अमेरिका-ईरान डील को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि ईरान को 300 बिलियन डॉलर मिलेंगे कैसे और यह पैसा देगा कौन? 300 बिलियन डॉलर यानी करीब 28 लाख 29 हजार करोड़ रुपये. यह कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है. मौजूदा समय में ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था करीब 300 बिलियन डॉलर की है. यानी जितनी उसकी पूरी जीडीपी है, लगभग उतनी ही रकम इस डील के तहत मिलने की बात कही जा रही है.
अगर आबादी के हिसाब से देखें तो 9 करोड़ की आबादी वाले ईरान में यह रकम प्रति व्यक्ति करीब 34 लाख रुपये बैठती है. जबकि ईरान की प्रति व्यक्ति सालाना आय इससे कहीं कम है.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर यह वास्तव में डील है, तो यह आगे कैसे बढ़ेगी? क्योंकि पहली नजर में यह ईरान की जीत का दस्तावेज ज्यादा लगता है. ऐसा दस्तावेज जिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद हस्ताक्षर किए हैं.
ट्रंप का दावा और एमओयू का छठा बिंदु
दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप लगातार कह रहे हैं कि यह पैसा अमेरिका के खजाने से नहीं आएगा. इसीलिए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजशकियान द्वारा जारी एमओयू की कॉपी महत्वपूर्ण हो जाती है.
इस समझौते के छठे बिंदु में साफ लिखा गया है कि अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 बिलियन डॉलर की योजना तैयार करेगा.
यानी अमेरिका सीधे पैसा नहीं देगा. बल्कि अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर एक ऐसा फंड तैयार करेगा जिससे ईरान में पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के काम हो सकें.
आसान भाषा में कहें तो अमेरिका ईरान के नाम पर एक खाता खोल रहा है, लेकिन उसमें सीधे अपनी जेब से पैसा नहीं डाल रहा. वह खाड़ी देशों और उनकी कंपनियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करेगा.
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पैसा आखिर देगा कौन?
एमओयू में 'रीजनल पार्टनर्स' शब्द का इस्तेमाल किया गया है. इसका मतलब है कि इस योजना में सऊदी अरब, यूएई और दूसरे खाड़ी देशों की भूमिका हो सकती है. इन देशों और उनकी कंपनियों के निवेश से ईरान में सड़कें, पुल, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचे विकसित किए जा सकते हैं.
यानी अमेरिकी टैक्सपेयर का पैसा सीधे ईरान नहीं जाएगा, लेकिन अमेरिकी पहल पर खाड़ी देशों के निवेश से ईरान को आर्थिक मदद मिल सकती है.
युद्ध का नुकसान किसे हुआ और फायदा किसे?
यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है. इस युद्ध से मध्य पूर्व के देशों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ. क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को अरबों डॉलर का झटका लगा. लाखों नौकरियां प्रभावित हुईं और ऊर्जा क्षेत्र को भी नुकसान पहुंचा.
ऐसे में उम्मीद थी कि ईरान पर दबाव बढ़ेगा. लेकिन अब तस्वीर उल्टी नजर आ रही है. जिन देशों को नुकसान हुआ, उन्हीं के निवेश से ईरान के पुनर्निर्माण की बात हो रही है. यानी युद्ध के बाद आर्थिक लाभ का सबसे बड़ा दावेदार भी ईरान ही बन सकता है.
प्रतिबंधों ने कैसे रोकी ईरान की रफ्तार?
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक पीछे रही. तेल और गैस के विशाल भंडार होने के बावजूद ईरान 500 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था भी नहीं बन पाया. जबकि इसी दौरान सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था 1 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच गई, यूएई और इजरायल भी काफी आगे निकल गए.
दिलचस्प बात यह है कि मध्य पूर्व में सबसे पहले तेल की खोज भी ईरान में ही हुई थी. 1908 में यहां तेल मिलने के बाद माना गया था कि ईरान दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में शामिल होगा. लेकिन इस्लामिक क्रांति और बाद के अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसकी आर्थिक रफ्तार को सीमित कर दिया.
क्या बदल जाएगा मध्य पूर्व का शक्ति संतुलन?
अब माना जा रहा है कि अगर प्रतिबंध हटते हैं और 300 बिलियन डॉलर के निवेश की योजना आगे बढ़ती है, तो मध्य पूर्व का शक्ति संतुलन बदल सकता है. अब तक ईरान अपनी सैन्य ताकत और मिसाइल कार्यक्रम के दम पर क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखता था. लेकिन आर्थिक ताकत मिलने पर उसका प्रभाव और बढ़ सकता है. यही वह स्थिति है जिससे वर्षों तक सऊदी अरब और उसके सहयोगी देश बचना चाहते थे.
अमेरिका और युद्धों का रिकॉर्ड
इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका की विदेश नीति पर भी सवाल खड़े किए हैं. वियतनाम युद्ध, अफगानिस्तान युद्ध, इराक युद्ध, सीरिया और यमन जैसे संघर्षों में अमेरिका ने भारी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया. लेकिन कई मामलों में उसे अपने घोषित राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं हुए.
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अफगानिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां 20 साल युद्ध लड़ने के बाद अमेरिका वापस लौट गया और तालिबान फिर सत्ता में आ गया.
सबसे बड़ा सवाल
अगर अंत में बातचीत और समझौते के जरिए ही समाधान निकलना था, तो फिर युद्ध क्यों हुआ? अगर अंततः प्रतिबंध हटाने थे, निवेश को मंजूरी देनी थी और पुनर्निर्माण का रास्ता खोलना था, तो फिर इतने बड़े सैन्य टकराव, वैश्विक अस्थिरता और आर्थिक नुकसान की जरूरत क्या थी? यही वह सवाल है जिसका जवाब अभी भी दुनिया तलाश रही है.
आजतक ब्यूरो