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छप्पन भोग छोड़कर खिचड़ी खाने पहुंच गए थे भगवान... जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद कैसे शामिल हुई 'खेचुड़ी'

खिचड़ी भारतीय घरों में स्वास्थ्य और पोषण का प्रतीक रही है, जिसे पुरी के जगन्नाथ मंदिर में महाप्रसाद के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है. कहानी के अनुसार, भगवान जगन्नाथ ने एक भक्त कर्माबाई की बनाई खिचड़ी खाई थी, जिससे यह भोजन और भी पवित्र माना जाने लगा.

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जगन्नाथ मंदिर में भी खिचड़ी दिव्य भोग में शामिल होकर महाप्रसाद बन जाती है
जगन्नाथ मंदिर में भी खिचड़ी दिव्य भोग में शामिल होकर महाप्रसाद बन जाती है

खिचड़ी के चार यार घी, दही, पापड़-अचार... या फिर माघ महीना खिच्चड़ खाय... भारतीय घरों में खिचड़ी का जिक्र कुछ इसी तरीके से होता है. मकर संक्रांति के त्योहार पर तो खिचड़ी प्रसाद बन जाती है. हालांकि बीते दशकों में एक दौर ऐसा भी रहा जब इसे सिर्फ बीमारों का भोजन बताया गया. इस तरह खिचड़ी के मान को अपमान में बदलने की कोशिश हुई, लेकिन सफल नहीं रही.

बीते कुछ वर्षों में जब एक बार फिर हेल्दी फूड, सुपर फूड और गट हेल्थ जैसे शब्द मार्केट में आए हैं खिचड़ी की ओर रुझान एक बार फिर बढ़ा है.  खैर, बुजुर्ग तो पहले से कहते आए हैं कि खिचड़ी वो भोजन है जो देवताओं को भी नसीब नहीं है. वो धरती पर खिचड़ी ही खाने आते हैं. 

खिचड़ी वाकई ऐसा खाद्य पदार्थ है जो आसानी से भगवान के भोग में शामिल हो जाती है और प्रसाद के तौर पर बांटी जाती है. ओडिशा के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में जगन्नाथ जी को तमाम 56 भोग परोसे जाते हैं, लेकिन इन कई व्यंजनों के बीच खेचुड़ी थाल सबसे खास होती है. उरद और मूंग के दाल में चावलों के साथ पकी हुई खिचड़ी. मंदिर के प्रसाद में खिचड़ी के शामिल होने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है और पुरी में बड़े चाव से सुनी-सुनाई जाती है.

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जब जगन्नाथ भगवान खाने आए खिचड़ी
कहते हैं कि एक बार भगवान जगन्नाथ एक गरीब बुढ़िया के बुलावे पर उसके हाथों से खिचड़ी खाने चले गए थे. जगन प्रभु की एक भक्त थीं कर्माबाई. वह बाल जगन्नाथ को बेटा मानती थीं. हर सुबह किसी बच्चे की तरह उन्हें तैयार करतीं और जल्दी से जल्दी खिचड़ी बनाकर खिला देतीं ताकि रात भर के सोए बाल जगन्नाथ को सुबह-सुबह कुछ खाने को मिल जाए. इस बीच बूढ़ी माई को अपने स्नान का भी ध्यान नहीं रहता था. एक दिन कर्माबाई को किसी साधु पुजारी ने कह दिया कि, ठाकुर को भोग लगाती हो तो कम से कम से कम स्नान तो कर ही लेना चाहिए.

Khichadi

अगले दिन कर्माबाई ने साधु के बताए नियमों के अनुसार ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाई. इस नियम, पूजा-पाठ, में दोपहर हो गई. बूढ़ी माई ने खिचड़ी बनाकर ठाकुर जी को पुकारा. भूख से बेहाल बाल जगन्नाथ खिचड़ी खाने आ गए और बोले कि आज बहुत देर कर दी माई, मुझे तो लगा रूठ ही गई. अपने सामने बाल जगन्नाथ को देखकर कर्माबाई को भी सुध-बुध नहीं रही. वह बहुत दु:खी हुईं कि आज मेरे बाल प्रभु भूखे ही रह गए. 

भगवान के मुंह पर लगी रह गई जूठन
अभी जगन्नाथ जी ने दो कौर खिचड़ी ही खाई थी कि श्रीमंदिर में भोग की घंटियां बज गईं, लेकिन जगन्नाथ प्रभु वहां पहुंच नहीं सके. श्रीमंदिर में एक और परंपरा है कि भोग अर्पण के बाद जल में प्रभु को मुख दिखाया जाता है, जब वह परछायी दिखती है, तो इसे मान लेते हैं कि उन्होंने भोग स्वीकार कर लिया है. उस दिन भोग अर्पण के दौरान परछायी नहीं दिखी. पुजारी बहुत परेशान हुए. उन्होंने समझा कि मुझसे ही कुछ भूल हुई होगी, इसलिए दोबारा जल में मुख दिखाया. इस बार परछायी दिख गईं लेकिन प्रभु के मुख पर खिचड़ी लगी हुई थी. 

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असल में भगवान जल्दबाजी में मंदिर लौट आए थे और मुंह नहीं धो सके थे. यह बात पुरी के राजा तक पहुंची, राजा भी बहुत चिंतित हुआ. उस रात भगवान जगन्नाथ ने सपने में राजा को दर्शन दिया और कहा कि जब मैं श्रीमंदिर में था ही नहीं तो नजर कैसे आता. मैं तो माई कर्माबाई की खिचड़ी खा रहा था.

जब यह बात साधु को पता चली तो वह बहुत पछताया और उसने कर्माबाई से क्षमा मांगते हुए कहा कि आप जैसे चाहे वैसे अपने बाल जगन्नाथ की सेवा करो. कहानी का आशय यह है कि, भगवान तो केवल भावना देखते हैं. इसके बाद से पुरी में खिचड़ी का बालभोग लगाया जाने लगा. श्रद्धालु इसे 'महाप्रसाद' की संज्ञा देते हुए चाव से इसका भोजन करते हैं.

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