भारत इस हफ्ते जिन 10 उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले BRICS समूह की मेजबानी कर रहा है, वो कम से कम आर्थिक पैमाने पर अब पश्चिम से बड़ा हो चुका है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की अप्रैल 2026 की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के मुताबिक, क्रय शक्ति समता (Purchasing Power Parity, PPP) के आधार पर BRICS देशों की संयुक्त आर्थिक क्षमता 88 खरब डॉलर तक पहुंच गई है, जबकि G7 की संयुक्त अर्थव्यवस्था 62 खरब डॉलर पर है.
PPP कैलकुलेशन इस आधार पर होती है कि लगभग 4.45 अरब लोगों की आबादी अपने-अपने देशों में वास्तव में कितना खरीदारी कर सकती है.
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव बुधवार को दिल्ली पहुंचे. उनके पास सिर्फ यह आर्थिक आंकड़ा ही नहीं था, बल्कि एक और अहम तथ्य भी था- रूस अब भारत के कुल तेल खर्च का करीब एक-चौथाई हिस्सा हासिल कर रहा है. यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद 2022 से यह हिस्सेदारी लगभग 14 गुना बढ़ चुकी है.
जी7 से ‘बड़ा’ होने का मतलब क्या है?
आर्थिक स्तर पर यह बदलाव 2020 में आया. महामारी के दौरान BRICS के संस्थापक पांच देशों- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने पहली बार PPP आधारित संयुक्त उत्पादन में G7 को पीछे छोड़ा. उस साल BRICS का संयुक्त उत्पादन 44.3 खरब डॉलर था, जबकि G7 का 42.8 खरब डॉलर.
इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के शामिल होने से समूह में पहले ही दिन 11 खरब डॉलर की अतिरिक्त PPP आधारित आर्थिक क्षमता जुड़ गई. जनवरी 2025 में इंडोनेशिया के शामिल होने से इसमें और 5 खरब डॉलर जुड़ गए.
यहां 'बड़ा' होने का मतलब PPP यानी क्रय शक्ति समता से है. इसमें हर देश की मुद्रा, चाहे वो रुपया हो, युआन हो या रूबल, अपने देश में वास्तव में कितनी खरीदारी कर सकती है, इसे आधार बनाया जाता है. IMF वैश्विक हिस्सेदारी की तुलना के लिए इसी पैमाने का इस्तेमाल करता है.
हालांकि, मौजूदा अमेरिकी डॉलर के आधार पर तस्वीर उलटी दिखती है. IMF के 2031 के अनुमान के मुताबिक G7 अब भी BRICS से करीब 21 खरब डॉलर आगे है. दोनों आंकड़े एक ही डेटाबेस से आते हैं, लेकिन PPP करेंसी एक्सचेंज रेट्स से पैदा होने वाले अंतर को हटा देता है.
एक और पैमाना जहां BRICS आगे निकल चुका है, वो है जनसंख्या. इस समूह के 10 सदस्य देशों में कुल मिलाकर लगभग 4.45 अरब लोग रहते हैं, जो दुनिया की कुल आबादी का 45 से 55 प्रतिशत हिस्सा है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि BRICS पार्टनर देशों को कैसे गिना जाता है. दुनिया के 20 सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों में से 9 अब BRICS का हिस्सा हैं.
तीसरा बड़ा पहलू व्यापार संतुलन का है, जिसमें खासकर चीन को बढ़त हासिल है. 2018 के बाद से चीन का ग्लोबल ट्रेड सरप्लस तेजी से बढ़ा है, जबकि अमेरिका लगातार भारी व्यापार घाटे में बना हुआ है.
इस हफ्ते भारत के लिए रूस क्यों अहम है?
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने गुरुवार को भारत मंडपम में BRICS विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय बैठक की शुरुआत करते हुए कहा, 'पश्चिम एशिया के संघर्ष पर हमारा खास फोकस है. लगातार तनाव, समुद्री यातायात पर खतरा और ऊर्जा ढांचे में रुकावटें स्थिति की नाजुकता को दिखाती हैं. होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर समेत अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से सुरक्षित और बेरोक-टोक आवाजाही वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है.'
यह संदेश कमरे के अंदर मौजूद ब्रिक्स नेताओं के लिए था, लेकिन इसके असली श्रोता कमरे के बाहर थे.
भारत के कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों का लगभग आधा आयात अब भी होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है, जिसे ईरान ने 4 मार्च को अधिकांश जहाजों के लिए बंद कर दिया था. भारत का करीब 7.3 लाख करोड़ रुपये का तेल व्यापार इस बात पर निर्भर करता है कि यह समुद्री रास्ता खुला रहे. वित्त वर्ष 2026 में अकेले सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत, कतर, ईरान और बहरीन से भारत का 86.8 अरब डॉलर का तेल आयात इसी रास्ते से जुड़ा है.
यूक्रेन युद्ध से पहले भारत रूस से न के बराबर तेल खरीदता था. वित्त वर्ष 2022 में भारत के 162 अरब डॉलर के पेट्रोलियम और पेट्रोलियम उत्पाद आयात में रूस की हिस्सेदारी सिर्फ 2 प्रतिशत थी.
लेकिन मार्च 2026 तक स्थिति पूरी तरह बदल गई. भारत के तेल पर खर्च किए गए हर चार डॉलर में से एक डॉलर रूस को जा रहा था. वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 के आखिर में यह हिस्सेदारी 34 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.
रुपये में देखें तो मार्च 2026 तक के एक साल में भारत ने रूसी कच्चे तेल और उत्पादों पर करीब 3.7 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. यह किसी भी एक खाड़ी देश पर हुए खर्च से ज्यादा था. भारत के पारंपरिक तीन सबसे बड़े खाड़ी आपूर्तिकर्ता- सऊदी अरब, इराक और यूएई से आयात क्रमशः लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपये और 2-2 लाख करोड़ रुपये के आसपास रहा.
अमेरिका इससे खुश नहीं है. अमेरिकी ट्रेजरी ने इस साल रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाए और भारत पर रूसी तेल खरीद कम करने का दबाव बनाया.
लेकिन मार्च में जब होर्मुज नाकेबंदी के कारण वैश्विक तेल बाजार में दबाव बढ़ा, तो अमेरिकी ट्रेजरी ने भारत और कुछ अन्य आयातक देशों के लिए 16 मई तक छूट बढ़ा दी. अब यह समयसीमा इसी हफ्ते 16 मई को खत्म हो रही है, जब BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक चल रही है.
लावरोव ने इस मुद्दे पर और तीखी टिप्पणी की. RT India को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वो दुनिया के सभी ऊर्जा रास्तों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है. उन्होंने कहा कि भारत पर पश्चिमी दबाव 'अनुचित खेल और अनुचित प्रतिस्पर्धा' है.
उन्होंने कहा, 'भारत के हित प्रभावित नहीं होंगे. हम पूरी कोशिश करेंगे कि यह अनुचित खेल हमारी व्यवस्थाओं को प्रभावित न करे.'
भारत क्या चाहता है?
इसी बीच समानांतर रूप से एक और कूटनीतिक रणनीति चल रही है.
जहां विदेश मंत्री जयशंकर भारत मंडपम में BRICS बैठक की शुरुआत कर रहे थे, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग गुरुवार को बीजिंग में द्विपक्षीय वार्ता से पहले हाथ मिला रहे थे. 2017 के बाद यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली चीन यात्रा थी.
बैठक खत्म होने तक दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि 'होर्मुज स्ट्रेट खुला रहना चाहिए' और 'ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल नहीं कर सकता.' व्हाइट हाउस के मुताबिक, शी जिनपिंग ने यह भी कहा कि चीन होर्मुज पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदने में रुचि रखता है.
दो अलग-अलग राजधानियों में, दो दिनों के भीतर हुई ये दो बड़ी बैठकें महज संयोग नहीं मानी जा रही हैं. असल सवाल यह है कि इस संकट में रूस के प्रभाव वाले BRICS समूह से भारत को क्या हासिल होगा.
चर्चा से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, एजेंडे में दो अहम मुद्दे हैं.
पहला, होर्मुज संकट पर BRICS देशों की साझा प्रतिक्रिया तैयार करना. इसमें सदस्य देशों के बीच कच्चे तेल के व्यापार पर एक तय मूल्य सीमा (प्राइस सीलिंग) का विचार शामिल है, जिससे भारत और चीन जैसे बड़े आयातकों को स्पॉट मार्केट में कीमतों के उछाल से बचाया जा सके.
दूसरा मुद्दा वो है जिसे अधिकारी निजी तौर पर 'रूस का ऑप्शन' कहते हैं- यानी रूसी तेल के लिए रुपये में भुगतान की व्यवस्था. यह तकनीकी रूप से 2023 से बना हुआ है लेकिन अब तक इसका सीमित इस्तेमाल हुआ है.
सितंबर में भारत में BRICS शिखर सम्मेलन होगा और अगर उस समय तक इन दोनों मोर्चों पर प्रगति होती है, तो समूह के पास दुनिया के सामने पेश करने के लिए ठोस उपलब्धि होगी.
लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो IMF के आंकड़ों में G7 से बड़ा दिखने वाला यह समूह सिर्फ एक सांख्यिकीय उपलब्धि बनकर रह जाएगा. तब भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए फिर अलग-अलग देशों से अकेले बातचीत करनी पड़ेगी.
दीपू राय