जब समुद्री माइंस की बलि चढ़े 44 सैनिक, 'समुद्रों के संविधान' की कहानी जिससे चिढ़ते हैं ईरान-US

किस्सा करीब 77 साल पुराना है. लेकिन ईरान और अमेरिका की जंग के बीच मौजूं है. इसी घटना के बाद 'समुद्रों का संविधान' बना, जिसे ईरान और अमेरिका दोनों ही खास पसंद नहीं करते. कहानी दो देशों की लड़ाई की. जो इंटरनेशनल कोर्ट (International Court of Justice - ICJ) का पहला केस था.

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ये विवाद अल्बानिया और ब्रिटेन के बीच हुआ था (सांकेतिक फोटो) ये विवाद अल्बानिया और ब्रिटेन के बीच हुआ था (सांकेतिक फोटो)

विष्णु रावल

  • नई दिल्ली,
  • 15 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:06 PM IST

होर्मुज स्ट्रेट इन दिनों सुर्खियों में है. लेकिन ये अकेला ऐसा समुद्री रास्ता नहीं है, जिस पर दुनिया की नजर रहती हो. दुनिया में 200 से ज्यादा ऐसे प्राकृतिक संकरे समुद्री रास्ते हैं, जिन्हें इंटरनेशनल स्ट्रेट यानी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य माना जाता है.

आज जहाज इन रास्तों से तय नियमों के तहत गुजरते हैं. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था.

एक वक्त था, जब इन समुद्री रास्तों पर किसका कितना अधिकार है, इसे लेकर अक्सर तनातनी होती थी. दिक्कत ये थी कि जहाजों के आने-जाने के लिए दुनिया के पास कोई साफ और सब पर लागू होने वाला नियम नहीं था.

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फिर 1946 में एक ऐसी घटना हुई, जिसने पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया. यही मामला आगे चलकर 'समुद्रों के संविधान' यानी UNCLOS की बुनियाद बना.

कहानी शुरू होती है कॉर्फू स्ट्रेट (Straits of Corfu) से. ग्रीस और अल्बानिया के बीच मौजूद संकरा समुद्री रास्ता.

साल था 1946.

उस वक्त एक नियम जरूर माना जाता था. अगर कोई जहाज किसी दूसरे देश के समुद्री इलाके से शांति से, बिना किसी खतरे या नुकसान के गुजर रहा है, तो उसे रोका नहीं जाना चाहिए. आसान भाषा में कहें तो, 'शांति से गुजरने का अधिकार'. अंतरराष्ट्रीय कानून की भाषा में इसे Innocent Passage कहा जाता था.

लेकिन 1946 का दौर बिल्कुल शांत नहीं था.

ग्रीस में गृहयुद्ध चल रहा था. पूरा इलाका राजनीतिक और सैन्य तनाव से भरा हुआ था. ब्रिटेन खुलकर ग्रीस का समर्थन कर रहा था, जबकि अल्बानिया पर कम्युनिस्ट ताकतों का साथ देने के आरोप लग रहे थे. ऐसे में दोनों देशों के रिश्ते तल्ख थे.

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इसी बीच कॉर्फू स्ट्रेट में तीन घटनाओं ने पूरे मामले को अंतरराष्ट्रीय विवाद में बदल दिया. 

1. 15 मई 1946... अल्बानिया की तरफ से फायरिंग

ब्रिटेन के दो युद्धपोत HMS Orion और HMS Superb कॉर्फू स्ट्रेट से गुजर रहे थे. तभी अल्बानिया के तटीय ठिकानों से अचानक गोलियां चलने लगीं. गोलियां जहाजों के बेहद करीब से निकलीं.

ब्रिटेन ने इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन बताया. लेकिन अल्बानिया ने उल्टा जवाब दिया. उसने कहा, 'ये हमारे समुद्री इलाके में घुस आए थे. कॉर्फू स्ट्रेट से गुजरना है तो पहले हमारी इजाजत लेनी होगी.'

ब्रिटेन ने भी साफ कर दिया, 'अगली बार अगर गोली चली, तो जवाब भी मिलेगा.'

2. करीब पांच महीने बाद... एक धमाका... फिर दूसरा

22 अक्टूबर 1946. इस बार ब्रिटेन ने चार युद्धपोतों का एक बेड़ा कॉर्फू स्ट्रेट भेजा. मकसद साफ था- दुनिया को दिखाना कि इंटरनेशनल स्ट्रेट से गुजरने के लिए किसी की इजाजत नहीं चाहिए. जहाज अलर्ट पर थे, उन्हें साफ आदेश था- पहले गोली नहीं चलानी है. सिर्फ हमला होने पर जवाब देना है.

फिर दोपहर करीब तीन बजे अचानक जोरदार धमाका हुआ.

