गिफ्ट, बैज और फोन तक डस्टबिन में फेंका, ट्रंप के विमान में चीनी सामान लाने की नहीं थी इजाजत

डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे के बाद सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने चीन से मिले गिफ्ट, बैज और फोन तक प्लेन में ले जाने से मना कर दिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक साइबर जासूसी के डर से सब सामान एयर फोर्स वन में चढ़ने से पहले डस्टबिन में फेंक दिया गया.

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चीनी गिफ्ट से जासूसी का खतरा था. (Photo- AI Generated) चीनी गिफ्ट से जासूसी का खतरा था. (Photo- AI Generated)

आजतक इंटरनेशनल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 16 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:58 PM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया चीन दौरे के बाद एक चौंकाने वाला दावा सामने आया है. सोशल मीडिया और कई रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने चीन से मिले सभी गिफ्ट, बैज, फोन और दूसरे सामान ट्रंप के विमान एयर फोर्स वन में चढ़ने से पहले डस्टबिन में फेंक दिए.

बताया जा रहा है कि यह कदम साइबर जासूसी और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के डर की वजह से उठाया गया. दावा है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने साफ निर्देश दिया था कि चीन की तरफ से मिला कोई भी सामान राष्ट्रपति के विमान में नहीं ले जाया जाएगा.

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यह मामला तब और चर्चा में आया जब पत्रकार एमिली गुडिन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट किया. उन्होंने लिखा कि अमेरिकी स्टाफ ने चीनी अधिकारियों की तरफ से दिए गए सभी सामान, जैसे क्रेडेंशियल्स, डेलिगेशन पिन, अस्थायी फोन और दूसरे आइटम इकट्ठा किए और एयर फोर्स वन में चढ़ने से पहले सीढ़ियों के नीचे रखे डस्टबिन में फेंक दिए.

पोस्ट के मुताबिक, "चीन से मिला कोई भी सामान विमान में लाने की अनुमति नहीं थी." इसके बाद सोशल मीडिया पर इस घटना के वीडियो और तस्वीरें भी वायरल होने लगीं.

रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को चीन यात्रा के दौरान अपने निजी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस इस्तेमाल करने से भी बचने को कहा गया था. इसके बजाय डेलिगेशन के सदस्यों को अस्थायी "बर्नर फोन" दिए गए थे, ताकि किसी भी संभावित साइबर निगरानी से बचा जा सके.

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इतना ही नहीं, प्रतिनिधियों के निजी फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को एयर फोर्स वन में खास "फैराडे बैग" में रखा गया था. ये ऐसे बैग होते हैं जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल को ब्लॉक करते हैं और किसी भी तरह की ट्रैकिंग या डेटा इंटरसेप्शन को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं.

हालांकि अमेरिकी प्रशासन की तरफ से इस पूरे मामले पर आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन इस घटना ने अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते अविश्वास और टेक्नोलॉजी वॉर को फिर सुर्खियों में ला दिया है.

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच साइबर सुरक्षा, जासूसी, चिप टेक्नोलॉजी और डेटा सुरक्षा को लेकर तनाव लगातार बढ़ा है. अमेरिका पहले भी कई बार चीन पर साइबर जासूसी के आरोप लगाता रहा है, जबकि चीन इन आरोपों से इनकार करता आया है.

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