ईरान और अमेरिका के बीच जंग खत्म करने के लिए हुई डील के बाद खाड़ी इलाको में हालात फिर से नॉर्मल होने के संकेत मिलने लगे हैं. गुरुवार को सऊदी अरब के झंडे वाले तीन बड़े तेल टैंकर, जिनमें करीब 60 लाख बैरल कच्चा तेल लदा था, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरे. यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर किए.
इस समझौते के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से राहत की तस्वीरें सामने आई हैं, जहां से ऑयल टैंकर और शिप की आवाजाही अब आराम से हो रही है.
हालांकि खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होता दिखाई दे रहा है, लेकिन लेबनान में संघर्ष अभी थमता नजर नहीं आ रहा. गुरुवार सुबह इजरायली सेना ने साउथ लेबनान में नए हवाई हमले किए, जिससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या ट्रंप अपने सहयोगी इजरायल पर जंग रोकने के लिए दबाव बना पाएंगे.
दो दिन पहले लागू हुआ समझौता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने बुधवार को जंग खत्म होने के समझौते (Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर किए. यह समझौता पहले तय समय से दो दिन पहले ही लागू हो गया. इसके तहत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को तत्काल खोलने और ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी हटाने का प्रावधान किया गया है.
हालांकि शिपिंग कंपनियों का कहना है कि समुद्री यातायात को युद्ध-पूर्व स्तर तक पहुंचने में अभी समय लगेगा. समुद्री मार्गों को सुरक्षित बनाने और बारूदी सुरंगों की जांच जैसे कई काम अभी बाकी हैं. इसके बावजूद समझौते का असर तुरंत दिखाई देने लगा है. कई जहाज, जो सेफ्टी रीजन (सुरक्षा कारणों) से अपनी लोकेशन छिपा रहे थे, अब फिर से अपने ट्रांसपोंडर चालू कर खुले तौर पर यात्रा कर रहे हैं.
तेल की कीमतों में गिरावट
शांति समझौते के बाद ग्लोबल ऑयल मार्केट में भी असर दिखाई दिया है. ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और कीमत 78 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई. यह स्तर युद्ध शुरू होने के बाद का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है.
60 दिन की बातचीत की प्रोसेस शुरू
यह समझौता अगले 60 दिनों की औपचारिक बातचीत की शुरुआत करता है, जिसके दौरान युद्ध के स्थायी समाधान पर चर्चा होगी. गौरतलब है कि फरवरी में ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था. समझौते का सबसे संवेदनशील पहलू लेबनान को लेकर है. समझौते में लेबनान में युद्ध को "स्थायी रूप से समाप्त" करने और उसकी क्षेत्रीय अखंडता तथा संप्रभुता की रक्षा सुनिश्चित करने की बात कही गई है. यह ईरान की लंबे समय से चली आ रही मांग थी कि किसी भी शांति समझौते में लेबनान को शामिल किया जाए.
लेकिन इजरायल इस समझौते की बातचीत प्रोसेस का हिस्सा नहीं था. इजरायल ने मार्च में लेबनान में सैन्य अभियान शुरू किया था और हिजबुल्लाह लड़ाकों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर दक्षिणी लेबनान के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है.
इजरायल पीछे हटने को तैयार नहीं
इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह लेबनान से अपनी सेना हटाने का इरादा नहीं रखता. गुरुवार को इजरायल ने एक नया नक्शा जारी किया, जिसमें दक्षिणी लेबनान के अधिक क्षेत्रों को अपने नियंत्रण वाले बफर जोन के रूप में दिखाया गया. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली सरकार के दो अधिकारियों ने बताया कि अमेरिका के साथ बातचीत जारी है ताकि इजरायली सेना को लेबनान में बनाए रखा जा सके. नेतन्याहू के करीबी एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन वार्ताओं को "कठिन और जिद्दी" बताया और कहा कि इजरायल पीछे हटने वाला नहीं है.
लेबनान में फिर हवाई हमले
गुरुवार को लेबनान की सरकारी समाचार एजेंसी ने बताया कि दक्षिणी लेबनान के कफरतबनित और जेबदीन कस्बों पर इजरायली हवाई हमलों में तीन लोगों की मौत हो गई. वहीं राजधानी बेरूत और उसके दक्षिणी इलाकों में इजरायली ड्रोन की गतिविधियां भी देखी गईं.
नबाटियेह शहर से विस्थापित होकर बेरूत में रह रहे मोहम्मद दोगमान ने कहा, "ईरान और अमेरिका का मामला खत्म हो गया होगा, लेकिन लेबनान में युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है. हमें साफ जवाब चाहिए कि यह संघर्ष वास्तव में समाप्त हुआ है या फिर दोबारा शुरू होगा."
ट्रंप-नेतन्याहू रिश्तों में दरार
कई वर्षों से डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच करीबी संबंध रहे हैं. लेकिन लेबनान को लेकर ट्रंप का बदला रुख दोनों नेताओं के बीच हाल के वर्षों की सबसे बड़ी राजनीतिक दरार माना जा रहा है. ट्रंप ने हाल के दिनों में इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए कहा था कि हिजबुल्लाह के लड़ाकों को निशाना बनाने के नाम पर पूरे-पूरे भवन नष्ट किए जा रहे हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रंप लेबनान युद्ध को समाप्त कराने पर अड़े रहते हैं तो इजरायल को या तो सैन्य दबाव कम करना होगा या फिर अमेरिकी कूटनीतिक समर्थन खोने का जोखिम उठाना पड़ सकता है.
हालांकि ट्रंप प्रशासन का कहना है कि आगामी बातचीत में ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर भी व्यापक समझौता हो सकता है. दूसरी ओर उनके आलोचकों का आरोप है कि युद्ध के बावजूद ईरान ने न केवल अपना अस्तित्व बनाए रखा बल्कि होरमुज जलडमरूमध्य पर प्रभाव कायम रखते हुए प्रतिबंधों में भी महत्वपूर्ण राहत हासिल कर ली.
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