सबसे आगे चल रहा HMS Saumarez समुद्र में बिछी एक बारूदी सुरंग (Mine) से टकरा गया. जहाज का अगला हिस्सा बुरी तरह उड़ गया. कुछ ही सेकंड में 36 नौसैनिकों की मौत हो गई.

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फिर पीछे चल रहा HMS Volage विस्फोट से क्षतिग्रस्त जहाज को खींचकर बाहर निकालने लगा.  लेकिन किस्मत ने एक और झटका दिया.

शाम करीब चार बजे Volage भी दूसरी माइन से टकरा गया. इस धमाके में 8 और नौसैनिक मारे गए.

कुछ ही घंटों में 44 नोसैनिकों की जान जा चुकी थी, 42 घायल थे और HMS Saumarez युद्धपोत लगभग बेकार हो चुका था.

सबसे हैरानी की बात ये थी कि किनारे पर मौजूद अल्बानियाई सैनिक सब कुछ देख रहे थे, लेकिन उनकी तरफ से न कोई मदद आई, न कोई कार्रवाई हुई.

यहीं से ब्रिटेन का शक और गहरा गया कि ये माइनें अचानक नहीं आईं, बल्कि जानबूझकर बिछाई गई थीं. हालांकि अल्बानिया ने कहा कि उसका इससे कोई लेना-देना नहीं है. उसने ग्रीस पर इनका बिल फाड़ दिया.

3. ब्रिटेन का ऑपरेशन रिटेल... चिढ़ा अल्बानिया

ब्रिटेन ने फैसला किया कि ये पता लगाया जाए कि समुद्र में और कितनी माइनें हैं.

12 और 13 नवंबर 1946 को ब्रिटिश नौसेना बिना अल्बानिया को पूछे कॉर्फू स्ट्रेट में घुसी और बड़े पैमाने पर माइन हटाने का ऑपरेशन चलाया. इसे ऑपरेशन रिटेल (Operation Retail) नाम दिया गया.

ब्रिटेन का कहना था कि अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो आगे भी जहाज खतरे में रहते. लेकिन अल्बानिया ने इसे अपनी समुद्री सीमा में घुसपैठ बताया और संयुक्त राष्ट्र (UN) में शिकायत कर दी. दूसरी तरफ ब्रिटेन ने अपने नोसैनिकों की मौत के बदले अल्बानिया से हर्जाना मांगा. 

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कई महीने बीत गए. हल न निकलता देख संयुक्त राष्ट्र ने मामले को अपने ही अंग अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में भेज दिया. 22 मई को 1947 को वहां इसकी सुनवाई हुई. ये ICJ का पहला ही केस था.

लंबी सुनवाई के बाद 1949 को ICJ ने फैसला सुनाया.

कोर्ट ने साफ कहा कि ब्रिटेन को कॉर्फू चैनल से शांति से गुजरने का अधिकार (Innocent Passage) था. यानी अगर उसके युद्धपोत सिर्फ रास्ते से गुजर रहे थे और किसी तरह की उकसाने वाली या सैन्य कार्रवाई नहीं कर रहे थे, तो अल्बानिया उन्हें रोक नहीं सकता था.

हां, अल्बानिया अपने समुद्री इलाके के लिए कुछ नियम जरूर बना सकता था. लेकिन वह यह नहीं कह सकता था कि हर विदेशी जहाज पहले उससे इजाजत ले, तभी आगे बढ़े. न ही वह अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य से गुजरने वाले युद्धपोतों पर पूरी तरह पाबंदी लगा सकता था.

अब सबसे बड़ा सवाल था- आखिर समुद्र में माइंस किसने बिछाईं?

हैरानी की बात यह है कि अदालत ने इसका जवाब ढूंढा ही नहीं. ब्रिटेन ने कहा कि माइंस अल्बानिया ने बिछाईं. अल्बानिया ने इनकार किया. सबूत इतने मजबूत नहीं थे कि किसी एक को दोषी ठहरा दिया जाए. इसलिए कोर्ट ने दोनों के आरोप खारिज कर दिए.

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लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अल्बानिया बच गया.

कोर्ट ने कहा, माइंस चाहे जिसने भी बिछाई हों, हादसा अल्बानिया के समुद्री इलाके में हुआ था. ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि उसकी सरकार को इसकी भनक तक नहीं लगी होगी. अगर उसे जानकारी थी, तो उसकी जिम्मेदारी थी कि वह दूसरे देशों को पहले ही चेतावनी देता.

फिर बारी आई ब्रिटेन की.

हादसे के कुछ दिन बाद ब्रिटेन ने बिना अल्बानिया की मंजूरी के उसके समुद्री इलाके में जाकर माइंस हटाने का अभियान चलाया. ब्रिटेन का तर्क था कि वह सबूत जुटाना चाहता था.

