

दरअसल Animal spirit निवेशकों और उपभोक्ताओं की फैसले लेने की क्षमता को प्रभावित करने की एक भावना है जिसका इस्तेमाल वो बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में करता है. एनिमल स्पिरिट निवेशकों और उपभोक्ताओं के व्यवहार का मार्गदर्शन करता है.

कीन्स ने अपनी पुस्तक The general theory में लिखा है कि दरअसल एनिमल स्पिरिट अनिश्चितता की स्थिति में आर्थिक फैसले ले सकने और उस पर अमल करने की क्षमता है.

1929 की आर्थिक मंदी ने दुनिया के बड़े-बड़े देशों की आर्थिक व्यवस्था को धराशायी कर दिया.

कीन्स इसे ऐसे समझाते हैं. एक व्यक्ति 10 साल के लिए एक निवेश करना चाहता है, उसे इस पर होने वाले रिटर्न का अंदाजा नहीं लेकिन वो 'एनिमल स्पिरिट' पर भरोसा करता है और निवेश करता है. अनिश्चितता के माहौल में ये रिस्क लेने की क्षमता ही एनिमल स्पिरिट है, हालांकि एक तार्किक माइंड ऐसी स्थिति में निवेश करने से रोकता.

डॉ मनमोहन सिंह 2012 में देश के निवेशकों में उसी विश्वास, उसी उम्मीद और भरोसे को जगाने की बात करते हुए एनिमल स्पिरिट का जिक्र करते थे. आज भी भारत की आर्थिक नीतियों में, बजट पर चर्चा के दौरान इस Animal spirit को जगाने की चर्चा होती है.

राहुल गांधी के NYAY और मोदी की किसान सम्मान निधि में कीन्स की झलक

2019 के आम चुनाव से पहले राहुल गांधी द्वारा देश के 5 करोड़ निर्धन परिवारों को 6000 रुपये मासिक देने की योजना भी कीन्स के सिद्धांतों से प्रभावित थी. राहुल गांधी ने पिछले साल कोरोना संकट के दौरान भी इसकी चर्चा की थी और मजदूरों के खाते में सीधे नगद ट्रांसफर की मांग की थी. राहुल ने कहा था कि सरकार का ऐसा कदम कोरोना से सुस्त पड़ चुकी इकोनॉमी में नई जान भर देगा. राहुल ने समझाते हुए कहा था कि गरीबों को पैसा मिलेगा, मांग बढ़ेगी, मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी और युवाओं को रोजगार मिलेगा." आर्थिक मंदी के दौरान कीन्स भी तो यही थ्योरी देते हुए दिखते थे. क्योंकि गरीबों के हाथ में पैसा आने का मतलब है उनकी क्रय शक्ति का बढ़ना और जब उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी तो आखिरकार इसका फायदा बाजार को ही मिलेगा. 24 मार्च 2022 को भी राहुल ने मोदी सरकार से पूछा था कि क्या गरीबों और मजदूरों को न्यूनत्तम आय मिली? नहीं. प्रधानमंत्री को इसकी फिक्र ही नहीं है.

केंद्र सरकार ने भले ही राहुल की मांग अक्षरश: लागू न की हो लेकिन पिछले उसके कई निर्णयों में यही मॉडल दिखा. खासकर लॉकडाउन के दौरान सरकार ने करोड़ों जनधन खातों में 500 रुपये तीन महीने तक ट्रांसफर किए. मोदी सरकार पीएम किसान सम्मान निधि के तहत लगभग 10 करोड़ किसानों को हर साल 6 हजार रुपये देती है. दरअसल सरकार चाहती है कि योजना का नाम जो भी हो गरीबों के हाथ में क्रय शक्ति कायम रहे और बाजार में मांग बरकरार रहे. कीन्स भी अपने सिद्धांतों में प्रभावी मांग की चर्चा करते हैं.

वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रखी नींव

अपने विचारों से दुनिया में आर्थिक बदलावों की नींव रखने वाले कीन्स ने ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की नींव रखने में मदद की जिनसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तबाह हो चुकी अर्थव्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण हो सके. कीन्स युद्ध से त्रस्त देशों के लिए बिजनेस के ऐसे नियम बनाना चाहते थे जो सर्वमान्य हों. युद्ध के वर्षों के दौरान, कीन्स ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को आकार देने वाली वार्ताओं में निर्णायक भूमिका निभाई.

दुनिया के देश 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में मिले. यहां ब्रेटन वुड्स सम्मेलन हुआ. इस सम्मेलन में कीन्स ने ब्रिटेन का प्रतिनिधित्व किया. 1 से 22 जुलाई, 1944  तक चले इस सम्मेलन में 44 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे. यहां पर ही अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक जिसे कि अब वर्ल्ड बैंक (World bank) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) कहा जाता है, की स्थापना का ब्लू प्रिंट तैयार किया गया. कीन्स का दिमाग इस प्रोजेक्ट के पीछे मुख्य रूप से रहा.  21 अप्रैल 1946 को दुनिया से विदा होने वाले कीन्स इंटरनेशनल इकोनॉमिक गवर्नेंस का पूरा खाका तैयार कर गए थे. वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ की अगली कड़ी के रूप में  गैट समझौता (GATT Agreement) हुआ और फिर विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना हुई.

निजी जिंदगी

दुनिया को व्यापार के आधुनिक तरीके बताने वाले कीन्स निजी जिंदगी में उथल-पुथल का सामना करते रहे. कहा जाता है कि वो समलैंगिक थे. लेकिन उनके रोमांटिक संबंध रूस की एक बैले डांसर लीडिया लोपोकोवा से भी थे. 1925 में उन्होंने लीडिया से विवाह किया. कैम्ब्रिज में नैतिक विज्ञान पढ़ाने वाले पिता के पुत्र कीन्स ईश्वर में विश्वास नहीं रखते थे. उनके मित्र उन्हें अनिश्वरवादी बताते थे. उनके एक जीवनीकार के अनुसार 'वह कभी भी धर्म को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं थे, वे इसे मानव मन के एक अजीब व्यवहार के रूप में देखते थे.'


 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें