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कहीं बच्चों से आपका रिश्ता खराब न कर दे परफॉर्मेंस प्रेशर, इन बातों का रखें ध्यान

आपने देखा होगा कई बार हवा का ज्यादा प्रेशर होने पर कुकर या टायर धड़ाम की आवाज से फट जाता है. सोचिए ऐसे ही हम सबका इंसानी मस्त‍िष्क है, ये ज्यादा तनाव और चिंता का बहुत ज्यादा प्रेशर लेेकर कैसे भला अच्छा रिजल्ट देगा. यह सही वक्त है जब आप थमकर सोचें कि कहीं आप अपने टीन एज बच्चे या छात्र को ज्यादा प्रेशर तो नहीं दे रहे.

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प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

आर्थ‍िक युग में हर कोई चाहता है कि जो काम हम नहीं कर सके, वो हमारे बच्चे करें. खासकर मध्यवर्गीय परिवारों में माता-पिता अपने सपने बच्चों की आंखों से पूरे करने की ख्वाहिश रखते हैं. बच्चों को कभी इमोशनली तो कभी दूसरों के बच्चों से तुलना करके बार-बार याद दिलाया जाता है कि उनका लक्ष्य क्या है. 

कई पेरेंट्स घर में पढ़ाई के माहौल के लिए अपना त्याग, पैसों का खर्च और यहां तक कि उनके लिए अपने सपनों की बलि का पूरा बोझ बच्चों पर लादने लगते हैं. उन्हें लगता है कि बच्चे ये सब सहज भाव से सुनकर सकारात्मक निर्देशन पर आगे बढ़ जाएंगे. लेकिन मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हर वक्त बच्चों पर परफॉर्मेंस का दबाव उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ भी कर सकता है. इसका उनके शारीरिक विकास यहां तक कि मेटाबोलिज्म और हार्मोंस के ग्रोथ पर भी पड़ता है. इसलिए बच्चों पर एक हद तक ही इस तरह का प्रेशर देना चाहिए. 

चीन में उच्च विद्यालयों में पढ़ने वाले 997 छात्रों पर हुए एक अध्ययन का हवाला देते हुए जाने माने मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि किशोर हो रहे बच्चों के साथ हमें अपना रवैया बदलना बहुत जरूरी है. जिस तरह देशभर से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे बच्चों की आत्महत्या की खबरें बढ़ी हैं, वो हमारे लिए अलार्मिंग होनी चाहिए. एक माता-पिता के तौर पर अगर हम अपने बच्चों के हमराज नहीं बन पा रहे तो ये सही नहीं है. ऐसे में बच्चे खुद को हताशा और निराशावाद की तरफ ले जाते हैं. 

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डॉ त्रिवेदी कहते हैं कि चीन में हुए अध्ययन में पाया गया था कि किस तरह अच्छा प्रदर्शन करने के लिए अपने माता-पिता से उच्च स्तर के दबाव का अनुभव करते हैं, जिसका किशोरों के मनोवैज्ञानिक कामकाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. 997 छात्रों के माता-पिता के साथ करीबी संबंधों और उससे मिले प्रेशर से उत्पन्न चिंता और अवसाद के लक्षणों का छात्रों के शैक्षणिक कार्यों पर पड़ने वाले प्रभाव पर अध्ययन किया गया था. अध्ययन ने यह भी परीक्षण किया कि क्या माता-पिता की करीबी बच्चों में तनाव कम कर पाता है. इसमें पाया गया कि एक तरफ दिली जुड़ाव उनके तनाव को कम करता है, वहीं माता-पिता से बहुत ज्यादा इमोशनली जुड़े बच्चे तनाव भी महसूस करते हैं. 

डॉ सत्यकांत कहते हैं कि माता-पिता और बच्चों के बीच के रिश्ते की यही धागा ज्यादा प्रेशर से चटक सकता है. जब बच्चा अध‍िक मानसिक दबाव का अनुभव करता है तो वो इसे माता-पिता के सामने भी व्यक्त नहीं कर पाता. ऐसे में वो तनाव को सहज रूप से नहीं ले पाता. इससे उसका एकेडमिक रिजल्ट तो ब‍िगड़ता ही है साथ ही माता-पिता के साथ संवाद भी कम होने लगता है जो आगे जाकर रिश्तों पर भी असर डालता है. 

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कभी न करें ये काम 

  • अपने बच्चे की दूसरे बच्चे से तुलना न करें. 
  • बच्चे को बार-बार उसका गोल न याद दिलाएं. 
  • उसे दोस्तों के सामने नीचा दिखाने से बचें. 
  • बच्चे की बात सुनकर उसे नकारने से बचें. 
  • बच्चे पर जबरन अपनी दिनचर्या न थोपें. 

अपनाएं ये जरूरी बातें 

  • बच्चे को हमेशा ये जताएं कि आप उसे बिना शर्त प्यार करते हैं. 
  • बच्चे को बताएं कि किसी गोल या सपने से जरूरी आपको उसकी खुशी है. 
  • बच्चे को उसकी पसंद की हावी अपनाने दें और उसमें सहयोग करें. 
  • बच्चे के साथ किसी न किसी बहाने से बात करें और वक्त बिताएं. 
  • बच्चे से हर वक्त पढ़ाई, करियर, परफार्मेंस, कंपटीशन की बात न करें. 

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