लेकिन कोर्ट ने इस दलील को भी नहीं माना. अदालत ने कहा, अगर हर देश यह कहने लगे कि वह अपनी मर्जी से दूसरे देश की सीमा में घुसकर कार्रवाई कर सकता है, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की नींव ही हिल जाएगी. ऐसा नियम ताकतवर देशों को मनमानी करने का रास्ता देगा, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.

अब कहानी का आखिरी और सबसे अहम सवाल बचा था- नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

अल्बानिया ने नई दलील दी. कहा कि ICJ को यह तय करने का अधिकार ही नहीं है कि मुआवजा कितना होगा. इसलिए उसने इस मुद्दे पर होने वाली आगे की सुनवाई में हिस्सा ही नहीं लिया.

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लेकिन अदालत की प्रक्रिया नहीं रुकी.

आखिरकार, ICJ ने ब्रिटेन के पक्ष में फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि हादसे की जिम्मेदारी अल्बानिया की है, इसलिए उसे ब्रिटेन को 8,43,947 पाउंड (करीब 10 करोड़ रुपये) मुआवजे के तौर पर देने होंगे.

लेकिन अल्बानिया सालों तक टालमटोल करता रहा. ब्रिटेन सोच में था कि रकम कैसे वसूली जाए?

पहला रास्ता यह सूझा कि ब्रिटेन में मौजूद अल्बानिया की संपत्ति जब्त कर ली जाए. लेकिन जांच हुई तो पता चला कि ब्रिटेन में ऐसी कोई संपत्ति थी ही नहीं, जिसे जब्त करके मुआवजा वसूला जा सके. 

तभी ब्रिटेन की नजर एक पुराने खजाने पर पड़ी.

यह था नाजी जर्मनी का लूटा हुआ सोना. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी ने कई देशों से सोना लूटा था. युद्ध खत्म होने के बाद ऐसा ही करीब 2,339 किलोग्राम सोना एक अंतरराष्ट्रीय आयोग ट्राइपार्टाइट कमीशन के नियंत्रण में था. इस आयोग में ब्रिटेन भी शामिल था. दूसरी तरफ, अल्बानिया का दावा था कि इस सोने का एक हिस्सा उसी का है.

यहीं से दोनों मामलों की कड़ियां जुड़ गईं.

लंबी बातचीत और कई दशक की खींचतान के बाद आखिरकार 8 मई 1992 को ब्रिटेन और अल्बानिया के बीच समझौता हुआ. इसके तहत ब्रिटेन ने अल्बानिया को करीब 1,574 किलोग्राम सोना देने पर सहमति जताई. बदले में 1996 में अल्बानिया ने 20 लाख डॉलर (17 करोड़ रुपये) मुआवजा ब्रिटेन को दिया.

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फिर आया 'समुद्रों का संविधान'

कॉर्फू चैनल केस का फैसला सिर्फ ब्रिटेन और अल्बानिया तक सीमित नहीं रहा. इसने पूरी दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया.

आखिर कैसे तय होगा कि कोई जहाज वास्तव में 'शांतिपूर्ण तरीके से गुजर रहा है' (Innocent Passage) और कौन नहीं?

फिर फैसले के कुछ साल बाद, 1958 में संयुक्त राष्ट्र ने समुद्री कानून पर पहला बड़ा सम्मेलन आयोजित किया. इसमें समुद्र से जुड़े कई नियम तय किए गए. बाद में इन्हीं प्रयासों ने संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) का रूप लिया, जिसे अक्सर 'समुद्रों का संविधान' भी कहा जाता है.

समय के साथ दुनिया में जहाजों और समुद्री व्यापार की आवाजाही बढ़ी. तब महसूस हुआ कि सिर्फ Innocent Passage का नियम काफी नहीं है. इसलिए 1982 में हुए तीसरे संयुक्त राष्ट्र समुद्री सम्मेलन के दौरान एक नया नियम जोड़ा गया- Transit Passage.

इसका मतलब था कि अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य से जहाज और विमान बिना किसी रुकावट के लगातार आ-जा सकेंगे. यह नियम Innocent Passage से अलग था. वहां जोर इस बात पर था कि गुजरने वाला जहाज किसी तरह का नुकसान न पहुंचाए. जबकि Transit Passage का मकसद अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों पर निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना था.

इस नए नियम का सभी देशों ने स्वागत नहीं किया. ईरान, ओमान, स्पेन, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों ने इसका विरोध किया. उनका मानना था कि इससे तटीय देशों का अपने समुद्री इलाकों पर नियंत्रण कमजोर पड़ सकता है.

आखिरकार 1982 में संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) को मंजूरी मिल गई और दुनिया के अधिकांश देशों ने इसे स्वीकार भी कर लिया. हालांकि, अमेरिका और ईरान इस संधि के पक्ष में होने के बावजूद इसके सदस्य नहीं बने.

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