ईरान के पावर प्लांट-पुल क्यों उड़ा रहे ट्रंप? बदले में कतर को प्यासा मारने तैयारी में तेहरान

ईरान पर अमेरिकी हमलों के दौरान नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने को लेकर नई बहस छिड़ गई है. अमेरिका का दावा है कि इन परिसंपत्तियों का इस्तेमाल ईरानी सेना सैन्य उद्देश्यों के लिए कर रही थी, जबकि ईरान इसे खारिज कर नागरिकों पर दबाव बनाने की रणनीति बता रहा है. इसी बीच अमेरिका की वैश्विक छवि और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़ी दो नई रिपोर्टों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चाओं को जन्म दिया है.

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अमेरिकी बमबारी में ईरान के कराज स्थित B1 पुल को भारी नुकसान पहुंचा. (Photo: AFP) अमेरिकी बमबारी में ईरान के कराज स्थित B1 पुल को भारी नुकसान पहुंचा. (Photo: AFP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:41 PM IST

ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य तनाव के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि यदि अमेरिका का लक्ष्य केवल ईरानी सेना और उसकी मिसाइल क्षमता को कमजोर करना है, तो फिर बिजली संयंत्रों, पुलों, रेलवे नेटवर्क और जल शोधन संयंत्रों जैसे नागरिक ढांचों पर लगातार हमले क्यों किए जा रहे हैं. अमेरिका इन हमलों को सैन्य आवश्यकता बता रहा है, जबकि ईरान का आरोप है कि यह उसकी नागरिक सुविधाओं को तबाह कर बातचीत के लिए दबाव बनाने की रणनीति है.

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रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में अमेरिका ने रूस द्वारा यूक्रेन के पावर ग्रिड, पुलों और अन्य नागरिक ढांचों पर किए गए हमलों की तीखी आलोचना की थी. वॉशिंगटन ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन बताया था. बाद में इसी युद्ध से जुड़े आरोपों के आधार पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया. अब आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि वही अमेरिका पिछले कुछ दिनों से ईरान के ऊर्जा ढांचे, पुलों और अन्य नागरिक परिसंपत्तियों पर हमले क्यों कर रहा है.

ईरान में पुलों और ऊर्जा ढांचे पर हमले

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल के दिनों में दक्षिणी ईरान के होर्मोजगन प्रांत में कई पुलों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया. स्थानीय रिपोर्ट्स में इन हमलों में लोगों की मौत होने का भी दावा किया गया है. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है. अमेरिका का कहना है कि जिन नागरिक ढांचों पर हमला किया गया, उनका इस्तेमाल केवल आम लोगों के लिए नहीं बल्कि सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा रहा था. डिफेंस स्ट्रेटेजी में इसे 'ड्यूल यूज इंफ्रास्ट्रक्चर' कहा जाता है.

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अमेरिका का आरोप है कि ईरानी सेना पुलों, बिजलीघरों, सड़कों और जल संयंत्रों जैसी जगहों का इस्तेमाल सैनिकों, हथियारों और सैन्य संसाधनों को छिपाने के लिए कर रही थी. विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास के इलाकों में ऐसी गतिविधियों का दावा किया गया है. अमेरिकी कार्रवाई के जवाब में ईरान ने मध्य पूर्व के अमेरिकी सहयोगी देशों पर मिसाइल हमले किए. ईरानी मिसाइलों का निशाना कतर और कुवैत भी बने. कतर इस संघर्ष में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, जबकि कुवैत में हुए हमले में बिजली और समुद्री पानी को मीठा बनाने वाले एक महत्वपूर्ण संयंत्र (डिसैलिनेशन प्लांट) को नुकसान पहुंचने की खबर है.

ईरान ने आरोपों को बताया बेबुनियाद

ईरान ने अमेरिका के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उसकी सेना नागरिक ढांचों का इस्तेमाल ढाल के रूप में नहीं कर रही. तेहरान का आरोप है कि अमेरिका जानबूझकर नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर देश पर बातचीत का दबाव बनाना चाहता है. ईरान का यह भी कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही सार्वजनिक रूप से चेतावनी दे चुके थे कि यदि ईरान बातचीत के लिए तैयार नहीं हुआ तो उसके बिजली संयंत्रों और पुलों को निशाना बनाया जाएगा.

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क्या जनता पर दबाव बनाने की रणनीति?

कुछ इंटरनेशनल एनालिस्ट्स का मानना है कि नागरिक ढांचों पर हमलों के पीछे एक और रणनीति हो सकती है. उनके मुताबिक यदि बिजली, पानी और परिवहन जैसी बुनियादी सेवाएं प्रभावित होती हैं तो आम लोगों की परेशानियां बढ़ेंगी और इससे सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा हो सकता है. इन हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों को लेकर बहस भी तेज हो गई है. सवाल यह है कि यदि नागरिक ढांचों पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन माना जाता है, तो ऐसी स्थिति में क्या किया जाए जब किसी देश का दावा हो कि उन्हीं ढांचों का इस्तेमाल सैन्य गतिविधियों के लिए किया जा रहा है. ऐसी बहस पहले भी गाजा में इजरायल-हमास संघर्ष और भारत के आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान उठ चुकी है, जहां सैन्य ठिकानों के धार्मिक या नागरिक परिसरों में होने के आरोप लगाए गए थे.

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ट्रंप के लिए चिंता बढ़ाने वाली दो रिपोर्टें

इस बीच अमेरिका के लिए दो और घटनाक्रम चर्चा में हैं. पहली, एक इंटरनेशनल सर्वे में कई देशों में अमेरिका के प्रति सकारात्मक धारणा घटने और चीन के प्रति भरोसा बढ़ने की बात कही गई है. हालांकि भारत में अब भी अमेरिका को चीन की तुलना में अधिक भरोसेमंद माना गया है. दूसरी ओर, अमेरिकी मीडिया में आई रिपोर्ट्स के अनुसार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लंबे समय तक टेलीप्रॉम्प्टर ऑपरेटर रहे गेब्रियल पेरेज पर आरोप है कि उन्होंने ट्रंप के भाषणों की पहले से मिली जानकारी का इस्तेमाल ऑनलाइन प्रेडिक्शन मार्केट में दांव लगाने के लिए किया. आरोप है कि इससे उन्होंने एक लाख डॉलर से अधिक की कमाई की. इन आरोपों के बाद उन्हें बिना वेतन के अवकाश पर भेज दिया गया है.

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